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    सूरए माएदा; आयत 103-105 (कार्यक्रम 189)

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    आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 103 की तिलावत सुनते हैं।مَا جَعَلَ اللَّهُ مِنْ بَحِيرَةٍ وَلَا سَائِبَةٍ وَلَا وَصِيلَةٍ وَلَا حَامٍ وَلَكِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَأَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ (103)ईश्वर ने बहीरा अर्थात कान फाड़ी गई ऊंटनियों, साएबा अर्थात रोग या युद्ध से बचने की ख़ुशी में स्वतंत्र की गई ऊंटनियों, वसीला अर्थात जुड़वां बच्चे पैदा करने वाली बकरी, और हाम अर्थात वह नर जानवर जो दस बच्चे को पैदा कर चुका हो, इन सबके बारे में कोई आदेश नहीं दिया है बल्कि जो लोग काफ़िर हो गए हैं वे ईश्वर पर झूठा आरोप लगाते हैं और उनमें से अधिकांश लोग सोच-समझ से काम नहीं लेते हैं। (5:103)अरबों के इतिहास में आया है कि अनेकेश्वरवादी, कुछ जानवरों के मांस को वर्जित समझते थे और इसे ईश्वर का आदेश बताते थे। संसार के कुछ क्षेत्रों में आज भी इस प्रकार के विचार प्रचलित हैं। कुछ जानवरों का मांस वर्जित होने का विषय सभी आसमानी धर्मों में आया है परन्तु हलाल या वर्जित होने का अधिकार मनुष्य के पास नहीं है कि जो भी जिस प्रकार चाहे आदेश दे। इंसान, पशु और सभी वस्तुएं, ईश्वर की सृष्टि हैं और केवल उसी के पास इनका अधिकार है।मूल रूप से सृष्टि की सभी प्राकृतिक संभावनाओं से लाभ उठाना, चाहे वो जड़ वस्तुएं हों, वनस्पतियां हों या पशु हों, वैध हैं। सिवाए इसके कि आसमानी धर्मों में उनका वर्जित होना सिद्ध हो। अलबत्ता कभी-कभी धर्मों के आदेशों में कुछ अंधविश्वासी बातें भी शामिल हो जाती हैं और हर विचारधारा तथा धर्म के नेताओं व बुद्धिजीवियों के लिए आवश्यक है कि वे ईश्वरीय आदेशों में हर प्रकार के परिवर्तन और अंधविश्वास को रोकने का प्रयास करें।इस आयत से हमने सीखा कि क़ानून और सामाजिक नियम बनाना यदि ईश्वरीय आदेशों के विपरीत हो तो वह एक प्रकार से कुफ़्र और मूर्खता की निशानी है। केवल ईश्वर का इन्कार करने वाला ही काफ़िर नहीं है बल्कि ईश्वरीय धर्म में अपनी ओर से बातें बढ़ाने वाला भी काफ़िर है।पशुओं तक को यूंही लाभहीन छोड़ देना वैध नहीं है, मनुष्यों के बेकार रहने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 104 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا إِلَى مَا أَنْزَلَ اللَّهُ وَإِلَى الرَّسُولِ قَالُوا حَسْبُنَا مَا وَجَدْنَا عَلَيْهِ آَبَاءَنَا أَوَلَوْ كَانَ آَبَاؤُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ شَيْئًا وَلَا يَهْتَدُونَ (104)और जब उनसे कहा जाता है कि उस चीज़ की ओर आओ जो ईश्वर ने उतारी है और पैग़म्बर की ओर आओ तो वे कहते हैं कि हमारे लिए वही काफ़ी है जिस पर हमने अपने पूर्वजों को पाया है, भले ही उनके पूर्वज न कुछ समझते हों और न ही उनको मार्गदर्शन प्राप्त हुआ हो। (5:104)यह आयत कहती है कि जब भी धार्मिक आदेशों में फेर-बदल करने वाले उन अनेकेश्वरवादियों से कहा जाता है कि वे यह काम छोड़ दें और ईश्वर तथा पैग़म्बर का आदेश मानें तो वे अपने काम का कोई तर्क देने के स्थान पर कहते हैं चूंकि हमारे पूर्वज ऐसा करते थे अतः हम भी ऐसा ही करेंगे।क़ुरआन इस प्रकार के अनुचित तर्कों के उत्तर में कहता है कि क्या पूर्वजों से संबंधित हर परंपरा सही होती है कि तुम उसका अनुसरण कर रहे हो? संभव है कि हमारे पूर्वजों ने ऐसे अनेक ग़लत काम किये हों जो कदापि तर्क संगत न हों और कोई भी बुद्धि उसे स्वीकार न करे।इस आयत से हमने सीखा कि अस्ली महत्त्व ईश्वरीय संस्कृति का है न कि पूर्वजों की परंपराओं और संस्कारों का।न परंपरावाद आधार है न ही नवीनीकरण, बल्कि ज्ञान व मार्गदर्शन आधार है। आंख बंद करके किसी मार्ग पर चलना मूर्खता है।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 105 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا عَلَيْكُمْ أَنْفُسَكُمْ لَا يَضُرُّكُمْ مَنْ ضَلَّ إِذَا اهْتَدَيْتُمْ إِلَى اللَّهِ مَرْجِعُكُمْ جَمِيعًا فَيُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (105)हे ईमान वालो! अपने आप को बचाओ। जान लो कि तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो गया तो पथभ्रष्ट तुम्हें क्षति नहीं पहुंचा सकेंगे। तुम सबकी वापसी ईश्वर (ही) की ओर है फिर वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों से अवगत कराएगा। (5:105)पिछली आयतों में अनेकेश्वरवादियों को अन्धविश्वास और पूर्वजों की परंपराओं के अंधे अनुसरण से रोकने के पश्चात इस आयत में ईश्वर ईमान वालों को संबोधित करते हुए कहता हैः यद्यपि पथभ्रष्टों का मार्गदर्शन करना, भलाई का आदेश देना और बुराई से रोकना तुम्हारा कर्तव्य है परन्तु यदि तुम्हारे मार्गदर्शन का कोई प्रभाव नहीं हुआ तो निराश मत हो और कम से कम अपने धर्म को सुरक्षित रखो कि इस स्थिति में ईश्वर तुम्हें उनसे और उनके कर्मों से सुरक्षित रखेगा और प्रलय के दिन तुम्हारे और उनके कर्मों का हिसाब करेगा।इसके अतिरिक्त एक ईमान वाले व्यक्ति को इस मार्ग में आत्मनिर्माण करना चाहिए ताकि वह दूसरों पर प्रभाव डाल सके और दूसरों से प्रभावित हो सके। इसी आधार पर इस आयत की मुख्य सिफ़ारिश अपने आप का ध्यान रखना और अध्यात्म तथा विश्वास के आधारों को सुदृढ़ बनाना है।इस आयत से हमने सीखा कि आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रण में रखना हर ईमान वाले का पहला कर्तव्य है। हमें अपनी ग़लत इच्छाओं का मुक़ाबला करना चाहिए ताकि दूसरों की ग़लत और अनुचित मांगों को रद्द कर सकें।दूसरों के पाप, हमारे लिए पापों का औचित्य नहीं बन सकते। भ्रष्ट समाज में भी अपने आप को सुरक्षित रखना चाहिए।प्रलय के दिन हर एक को अपने कर्मों का हिसाब देना होगा, कोई भी दूसरों के पापों का भार नहीं उठाएगा।प्रलय और ईश्वर के न्याय पर ध्यान, मनुष्य को स्वयं और समाज के प्रति ज़िम्मेदार बनाता है।