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    सूरए माएदा; आयत 106-108 (कार्यक्रम 190)

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    आइए पहले सूरए माएदा की आयत संख्या 106 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا شَهَادَةُ بَيْنِكُمْ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ حِينَ الْوَصِيَّةِ اثْنَانِ ذَوَا عَدْلٍ مِنْكُمْ أَوْ آَخَرَانِ مِنْ غَيْرِكُمْ إِنْ أَنْتُمْ ضَرَبْتُمْ فِي الْأَرْضِ فَأَصَابَتْكُمْ مُصِيبَةُ الْمَوْتِ تَحْبِسُونَهُمَا مِنْ بَعْدِ الصَّلَاةِ فَيُقْسِمَانِ بِاللَّهِ إِنِ ارْتَبْتُمْ لَا نَشْتَرِي بِهِ ثَمَنًا وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبَى وَلَا نَكْتُمُ شَهَادَةَ اللَّهِ إِنَّا إِذًا لَمِنَ الْآَثِمِينَ (106)हे ईमान वालो! तुममें से किसी की मृत्यु निकट आ जाए तो वसीयत के समय तुममें से दो न्यायप्रेमी व्यक्ति गवाह हों और यदि तुम यात्रा की स्थिति में हो और मृत्यु का संकट आ पहुंचे और गवाही के लिए दो मुस्लिम व्यक्ति न मिलें तो दो ग़ैर मुस्लिम व्यक्तियों को गवाह बनाओ। यदि तुम्हें कोई संदेह हो तो उन दोनों को नमाज़ के पश्चात रोक लो कि वे ईश्वर की सौगंध खाएं कि हम किसी भी मूल्य पर इस (गवाही) को नहीं बेचेंगे चाहे नातेदारी का मामला ही क्यों न हो और न ही हम ईश्वरीय गवाही को छिपाने वाले हैं कि निसन्देह, इस स्थिति में हम पापियों में से होंगे। (5:106)इस्लामी क़ानूनों के आधार पर, जो कोई इस संसार से जाता है उसकी संपत्ति का दो तिहाई भाग अपने आप ही उसके उत्तराधिकारियों अर्थात माता, पिता, पत्नी और बच्चों को मिलता है। हर व्यक्ति अपनी संपत्ति के केवल एक तिहाई भाग के बारे में ही वसीयत कर सकता है कि उसे किस प्रकार से ख़र्च किया जाए।परन्तु चूंकि किसी व्यक्ति के मरने के पश्चात उसके उत्तराधिकारी पूरी संपत्ति प्राप्त करना चाहते हैं अतः इस्लाम में सिफ़ारिश की गई है कि मरने वाला व्यक्ति किसी को भी अपनी वसीयत के क्रियान्वयन का दायित्व सौंपे और दो न्यायप्रेमी लोगों को उस व्यक्ति तथा अपनी वसीयत पर गवाह बनाए ताकि उसके मरने के पश्चात उस व्यक्ति और उत्तराधिकारियों में मतभेद न हो।इस आयत में वसीयत के मामले में गवाहों की उपस्थिति पर इस सीमा तक बल दिया गया है कि ईश्वर ने कहा है कि यदि तुम यात्रा की स्थिति में हो और तुम्हें ईमान वाला व्यक्ति न मिले तब भी अपन सहयात्रियों में से दो का चयन करो और उनसे कहो कि वे सौगंध खाएं कि सत्य को किसी भी मूल्य पर नहीं बेचेंगे और न ही उसे छिपाएंगे। प्रत्येक दशा में वसीयत और उससे संबन्धित आदेश, विस्तृत रूप से धार्मिक पुस्तकों में आए हैं जिनका हर व्यक्ति को पालन करना चाहिए ताकि किसी के अधिकारों का हनन न हो।इस आयत से हमने सीखा कि उत्तराधिकारियों और वसीयत के पात्र अन्य लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए अत्यन्त ध्यान से सुनना चाहिए। इसका एक मार्ग वसीयत के संबंध में दो न्यायिक लोगों को गवाह बनाना है।सत्य से विमुख होने का एक कारण लोभ और भाई भतीजावाद है और पवित्र समय और स्थान में ईश्वर की याद और उसकी सौगंध, इनको किसी सीमा तक रोक सकती है।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 107 की तिलावत सुनते हैं।فَإِنْ عُثِرَ عَلَى أَنَّهُمَا اسْتَحَقَّا إِثْمًا فَآَخَرَانِ يَقُومَانِ مَقَامَهُمَا مِنَ الَّذِينَ اسْتَحَقَّ عَلَيْهِمُ الْأَوْلَيَانِ فَيُقْسِمَانِ بِاللَّهِ لَشَهَادَتُنَا أَحَقُّ مِنْ شَهَادَتِهِمَا وَمَا اعْتَدَيْنَا إِنَّا إِذًا لَمِنَ الظَّالِمِينَ (107)तो यदि यह स्पष्ट हो जाए कि (उन दोनों गवाहों ने विश्वासघात किया है और) वे पाप के पात्र बने हैं तो मृतक से अधिक निकट लोगों में से दो व्यक्ति खड़े होकर ईश्वर की सौगंध खाएं कि हमारी गवाही इनकी गवाही की तुलना में सत्य से अधिक निकट है और हमने किसी प्रकार से सच की सीमा पार नहीं की है कि निसन्देह, ऐसी स्थिति में हम अत्याचारियों में से होंगे। (5:107)पिछली आयत में हमने कहा था कि वसीयत के काम को सुदृढ़ बनाने के लिए दो गवाह आवश्यक हैं। यह आयत कहती है कि यदि ये बात स्पष्ट हो जाए कि इन दो गवाहों ने विश्वासघात किया है या सत्य को छिपाया है और झूठी सौगंध खाई है तो मृतक के दो निकट परिजन, कि उन दो लोगों की गवाही से इनकी क्षति हुई है, मृतक की संपत्ति और वसीयत से अवगत होने की स्थिति में, इस बात की सौगंध खा सकते हैं कि हमारी गवाही सत्य से अधिक निकट है और वे दोनों सत्य के विरुद्ध हैं। इस स्थिति में मृतक के इन परिजनों की गवाही स्वीकार की जाएगी और पहले दो गवाहों की गवाही रद्द कर दी जाएगी।इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों की बात और सौगंध को जब तक उसका असत्य होना सिद्ध न हो जाए, स्वीकार करना चाहिए, तथा खोज-बीन नहीं करनी चाहिए। आयत में प्रयोग होने वाले शब्द उसेरा का अर्थ बिना खोज बीन के किसी बात का स्वाभाविक रूप से स्पष्ट होना है।झूठी गवाही भी लोगों के अधिकारों का एक प्रकार का हनन है, चाहे गवाही देने वाले को धन या संपत्ति प्राप्त न हो।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 108 की तिलावत सुनते हैं।ذَلِكَ أَدْنَى أَنْ يَأْتُوا بِالشَّهَادَةِ عَلَى وَجْهِهَا أَوْ يَخَافُوا أَنْ تُرَدَّ أَيْمَانٌ بَعْدَ أَيْمَانِهِمْ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاسْمَعُوا وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ (108)(सौगन्ध की) यह (पद्धति) सत्य से अधिक निकट है कि गवाही को सही ढंग से पेश करें या (कम से कम) इस बात से डरें कि उनकी सौगन्ध कहीं दूसरों की सौगन्ध के बाद रद्द न कर दी जाए। और ईश्वर से डरते रहो तथा (उसके आदेश पर) कान धरो और (जान लो कि) ईश्वर अवज्ञाकारियों का मार्गदर्शन नहीं करता। (5:108)पिछली दो आयतों में वसीयत पर गवाह बनने की पद्धति के वर्णन के पश्चात यह आयत कहती है। यह सारी सिफ़ारिशें इस लिए हैं कि गवाही सही ढंग से पेश की जाए तथा किसी के अधिकार का हनन न हो।आयत के अंत में कहा गया है कि इन आदेशों को स्वीकार करना तथा इनका पालन करना स्वयं तुम्हारे हित में है तथा मूल रूप से ईश्वर से भय का अर्थ इन्हीं आदेशों और सिफ़ारिशों का पालन करना है।इस आयत से हमने सीखा कि सौगन्ध का समारोह जो विशेष पारितोषिक नीतियों के साथ आयोजित होता है, लोगों के अधिकारों की रक्षा और सुदृढ़ता के लिए मूल्यवान है।अपमान की चिंता, पाप से रोकने का एक महत्त्वपूर्ण कारक है और इस बात पर बल दिया जाना चाहिए।