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    सूरए माएदा; आयत 109-113 (कार्यक्रम 191)

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    आइए पहले सूरए माएदा की आयत संख्या 109 तथा 110 की तिलावत सुनते हैं।يَوْمَ يَجْمَعُ اللَّهُ الرُّسُلَ فَيَقُولُ مَاذَا أُجِبْتُمْ قَالُوا لَا عِلْمَ لَنَا إِنَّكَ أَنْتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ (109) إِذْ قَالَ اللَّهُ يَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ اذْكُرْ نِعْمَتِي عَلَيْكَ وَعَلى وَالِدَتِكَ إِذْ أَيَّدْتُكَ بِرُوحِ الْقُدُسِ تُكَلِّمُ النَّاسَ فِي الْمَهْدِ وَكَهْلًا وَإِذْ عَلَّمْتُكَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَالتَّوْرَاةَ وَالْإِنْجِيلَ وَإِذْ تَخْلُقُ مِنَ الطِّينِ كَهَيْئَةِ الطَّيْرِ بِإِذْنِي فَتَنْفُخُ فِيهَا فَتَكُونُ طَيْرًا بِإِذْنِي وَتُبْرِئُ الْأَكْمَهَ وَالْأَبْرَصَ بِإِذْنِي وَإِذْ تُخْرِجُ الْمَوْتَى بِإِذْنِي وَإِذْ كَفَفْتُ بَنِي إِسْرَائِيلَ عَنْكَ إِذْ جِئْتَهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ إِنْ هَذَا إِلَّا سِحْرٌ مُبِينٌ (110)जिस दिन ईश्वर सभी पैग़म्बरों को एकत्रित करेगा फिर पूछेगा (अपनी जाति की ओर से) तुम्हें क्या उत्तर दिया गया था? वे कहेंगे (वास्तविकता का) हमें कोई ज्ञान नहीं है निसंदेह तू ही गुप्त बातों से अवगत है। (5:109) (हे पैग़म्बर!) उस समय को याद कीजिए जब ईश्वर ने कहा, हे मरियम के पुत्र ईसा! मेरी उस विभूति को याद करो जो मैंने तुम्हें और तुम्हारी माता को दी कि जब पवित्र आत्मा के माध्यम से तुम्हारी पुष्टि और सहायता की कि तुम पालने में (चमत्कार से) और अधेड़ आयु में (वहि की सहायता से) लोगों से बात किये करते थे। और जब मैंने तुम्हें किताब, तत्वदर्शिता, तौरेत तथा इंजील की शिक्षा दी और जब तुम मेरी अनुमति से मिट्टी से पक्षी की आकृति बनाते थे और उसमें फूंक मारते थे तो वह मेरी अनुमति से पक्षी बन जाता था और जब तुम मेरी अनुमति से जन्मजात अंधे और कोढ़ियों को अच्छा कर दिया करते थे और जब तुम मेरी अनुमति से मरे हुए को (क़ब्र से जीवित) निकाला करते थे और जब मैंने बनी इस्राईल (के अत्याचार) से तुम्हें बचा लिया था और जब तुम खुले हुए चमत्कार लेकर (उनके पास) आए तो उनमें से काफ़िरों ने कहा कि यह खुले हुए और स्पष्ट जादू के अतिरिक्त कुछ नहीं है। (5:110) यह आयतें उन कृपाओं और अनुकंपाओं के बारे में, जो ईश्वर ने पैग़म्बरों और उनकी जातियों को दी थीं तथा लोगों ने किस सीमा तक उन्हें स्वीकार किया था और उनका पालन किया, अपने पैग़म्बरों से ईश्वर की वार्ता के बारे में बताती हैं। पैग़म्बर, ईश्वर के इस प्रश्न के उत्तर में कि लोगों ने किस सीमा तक उनकी शिक्षाओं को स्वीकार किया और पैग़म्बर के जीवन में और उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी सिफ़ारिशों का किस हद तक पालन किया? कहते हैं कि हमें नहीं पता कि लोगों ने हमारे पश्चात हमारी सिफ़ारिशों के बारे में क्या किया, केवल ईश्वर को ही लोगों के प्रकट और गुप्त कर्मों का ज्ञान है।क़ुरआने मजीद इसी प्रकार ईश्वर और हज़रत ईसा की वार्ता की ओर संकेत करता है। यह वार्ता इस सूरे के अंत तक जारी रहती है। इस आयत में कहा गया है कि इन महान ईश्वरीय पैग़म्बरों पर ईश्वर की अनुकंपाएं अत्यधिक हैं और बचपन से लेकर आयु के अंत तक उन पर ईश्वर की अनुकंपा रही है। बिना पिता के जन्म, झूले में बात करना, पक्षी की आकृति बनाकर उसे जीवित करना, असाध्य रोगों का उपचार करना तथा मरे हुए लोगों को क़ब्र से जीवित करना यह सब हज़रत ईसा मसीह के चमत्कार थे जो ईश्वर ने उनके माध्यम से प्रकट किये थे।परन्तु आयत के अंत में ईश्वर कहता है कि इतने अधिक चमत्कारों के बाद भी जो लोग सत्य स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे उन्होंने इन चमत्कारों को जादू बताते हुए इनका इन्कार कर दिया। इन आयतों से हमने सीखा कि मां की पवित्रता ईश्वर की विशेष कृपाओं की प्राप्ति की भूमिका और पवित्र संतान के जन्म का कारण है।यदि मनुष्य का हृदय भलाई स्वीकार करने वाला न हो तो वह पत्थर और मिट्टी से भी तुच्छ है। ईसा मसीह की फूंक ने निर्जीव मिट्टी को जीवित कर दिया परन्तु काफ़िरों के हृदयों पर कोई प्रभाव नहीं हुआ।यदि ईश्वर ने अपने प्रिय बंदों को यह शक्ति दी है कि वे रोगियों को अच्छा कर दें तो लोगों द्वारा उनसे अपनी बीमारियों के इलाज हेतु सहायता मांगना भी वैध है।यद्यपि बनी इस्राईल हज़रत ईसा की हत्या करना चाहते थे परन्तु ईश्वर ने उनकी रक्षा की।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 111 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ أَوْحَيْتُ إِلَى الْحَوَارِيِّينَ أَنْ آَمِنُوا بِي وَبِرَسُولِي قَالُوا آَمَنَّا وَاشْهَدْ بِأَنَّنَا مُسْلِمُونَ (111)और जब मैंने हवारियों अर्थात (हज़रत ईसा मसीह के निकट सहयोगियों) के हृदय में डाला कि मुझ पर और मेरे पैग़म्बर पर ईमान लाओ (तो) उन्होंने कहा कि हम ईमान लाए और गवाह रहो कि हम मुस्लिम हैं। (5:111)यह आयत हज़रत ईसा मसीह पर ईश्वर की एक अन्य अनुकंपा की ओर संकेत करते हुए कहती है कि ईश्वर ने पवित्र प्रवृत्ति के लोगों के हृदयों में यह बात डाली कि ईसा मसीह पर ईमान लाएं और उनके आदेशों का पालन करें और उन्होंने भी यह बात स्वीकार कर ली।इतिहास के अनुसार हज़रत ईसा मसीह के बारह विशेष साथी थे। अपनी आंतरिक पवित्रता तथा समाज को पापों से रोकने के उनके प्रयासों के कारण उन्हें हवारी कहा जाता था। इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य का हृदय यदि पवित्र और भलाई स्वीकार करने पर तैयार हो तो ईश्वरीय संबोधन और स्रोत से वास्तविकता की प्राप्ति का पात्र बन जाता है।वास्तविक ईमान की निशानी, ईश्वर और उसके पैग़म्बरों के आदेशों का पालन है। ईमान, आज्ञापालन से अलग नहीं है।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 112 तथा 113 की तिलावत सुनते हैं।إِذْ قَالَ الْحَوَارِيُّونَ يَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ هَلْ يَسْتَطِيعُ رَبُّكَ أَنْ يُنَزِّلَ عَلَيْنَا مَائِدَةً مِنَ السَّمَاءِ قَالَ اتَّقُوا اللَّهَ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (112) قَالُوا نُرِيدُ أَنْ نَأْكُلَ مِنْهَا وَتَطْمَئِنَّ قُلُوبُنَا وَنَعْلَمَ أَنْ قَدْ صَدَقْتَنَا وَنَكُونَ عَلَيْهَا مِنَ الشَّاهِدِينَ (113)और जब हवारियों ने कहा कि हे मरयम के पुत्र ईसा! क्या तुम्हारा पालनहार हमारे लिए आसमान से दस्तरख़ान उतार सकता है? ईसा ने कहा, यदि तुम ईमान लाए हो तो ईश्वर से डरो (और ऐसी मांग न करो) (5:112) उन्होंने कहाः हम चाहते हैं कि हमारे हृदय संतुष्ट हो जाएं और हमें पता चल जाए कि आपने हमसे सच कहा है और हम (भी दूसरों के सामने) इस आसमानी भोजन की गवाही देंगे। (5:113)पिछली आयत के आधार पर हवारी ईश्वर की कृपा और उसके संदेश से हज़रत ईसा मसीह पर ईमान लाए परन्तु उन्होंने अपने ईमान को सुदृढ़ बनाने और हार्दिक संतोष के लिए हज़रत ईसा से कहा कि वे उन्हें अलग से से चमत्कार दिखाएं और उनके लिए आसमान से भोजन मंगवाएं।परन्तु चूंकि उनके प्रश्न की पद्धति अनुचित थी और उससे ऐसा प्रतीत होता था कि ईश्वर में इस बात की क्षमता नहीं है अतः हज़रत ईसा ने उनसे कहा, तुम जो ईश्वर पर ईमान ला चुके हो क्यों इस प्रकार की बात करते हो और ऐसी मांग करते हो? उन्होंने कहा, यह काम हमारे ईमान को भी सुदृढ़ करेगा और हम इस बात की भी गवाही देंगे कि ईसा मसीह के ईश्वर ने यह काम किया है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान के विभिन्न चरण हैं जिनका अंत हार्दिक संतोष पर होता है और ईमान वाला व्यक्ति सदैव इस चरण तक पहुंचने के लिए प्रयासरत रहता है।ईमान वाले व्यक्ति को ईश्वर की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए और यह नहीं कहना चाहिए कि यदि ईश्वर, ईश्वर है तो उसे जो मैं कहूं वह करना चाहिए बल्कि उसे ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि उसके हार्दिक संतोष की भूमि प्रशस्त करे।