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    सूरए माएदा; आयत 114-117 (कार्यक्रम 192)

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    आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 114 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ اللَّهُمَّ رَبَّنَا أَنْزِلْ عَلَيْنَا مَائِدَةً مِنَ السَّمَاءِ تَكُونُ لَنَا عِيدًا لِأَوَّلِنَا وَآَخِرِنَا وَآَيَةً مِنْكَ وَارْزُقْنَا وَأَنْتَ خَيرُ الرَّازِقِينَ (114)मरयम के पुत्र ईसा ने कहा, हे मेरे पालनहार! हमारे लिए आकाश से दस्तरख़ान भेज कि जो हमारे लिए और हमारे बाद वालों के लिए ईद और तेरी निशानी हो और हमें रोज़ी दे कि तू सबसे अच्छा अन्नदाता है। (5:114)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत ईसा मसीह के विशेष साथियों अर्थात हवारियों ने अपने हार्दिक संतोष और ईमान की सुदृढ़ता के लिए हज़रत ईसा से अनुरोध किया था कि वे ईश्वर से कहें कि वह उनके लिए आसमान से भोजन भेजे।हज़रत ईसा ने इस बात से संतुष्ट होने के पश्चात कि उनकी इच्छा बहाने बाज़ी और हठधर्मी पर आधारित नहीं है बल्कि ईमान को सुदृढ़ बनाने के लिए है, ईश्वर से प्रार्थना की थी कि वह आसमानी भोजन भेजकर उनके साथियों को ईदी भी दे और उनसे उन लोगों के लिए गवाही भी ले जो उपस्थित नहीं हैं।इस आयत से हमने सीखा कि ईद, धार्मिक उत्सवों तथा अन्य धार्मिक समारोहों के अवसर पर लोगों को भोजन कराना इस्लाम तथा अन्य धर्मों की दृष्टि से स्वीकारीय व प्रिय है।अपने भौतिक कार्यों को आध्यात्मिक आयाम देना चाहिए। भोजन करते समय इस बात की ओर ध्यान रखना चाहिए कि यह ईश्वर की दी हुई रोज़ी और उसकी दी हुई शक्ति की निशानी है। अतः इससे प्राप्त होने वाली शक्ति को उसी के मार्ग में प्रयोग किया जाना चाहिए।आइए अब सूरए माएदा की 115वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قَالَ اللَّهُ إِنِّي مُنَزِّلُهَا عَلَيْكُمْ فَمَنْ يَكْفُرْ بَعْدُ مِنْكُمْ فَإِنِّي أُعَذِّبُهُ عَذَابًا لَا أُعَذِّبُهُ أَحَدًا مِنَ الْعَالَمِينَ (115)ईश्वर ने कहा कि मैं दस्तरख़ान उतारने वाला हूं (परन्तु) फिर तुममें से जो कोई उसका इन्कार करेगा तो निश्चित रूप से मैं उसे ऐसा दण्ड दूंगा कि संसार में किसी को भी उस प्रकार दण्डित नहीं करूंगा। (5:115)चूंकि यह चमत्कार स्वयं हवारियों की इच्छा पर प्रकट किया गया था और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने इसे अपनी ओर से प्रस्तुत नहीं किया था, अतः ईश्वर ने बड़े ही कड़े स्वर में उनसे कहा कि ऐसा न हो कि वे शक और संदेह का शिकार हो जाएं और हज़रत ईसा तथा उनके चमत्कार की सहायता में संदेह करने लगें। परन्तु इन सबके बावजूद इतिहास के अनुसार, आकाश से दस्तरख़ान उतरने और भोजन आने के पश्चात कुछ लोग काफ़िर हो गए जो ईश्वरीय विभूतियों के प्रति मनुष्य की अकृतज्ञता की निशानी है।इस आयत से हमने सीखा कि ज्ञानियों का दायित्व, अज्ञानियों से कहीं अधिक है। जो लोग ज्ञान के आधार पर सत्य को देखते और समझते हैं यदि वे उसे स्वीकार न करें और उसका इन्कार कर दें तो अत्यन्त कड़ा दण्ड उनकी प्रतीक्षा में है।जिसकी अपेक्षाएं अधिक होती हैं उसे अधिक उत्तरादायी भी होना चाहिए।आइए अब सूरए माएदा की 116वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ قَالَ اللَّهُ يَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ أَأَنْتَ قُلْتَ لِلنَّاسِ اتَّخِذُونِي وَأُمِّيَ إِلَهَيْنِ مِنْ دُونِ اللَّهِ قَالَ سُبْحَانَكَ مَا يَكُونُ لِي أَنْ أَقُولَ مَا لَيْسَ لِي بِحَقٍّ إِنْ كُنْتُ قُلْتُهُ فَقَدْ عَلِمْتَهُ تَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِي وَلَا أَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِكَ إِنَّكَ أَنْتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ (116)और उस समय जब ईश्वर ने कहा हे मरयम के पुत्र ईसा! क्या तुमने लोगों से कहा है कि वे ईश्वर के स्थान पर मुझे और मेरी माता को दो ईश्वर मानें? ईसा ने कहा प्रभुवर! तू हर प्रकार के समकक्ष से पवित्र है। मुझे शोभा नहीं देता कि ऐसी बात कहूं कि जो मेरे लिए अनुचित हो। यदि मैंने ऐसा कहा होता तो तू अवश्य उससे अवगत होता (क्योंकि) जो कुछ मेरे हृदय में है तू उसे जानता है जबकि जो कुछ तेरे अस्तित्व में है मैं उससे अनभिज्ञ हूं। निसन्देह तू सभी गुप्त बातों का सबसे अधिक जानने वाला है। (5:116)यह आयत प्रलय में हज़रत ईसा और ईश्वर की वार्ता का वर्णन करती है। यद्यपि आजकल के ईसाई हज़रत मरयम को तीन ईश्वरों में से एक नहीं मानते परन्तु पैग़म्बरे इस्लाम के काल में ईसाईयों का एक गुट पवित्र आत्मा के स्थान पर हज़रत मरयम को तीन ईश्वरों में से एक मानता था और कुछ लोग उनकी प्रतिमा के समक्ष उपासना भी करते थे। जैसा कि आजकल के गिरजाघरों में हज़रत मरयम की प्रतिमा या उनका चित्र, उनके पुत्र हज़रत ईसा के साथ दिखाई देता है और ईसाई इन चित्रों या प्रतिमाओं के समक्ष सिर झुकाते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि हज़रत ईसा मसीह भी उन्हें ईश्वर या ईश्वर का पुत्र माने जाने से विरक्त और इस आस्था से अप्रसन्न थे।पैग़म्बरों का स्थान चाहे जितना बड़ा ही क्यों न हो, वे मनुष्य हैं और ईश्वर के स्तर तक नहीं पहुंचते।मनुष्यों, यहां तक कि पैग़म्बरों का ज्ञान भी सीमित है, ईश्वर के ज्ञान के विपरीत, जो सभी गुप्त बातों का जानने वाला है।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 117 की तिलावत सुनते हैं।مَا قُلْتُ لَهُمْ إِلَّا مَا أَمَرْتَنِي بِهِ أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ رَبِّي وَرَبَّكُمْ وَكُنْتُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًا مَا دُمْتُ فِيهِمْ فَلَمَّا تَوَفَّيْتَنِي كُنْتَ أَنْتَ الرَّقِيبَ عَلَيْهِمْ وَأَنْتَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ (117)(हज़रत ईसा ने कहा प्रभुवर!) मैंने उनसे उसके सिवा कुछ और नहीं कहा जिसका तूने आदेश दिया था कि मेरे और अपने पालनहार की उपासना करो। (प्रभुवर!) मैं जब तक उनके बीच रहा (उनके कर्मों का) साक्षी रहा, तो जब तूने मुझे उठा लिया तो तू स्वयं (ही) उनका निरीक्षक था, और तू हर बात की पूरी जानकारी रखने वाला तथा साक्षी है। (5:117)प्रलय में हज़रत ईसा मसीह तथा ईश्वर की वार्ता का वर्णन जारी रखते हुए क़ुरआने मजीद कहता है कि हज़रत ईसा मसीह बड़े ही स्पष्ट ढंग से अपने दायित्व का प्रतिरोध करते हैं और एकेश्वरवाद के अपने निमंत्रण का उल्लेख करते हैं।स्पष्ट है कि ईश्वर भी अपने पैग़म्बरों के कार्यों का पूरा निरीक्षण करता है और हर प्रकार के अनुचित कार्य को रोक लेता है अतः इस बात का उल्लेख, हज़रत ईसा मसीह के अनुयाइयों के लिए एक चेतावनी के रूप में है ताकि वे जान लें कि तीन ईश्वरों की आस्था, ईसा मसीह की शिक्षाओं में से नहीं है बल्कि उनका निमंत्रण, एकेश्वरवाद का था।