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    सूरए माएदा; आयत 118-120(कार्यक्रम 193)

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    आइए पहले सूरए माएदा की आयत संख्या 118 की तिलावत सुनते हैं।إِنْ تُعَذِّبْهُمْ فَإِنَّهُمْ عِبَادُكَ وَإِنْ تَغْفِرْ لَهُمْ فَإِنَّكَ أَنْتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ (118)(हज़रत ईसा ने कहाः प्रभुवर) यदि तू इन लोगों को दण्डित करेगा तो ये तेरे बंदे हैं और यदि तू इन्हें क्षमा कर दे तो निसन्देह, तू अत्यंत शक्तिशाली और तत्वदर्शी है। (5:118)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि प्रलय में हज़रत ईसा मसीह और ईश्वर के बीच वार्ता होगी जिसमें हज़रत ईसा उन्हें ईश्वर के स्तर तक ले जाने वालों से विरक्तता जताएंगे और उनके इस काम को एकेश्वरवाद के अपने निमंत्रण के विरुद्ध कहेंगे। इस आयत में हज़रत ईसा अपने अनुयाइयों के लिए क्षमायाचना करते हुए कहते हैं। प्रभुवर! यदि तू इन्हें दण्डित करे तो ये उसके योग्य हैं और तुझे इन पर अधिकार है परन्तु यदि तू इन्हें क्षमा कर दे तो यह तेरी दया व कृपा के अधिक निकट हैं। यद्यपि तू तत्वदर्शी है और तत्वदर्शिता के विरुद्ध कोई काम नहीं करता।अपनी जाति के लोगों और अपने अनुयाइयों के बारे में पैग़म्बरों की शेफ़ाअत या सिफ़ारिश, लोगों के बारे में उनकी दया व कृपा तथा प्रेम, और पापियों से उनकी सहानुभूति की सूचक है। अलबत्ता स्वाभाविक है कि केवल उसी की सिफ़ारिश हो सकती है जिसने उसकी भूमि को अपने भीतर प्रशस्त किया हो।उस छात्र की भांति जिसने किसी सीमा तक मेहनत की हो परन्तु परीक्षा में वह उत्तीर्ण न हो सका हो। ऐसी स्थिति में यदि छात्र में योग्यता व क्षमता हो तो शिक्षक उसे कुछ नंबर देकर परीक्षा में उत्तीर्ण कर देता है। ईमान वाले भी कभी-कभी पाप कर बैठते हैं, और यदि उनमें क्षमता हो तो ईश्वर के प्रिय बंदों विशेषकर पैग़म्बरों की सिफ़ारिश या शेफ़ाअत के पात्र बनते हैं ताकि उनके स्वर्ग में जाने की भूमि समतल हो जाए।न केवल हज़रत ईसा बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने भी अपनी जाति के लोगों के लिए प्रार्थना की है और ईश्वर से उनके पापों को क्षमा करने का अनुग्रह किया है। पैग़म्बरे इस्लाम के एक साथी हज़रत अबूज़र ग़ेफ़ारी का कहना है कि पैग़म्बर इस आयत की तिलावत के समय, अपने हाथों को आकाश की ओर उठाकर रोते और गिड़गिड़ाते हुए, पापियों के लिए ईश्वर से क्षमा याचना करते थे।इस आयत से हमने सीखा कि पारितोषिक या दण्ड और क्षमा या कोप, ईश्वर के हाथ में है। हमें इस बात का अधिकार नहीं है कि संसार में ही किसी के बारे में यह सोचें कि वह नरक में जाएगा। कितने ऐसे पापी हैं जो अपनी आयु के अंत तक तौबा करके स्वर्ग में जाने के पात्र बन जाते हैं।ईश्वर का प्रेम या कोप, तत्वदर्शिता के आधार पर है। ईश्वर किसी को भी अकारण स्वर्ग या नरक में नहीं डालता।पैग़म्बरों को सिफ़ारिश का अधिकार प्राप्त है परन्तु उन लोगों के लिए जिनमंश योग्यता हो, सभी पापियों के लिए नहीं।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 119 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ اللَّهُ هَذَا يَوْمُ يَنْفَعُ الصَّادِقِينَ صِدْقُهُمْ لَهُمْ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ ذَلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ (119)ईश्वर ने (हज़रत ईसा के उत्तर में) कहा, आज के दिन सच बोलने वालों (तथा भले चरित्र के लोगों को) उनका सच (और भला चरित्र) लाभ पहुंचाएगा। उनके लिए ऐसे बाग़ हैं जिनके पेड़ों के नीचे से नहरें बह रही होंगी, जिनमें वे सदैव रहेंगे। ईश्वर उनसे प्रसन्न है और वे ईश्वर से राज़ी हैं। यही बड़ी सफलता है। (5:119)

    इस आयत में ईश्वर, हज़रत ईसा मसीह की इस बात के उत्तर में कि पापियों को क्षमा करना ईश्वर के हाथ में है और यदि वह चाहे तो उन्हें क्षमा कर सकता है, कहता है कि प्रलय के दिन केवल सत्य और भला चरित्र ही काम आएगा। लोगों को जो वस्तु नरक की आग से मुक्ति दिलाएगी, वह सच है। सच के कारण ही स्वर्ग भी मिलेगा और ईश्वर की प्रसन्नता तथा लोक-परलोक का कल्याण भी।इस आयत में मोक्ष व कल्याण की शर्त के रूप में अन्य आयतों में आने वाले ईमान व भले कर्मों के स्थान पर सत्य का उल्लेख किया गया है कि जिससे ईमान व कर्म की सत्यता प्रकट होती है। अर्थात ईमान केवल ज़बान से ही प्रकट न हो बल्कि हृदय में भी प्रवेश करे।इसके अतिरिक्त भला कर्म भी निष्ठा और ईश्वर से सामिप्य के लिए किया गया हो, दिखावे और घमण्ड के लिए नहीं। अतः यह आयत इस महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करती है कि वह ईश्वर और उसके लिए कार्य करने से राज़ी हो। अर्थात उन्होंने जो कुछ भी किया वह ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए किया न कि लोगों को दिखाने के लिए और उनको प्रसन्न करने के लिए।स्वाभाविक है कि जो अपनी पूरी आयु में ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए प्रयासरत रहा हो, ईश्वर भी उससे राज़ी होगा और यह किसी भी मनुष्य के लिए सबसे बड़ा दर्जा है कि उसका पालनहार उससे राज़ी और प्रसन्न हो और यही बात लोक-परलोक की सबसे बड़ी सफलता है।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान वाले यदि अपनी सत्यता के कारण इस संसार में कुछ कठिनाइयां सहन करते हैं तो यही सत्यता, प्रलय में उनकी मुक्ति व कल्याण का कारण होगी।दावा लाभदायक नहीं है बल्कि कर्म आवश्यक है। मनुष्य विचार, आस्था और कर्म तथा कथन में सच्चाई द्वारा ही किसी स्थान तक पहुंचता है न कि केवल खोखली बातों और नारों से।आइए अब सूरए माएदा की अन्तिम तथा 120वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।لِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا فِيهِنَّ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (120)आकाशों, धरती और जो कुछ उनमें है, सबका शासन ईश्वर के पास है और वह हर बात में सक्षम है। (5:120)सूरए माएदा की यह अन्तिम आयत मनुष्य का ध्यान ईश्वर की महानता और शक्ति की ओर आकृष्ट कराते हुए कहती है कि कोई यह न सोचे कि वह ईश्वर की सत्ता से बाहर है और उसकी इच्छा के बिना कोई काम कर सकता है। यदि तुम संसार चाहते हो तो जान लो कि तुम्हारे इस छोटे से संसार का वास्तविक स्वामी ईश्वर है। उसकी ओर आओ और उसके बन्दे बनो कि समुद्र से जुड़ने के पश्चात पानी की बूंद समुद्र बन जाती है और ईश्वर की अनंत शक्ति और महानता से मिल जाती है।