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    सूरए माएदा; आयत 23-26 (कार्यक्रम 168)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 23वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قَالَ رَجُلَانِ مِنَ الَّذِينَ يَخَافُونَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِمَا ادْخُلُوا عَلَيْهِمُ الْبَابَ فَإِذَا دَخَلْتُمُوهُ فَإِنَّكُمْ غَالِبُونَ وَعَلَى اللَّهِ فَتَوَكَّلُوا إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (23)ईश्वर का भय रखने वाले दो लोगों ने, जिन्हें ईश्वर ने (ईमान और साहस की) विभूति प्रदान की थी, कहा। नगर के द्वार से शत्रु के यहां घुस जाओ, और यदि तुम प्रविष्ट हो गए तो निसन्देह, तुम्हीं विजयी होगे और केवल ईश्वर पर ही भरोसा रखो यदि तुम ईमान वाले हो। (5:23) श्रोताओ आपको अवश्य ही याद होगा कि पिछले कार्यक्रम मे हमने कहा था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने बनी इस्राईल से कहा था कि वे लोग अत्याचारियों से संघर्ष करें और अपने नगर को मुक्त कराएं परन्तु वे लोग जेहाद और संघर्ष के लिए तैयार नहीं हुए और कहने लगे कि हम लोग शहर में प्रविष्ट नहीं होंगे जब तक कि वे स्वयं ही वहां से निकल न जाएं।यह आयत कहती है कि यहूदी जाति के दो लोगों ने जिनका नाम तौरेत में यूशा और क़ालिब वर्णित है, बनी इस्राईल से कहा था कि शत्रु से नहीं बल्कि ईश्वर से डरो और उसी पर भरोसा करो, इसी नगर के द्वार से प्रविष्ट हो जाओ और अचानक ही शत्रु पर आक्रमण कर दो। निश्चिंत रहो कि तुम ही विजयी होगे अलबत्ता यदि अपने ईमान पर डटे रहो और ईश्वर की ओर से निश्चेत न हो ।इस आयत से हमने सीखा कि जो ईश्वर से डरता है वह अन्य शक्तियों से भयभीत नहीं होगा। ईश्वर पर ईमान, शक्ति तथा सम्मान और महानता का कारण है।यदि हम पहल करें तो ईश्वर की ओर से सहायता मिलती है, बिना कुछ किये, सहायता की आशा रखना बेकार है।बिना प्रयास के ईश्वर पर भरोसा रखना निरर्थक है। साहस और निर्भीकता भी आवश्यक है साथ ही ईश्वर पर भरोसा तथा उसका भय भी।आइए अब सूरए माएदा की 24वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا يَا مُوسَى إِنَّا لَنْ نَدْخُلَهَا أَبَدًا مَا دَامُوا فِيهَا فَاذْهَبْ أَنْتَ وَرَبُّكَ فَقَاتِلَا إِنَّا هَاهُنَا قَاعِدُونَ (24)बनी इस्राईल ने कहा कि हे मूसा! जब तक वे अत्याचारी नगर में हैं हम कदापि उसमें प्रविष्ट नहीं होंगे। तो तुम और तुम्हारा पालनहार जाओ और युद्ध करो। हम यहीं पर बैठे हुए हैं। (5:24)हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के आह्वान और बनी इस्राईल के वरिष्ठ लोगों के प्रोत्साहन के बावजूद, यहूदी संघर्ष के लिए तैयार नहीं हुए और उन्होंने बड़े ही दुस्साहस के साथ कहा कि हम युद्ध के लिए क्यों जाएं? हे मूसा! आप ही युद्ध के लिए जाएं क्योंकि आपका पालनहार आपके साथ है अतः आप तो निश्चित रूप से विजयी होंगे। जब आप नगर को अपने नियंत्रण में ले लेंगे तो हम भी उसमें प्रविष्ट हो जाएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि बनी इस्राईल के लोग अशिष्टता, बहानेबाज़ी, आलस्य, और आराम पसंदी का उदाहरण थे। हमें उन जैसा नहीं होना चाहिए वरना हमारा परिणाम ही उन्हीं जैसा होगा।ईश्वरीय प्रतिनिधियों और समाज सुधारकों की उपस्थिति के बाद भी, जनता का कर्तव्य और दायित्व समाप्त नहीं होता कि लोग कहें कि कार्यवाही करने वाले मौजूद हैं और हमारा कोई दायित्व नहीं है।आइए अब सूरए माएदा की 25वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قَالَ رَبِّ إِنِّي لَا أَمْلِكُ إِلَّا نَفْسِي وَأَخِي فَافْرُقْ بَيْنَنَا وَبَيْنَ الْقَوْمِ الْفَاسِقِينَ (25)मूसा ने कहा कि हे मेरे पालनहार! मुझे अपने भाई के अतिरिक्त किसी पर नियंत्रण प्राप्त नहीं है (और यह लोग मेरी बात नहीं मानते) तो तू हमारे और इस अवज्ञाकारी जाति के बीच जुदाई डाल दे। (5:25)इतिहास बहुत ही विचित्र है। वह जाति जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के संघर्ष के कारण फ़िरऔन के चुंगल से मुक्त हुई और उसकी स्थाई पहचान बनी, आज अपने नगर में प्रविष्ट होने के लिए एक क़दम भी उठाने पर तैयार नहीं है। उसे प्रतीक्षा है कि ईश्वर का पैग़म्बर हर काम स्वयं कर ले और तब उन्हें नगर में आने का निमंत्रण दे। यह देखकर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने बनी इस्राईल को श्राप दिया और ईश्वर से प्रार्थना की थी कि इस जाति के अवज्ञाकारियों और उद्दंडियों को दण्डित करे क्योंकि अब उनके सुधार की कोई आशा नहीं थी और इस दण्ड से बचने के लिए उन्होंने कहा कि हमारे और उनके बीच जुदाई डाल दे।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों ने अपने दायित्वों के पालन में कोई कमी नहीं की है, यह तो लोग थे जो मोक्ष और मुक्ति की प्राप्ति के लिए प्रयास तथा जेहाद करने के लिए तैयार नहीं हुए।पैग़म्बरों की पद्धति, लोगों तक ईश्वर का संदेश पहुंचाना थी न कि आदेशों के पालन के लिए लोगों को विवश करना था।आइए अब सूरए माएदा की 26वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قَالَ فَإِنَّهَا مُحَرَّمَةٌ عَلَيْهِمْ أَرْبَعِينَ سَنَةً يَتِيهُونَ فِي الْأَرْضِ فَلَا تَأْسَ عَلَى الْقَوْمِ الْفَاسِقِينَ (26)ईश्वर ने मूसा से कहा कि निःसन्देह यह पवित्र धरती इनके लिए ४० वर्षों तक वर्जित हो गई। यह इस जंगल और मरुस्थल में भटकते रहेंगे। तो हे मूसा! तुम इस अवज्ञाकारी जाति के लिए दुखी मत हो। (5:26)ईश्वरीय दण्ड प्रलय से विशेष नहीं है बल्कि कभी ईश्वर कुछ लोगों या जाति को उसके कर्मों का दण्ड इसी संसार में देता है। ईश्वर ने बनी इस्राईल के लोगों की अवज्ञा और बहानेबाज़ी के दण्डस्वरूप उन्हें ४० वर्षों तक सीना नामक मरूस्थल में भटकाया तथा उन्हें उस पवित्र धरती की अनुकंपाओं से वंचित कर दिया। इस ईश्वरीय दण्ड का उल्लेख वर्तमान तौरेत में भी हुआ है। इतिहास के अनुसार बनी इस्राईल के लोग ४० वर्षों तक सीना नामक मरूस्थल में भटकने और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को खोने के पश्चात, नगर में प्रविष्ट होने के लिए अंततः सैनिक आक्रमण पर ही विवश हुए। उनके पुराने आलस्य का परिणाम ४० वर्षों तक भटकने के अतिरिक्त कुछ नहीं निकला। इस आयत से हमने सीखा कि शत्रु के मुक़ाबले में कमज़ोरी और आलस्य दिखाने तथा युद्ध व जेहाद से फ़रार होने का परिणाम, अनुकंपाओं से वंचितता और भटकने के अतिरिक्त कुछ नहीं है।जेहाद के मोर्चे से फ़रार होने वालों को समाज की संभावनाओं और सुविधाओं से वंचित कर देना चाहिए।ईश्वर के पवित्र बंदे बुरे लोगों को भी दण्डित होता नहीं देख सकते परन्तु अपराधी को दण्डित करना ऐसी दवा है जो समाज के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।