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    सूरए माएदा; आयत 27-31 (कार्यक्रम 169)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 27वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ ابْنَيْ آَدَمَ بِالْحَقِّ إِذْ قَرَّبَا قُرْبَانًا فَتُقُبِّلَ مِنْ أَحَدِهِمَا وَلَمْ يُتَقَبَّلْ مِنَ الْآَخَرِ قَالَ لَأَقْتُلَنَّكَ قَالَ إِنَّمَا يَتَقَبَّلُ اللَّهُ مِنَ الْمُتَّقِينَ (27)(हे पैग़म्बर!) लोगों को आदम के दो पुत्रों का हाल उस प्रकार सुना दीजिए जिस प्रकार उसका हक़ है। जब दोनों ने (ईश्वर के निकट बलि चढ़ाई तो उनमें से एक की क़ुर्बानी स्वीकार हुई और दूसरे की स्वीकार नहीं हुई। तो (क़ाबील ने जिसकी क़ुरबानी स्वीकार नहीं हुई थी अपने भाई हाबील से) कहा, मैं अवश्य तुम्हारी हत्या करूंगा। उसने उत्तर में कहा, ईश्वर तो केवल उन्हीं से (क़ुर्बानी) स्वीकार करता है जो उसका भय रखते हैं। (5:27)इस्लामी इतिहास की पुस्तकों और इसी प्रकार तौरेत में वर्णित है कि आरंभ में हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के दो पुत्र थे, हाबील और क़ाबील। हाबील चरवाहे थे और क़ाबील किसान। हाबील क़ुर्बानी के लिए अपनी सबसे अच्छी भेड़ें लाए जबकि क़ाबील ने अपनी उपज का सबसे घटिया अंश ईश्वर से सामिप्य के लिए पेश किया। अतः हाबील की क़ुर्बानी स्वीकार हो गई और क़ाबली की क़ुर्बानी अस्वीकार कर दी गई।यह बात हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के पास ईश्वरीय संदेश भेजकर उन दोनों को बता दी गई। क़ाबील ने, जो एक ईर्ष्यालु और अंधकारमय प्रवृत्ति वाला व्यक्ति था, स्वयं को सुधारने के बजाए अपने भाई से बदला लेने की ठानी और इस मार्ग में वह इतना आगे बढ़ गया कि उसने हाबील की हत्या करने का निर्णय कर लिया।परन्तु हाबील ने, जो एक भले और पवित्र प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, इस बात के उत्तर में कहा, ईश्वर की ओर से हमारे कर्मों का स्वीकार या अस्वीकार किया जाना तर्कहीन नहीं है। तुम अकारण ही मुझसे ईर्ष्या कर रहे हो। ईश्वर उस कर्म को स्वीकार करता है जो पूरी निष्ठा और पवित्रता के साथ किया गया हो, अब वह काम जो भी हो और जितना भी हो। ईश्वर उसी वस्तु को ख़रीदता है जिसपर पवित्रता की मुहर लगी हो अन्यथा उसका कोई महत्व नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि अतीत के लोगों का इतिहास आगामी पीढ़ियों के मार्ग का सबसे अच्छा चिराग़ है। इतिहास की महत्तवपूर्ण घटनाओं को बार-बार दोहराना चाहिए, ताकि वह नई पीढ़ी के लिए शिक्षा सामग्री बन सके।केवल भला कर्म ही काफ़ी नहीं है बल्कि उसके साथ अच्छी भावना भी होनी चाहिए जो उस कार्य को मूल्यवान बनाए।ईर्ष्या, भाई की हत्या की सीमा तक बढ़ सकती है। हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की घटना में भी शैतान ने ईर्ष्या के हथकण्डे से उनके और उनके भाइयों के बीच जुदाई डाल दी।आइए अब सूरए माएदा की 28वीं तथा 29वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।لَئِنْ بَسَطْتَ إِلَيَّ يَدَكَ لِتَقْتُلَنِي مَا أَنَا بِبَاسِطٍ يَدِيَ إِلَيْكَ لِأَقْتُلَكَ إِنِّي أَخَافُ اللَّهَ رَبَّ الْعَالَمِينَ (28) إِنِّي أُرِيدُ أَنْ تَبُوءَ بِإِثْمِي وَإِثْمِكَ فَتَكُونَ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ وَذَلِكَ جَزَاءُ الظَّالِمِينَ (29)(हाबील ने अपने भाई क़ाबील से कहा) यदि मेरी हत्या करने के लिए तुम मेरी ओर हाथ बढ़ाओगे तब भी मैं कदापि तुम्हारी हत्या के लिए तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाने वाला नहीं हूं क्योंकि मैं संसार के पालनहार ईश्वर से डरता हूं।(5:28) मैं चाहता हूं कि तुम मेरे और अपने पापों का केन्द्र बन जाओ और नरक वालों में से हो जाओ और यही अत्याचारियों का बदला है।(5:29)क़ाबील जैसे ईर्ष्यालु और अपराधी भाई के मुक़ाबले में, हाबील किसी भी प्रकार की कार्यवाही करने के स्थान पर कहते हैं, यद्यपि मैं जानता हूं कि तुम मेरी हत्या करना चाहते तो किंतु मैं तुमसे पहले यह काम नहीं करूंगा क्योंकि मैं प्रलय के दिन ईश्वर के न्याय से डरता हूं और जानता हूं कि अपराध से पूर्व बदला लेना वैध नहीं है।अलबत्ता अत्याचार के मुक़ाबले में अपनी रक्षा आवश्यक है परन्तु केवल यह जानकर कि कोई पाप करने का इरादा रखता है उसे दण्डित करना ठीक नहीं है क्योंकि संभव है कि वह यह कार्य न करे परन्तु पाप होने से रोकने के लिए, उस व्यक्ति से पाप के साधन छीने जा सकते हैं। प्रत्येक दशा में हाबील ने कहा कि मैं तुमसे पहले यह कार्य नहीं करूंगा और यदि तुमने ऐसा किया और मेरी हत्या कर दी तो जान लो कि तुम नरक वालों में से हो जाओगे और मैं तुमसे वहां पर अपना हक़ लूंगा क्योंकि तुम्हारे पास कोई भला कर्म तो होगा नहीं कि तुम उसे मुझे दे दो और मैं तुम्हें क्षमा कर दूं। अतः तुम मेरे पापों का बोझ भी ढोने के लिए विवश होगे और तुम्हें दोहरा दण्ड मिलेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि ईर्ष्यालु और हठधर्मी लोगों के सामने शांति से बात करनी चाहिए, उनकी ईर्ष्या को और अधिक नहीं भड़काना चाहिए।महत्त्वपूर्ण और मूल्यवान बात यह है कि कमज़ोरी और आलस्य के कारण नहीं बल्कि ईश्वर से डरते हुए पाप नहीं करना चाहिए। हाबील ने यह नहीं कहा कि चूंकि मेरे पास शक्ति नहीं है अतः मैं तुम्हें क्षमा करता हूं। बल्कि उन्होंने यह कहा कि मैं ईश्वर से डरता हूं कि अपने भाई की हत्या करूं।मनुष्य को पाप से रोकने में ईश्वर का भय, सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है।आइए अब सूरए माएदा की 30वीं और 31वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।فَطَوَّعَتْ لَهُ نَفْسُهُ قَتْلَ أَخِيهِ فَقَتَلَهُ فَأَصْبَحَ مِنَ الْخَاسِرِينَ (30) فَبَعَثَ اللَّهُ غُرَابًا يَبْحَثُ فِي الْأَرْضِ لِيُرِيَهُ كَيْفَ يُوَارِي سَوْأَةَ أَخِيهِ قَالَ يَا وَيْلَتَا أَعَجَزْتُ أَنْ أَكُونَ مِثْلَ هَذَا الْغُرَابِ فَأُوَارِيَ سَوْأَةَ أَخِي فَأَصْبَحَ مِنَ النَّادِمِينَ (31)फिर क़ाबील के (उद्दंडी) मन ने उसे अपने भाई की हत्या पर तैयार कर लिया तो उसने हाबील की हत्या कर दी और वह घाटा उठाने वालों में से हो गया। (5:30) तो ईश्वर ने एक कौवा भेजा जो ज़मीन खोद रहा था ताकि उसे बताए कि किस प्रकार अपने भाई के शव को छिपाए। उसने कहा कि धिक्कार हो मुझ पर कि मैं इस कौवे जैसा भी नहीं हो सका कि अपने भाई के शव को धरती में छिपा देता (उसने ऐसा ही किया) और वह पछताने वालों में शामिल हो गया। (5:31) हाबील की नसीहतों और उन दोनों के बीच होने वाली बातों के बावजूद अंततः क़ाबील के दुष्ट मन ने उस पर नियंत्रण कर ही लिया और उसने अपने ही भाई के ख़ून से अपने हाथ रंग लिए परन्तु शीघ्र ही उसे अपने इस कार्य पर पछतावा होने लगा किंतु पछतावे से अब कोई लाभ नहीं था। इसी कारण क़ाबील असमंजस में था कि वह अपने भाई के शव का क्या करे? इसी अवसर पर ईश्वर ने एक कौवे को भेजा जिसने ज़मीन खोद कर क़ाबील को यह समझा दिया कि उसे अपने भाई को मिट्टी में दफ़न कर देना चाहिए।धरती पर यह पहली हत्या थी। इसने आदम के बेटों के मन में द्वेष और ईर्ष्या के बीज बो दिये। खेद के साथ कहना पड़ता है कि द्वेष और ईर्ष्या के यह बीज अभी भी बलि ले रहे हैं और मनुष्यों के बीच अशांति तथा समस्याओं का कारण बने हुए हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि सत्य तथा असत्य के बीच युद्ध, धरती पर मनुष्य के जन्म के समय से ही चला आ रहा है और मनुष्य की पहली मौत शहादत से आरंभ हुई है।कभी-कभी ईश्वर पशुओं को, मनुष्य को कुछ बातें सिखाने के लिए भेजता है। मनुष्य अपने ज्ञान के कुछ भाग के लिए पशुओं का कृतज्ञ है।ईश्वर की इच्छा के आधार पर मनुष्य के शव को दफ़्न करना चाहिए।