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    सूरए माएदा; आयत 3 (कार्यक्रम 162)

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    आइए अब सूरए माएदा की तीसरी आयत की तिलावत सुनते हैं।حُرِّمَتْ عَلَيْكُمُ الْمَيْتَةُ وَالدَّمُ وَلَحْمُ الْخِنْزِيرِ وَمَا أُهِلَّ لِغَيْرِ اللَّهِ بِهِ وَالْمُنْخَنِقَةُ وَالْمَوْقُوذَةُ وَالْمُتَرَدِّيَةُ وَالنَّطِيحَةُ وَمَا أَكَلَ السَّبُعُ إِلَّا مَا ذَكَّيْتُمْ وَمَا ذُبِحَ عَلَى النُّصُبِ وَأَنْ تَسْتَقْسِمُوا بِالْأَزْلَامِ ذَلِكُمْ فِسْقٌ الْيَوْمَ يَئِسَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ دِينِكُمْ فَلَا تَخْشَوْهُمْ وَاخْشَوْنِ الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا فَمَنِ اضْطُرَّ فِي مَخْمَصَةٍ غَيْرَ مُتَجَانِفٍ لِإِثْمٍ فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌतुम्हारे लिए मरा हुआ जानवर, रक्त, सुअर का मांस, वह जानवर जिसे अल्लाह के अतिरिक्त किसी और के नाम पर ज़िबह किया गया हो, वह जानवर जो गला घुटकर, ऊंचाई से गिरकर, चोट खाकर या सींग लगने से मरा हो या जिसे किसी हिंसक पशु ने फाड़ खाया हो हराम व वर्जित कर दिया गया। सिवाए इसके कि तुम उसे जीवित पाकर स्वयं ज़िबह कर लो। इसी प्रकार वह जानवर जिसे पत्थरों के सामने भेंट चढ़ाया जाए और वह जिसे जुए के लिए बांटा गया हो, तुम्हारे लिए हराम है तथा ईश्वर की अवज्ञा का कारण है। (हे ईमान वालो!) आज काफ़िर तुम्हारे धर्म की ओर से निराश हो गए हैं तो उनसे भयभीत न हो बल्कि केवल मुझसे डरते रहो। आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को पूर्ण कर दिया और तुम पर अपनी अनुकंपा पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को एक धर्म के रूप में पसंद किया, तो जो कोई (भूख से) विवश हो जाए और पाप की ओर आकृष्ट न हो तो (वह इन वर्जित वस्तुओं में से खा सकता है) निःस्नदेह, ईश्वर अत्यन्त क्षमाशील और दयावान है। (5:3)अभी जिस आयत की तिलावत की गई उसमें पूर्णतः दो भिन्न विषयों का वर्णन किया गया है। आयत के पहले भाग में पिछली आयतों की बहस को जारी रखते हुए खाने की हराम अर्थात वर्जित वस्तुओं का उल्लेख है। इसमें दस प्रकार के हराम मांसों का वर्णन है जिनमें से कुछ वे जानवर हैं जो प्राकृतिक रूप से या किसी घटनावश मर गए हैं और चूंकि उन्हें ज़िबह नहीं किया गया है अतः उनका मांस खाना हराम है। कुछ दूसरों का मांस हलाल होने और उनके ज़िबह होने के बावजूद, उन्हें नहीं खाया जा सकता क्योंकि उन्हें अल्लाह के अतिरिक्त किसी और के नाम पर ज़िबह किया गया है।इससे पता चलता है कि ईश्वर द्वारा निर्धारित हलाल या हराम अर्थात वैध या वर्जित केवल मानव शरीर के लाभ या हानि पर आधारित नहीं है वरना उस जानवर के मांस में कोई अंतर नहीं है जो ईश्वर के नाम पर ज़िबह हो या किसी अन्य के नाम पर। परन्तु यह बात मनुष्य की आत्मा और उसके मानस पर अवश्य ही ऐसा प्रभाव डालती है कि ईश्वर ने ऐसे जानवरों का मांस खाने से रोका है।अलबत्ता जैसा कि ईश्वर ने क़ुरआने मजीद की कुछ अन्य आयतों में संकेत किया है कि जब मनुष्य विवश हो जाए तो मरने से बचने के लिए आवश्यकता भर वर्जित वस्तु खाना वैध है। परन्तु इसकी शर्त यह है कि मनुष्य ने पाप करने के लिए स्वयं इस विवशता की भूमिका न बनाई हो।जैसाकि हमने कहा कि इस आयत के दो भाग हैं। पहला भाग उन बातों पर आधारित था जिनका हमने अभी वर्णन किया। इस आयत का दूसरा भाग मुसलमानों के इतिहास के एक महान और निर्णायक दिन का परिचय करवाता है। वह दिन जब क़ुरआन के शब्दों में, मुसलमानों पर वर्चस्व की ओर से काफ़िर निराश हो गए, वह दिन जब इस्लाम अपनी परिपूर्णता को पहुंचा और ईश्वर ने ईमान वालों पर अपनी अनुकंपाएं पूरी कर दीं।यह कौन सा दिन है? इस्लामी इतिहास या पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के जीवन का वह कौन सा दिन है जिसमें ऐसी विशेषता पाई जाती है? क्या पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पैग़म्बर घोषित होने का दिन, अपने पूरे महत्व के साथ, धर्म की परिपूर्णता का दिन है? या मक्के से मदीने की ओर पैग़म्बर की हिजरत का दिन यह विशेषताएं रखता है?इन प्रश्नों के उत्तर के लिए हमें यह देखना होगा कि यह आयत कब उतरी है ताकि पता चल सके कि आयत में किस दिन की ओर संकेत किया गया है। क़ुरआन के सभी व्याख्याकारों का मानना है कि यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अन्तिम हज की यात्रा के दौरान और उनकी आयु के अन्तिम दिनों में उतरी है। एक गुट का यह मानना है कि उक्त आयत ९ ज़िलहिज्जा को उतरी जबकि अधिकांश लोगों का कहना है कि यह आयत १८ ज़िलहिज को ग़दीरे ख़ुम नामक स्थान पर उतरी।विख्यात इतिहासकारों के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने ग़दीरे ख़ुम के स्थान पर हाजियों के सामने एक विस्तृत ख़ुतबा दिया और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बातें बयान कीं। इन बातों में सबसे महत्वपूर्ण विषय उनके उत्तराधिकार का था। इस अवसर पर पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम को अपने हाथों पर उठाकर, जो ईमान और सभी युद्धों में पैग़म्बरे इस्लाम के साथ रहने की दृष्टि से, सभी ईमान वालों पर वरीयता रखते थे, लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि हे ईमान लाने वालो, जिस-जिस का मैं स्वामी हूं उसके ये अली स्वामी हैं।इस महत्त्वपूर्ण घटना के पश्चात सूरए माएदा की इस आयत का यह भाग उतरा कि आज वे काफ़िर निराश हो गए जिन्हें यह आशा थी कि पैग़म्बर के स्वर्गवास के पश्चात मुसलमानों पर वे विजयी हो जाएंगे और इस्लाम को जड़ से समाप्त कर देंगे। क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम का न तो कोई पुत्र है और न ही उन्होंने किसी को अपना उत्तराधिकारी निर्धारित किया है। परन्तु इस आयत के उतरते ही काफ़िरों की आशा, निराशा में परिवर्तित हो गई।दूसरी ओर ईश्वरीय आदेशों और क़ानूनों का संग्रह धर्म, किसी ईश्वरीय व न्यायप्रेमी नेता के बिना अधूरा था। पैग़म्बर के पश्चात के नेता के निर्धारण के पश्चात धर्म भी पूर्ण हो गया और ईश्वर ने पैग़म्बर तथा क़ुरआन के आने के पश्चात लोगों को मार्गदर्शन की जो अनुकंपा दी थी उसे ही हज़रत अली अलैहिस्सलाम को पैग़म्बरे इस्लाम का उत्तरदायी निर्धारित करके पूरा कर दिया। इस प्रकार यह धर्म ईश्वर की पसंद का पात्र बना।इस आयत से हमें अनेक पाठ मिलते हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं। न्यायप्रेमी और ईश्वरीय नेता का अस्तित्व इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसके बिना धर्म पूरा नहीं है क्योंकि नेतृत्व के बिना सारी अनुकंपाएं और शक्तियां बेकार रहती हैं। इस्लाम का जीवन और उसकी सुदृढ़ता सही नेतृत्व अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पश्चात बारह इमामों की इमामत स्वीकार करने में निहित है। इन इमामों में पहले इमाम हज़रत अली अलैहिस्सलाम हैं और अन्तिम, इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम हैं जो हमारी आंखों से ओझल हैं।