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    सूरए माएदा; आयत 69-71 (कार्यक्रम 180)

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    आइए अब सूरए माएदा की 69वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ آَمَنُوا وَالَّذِينَ هَادُوا وَالصَّابِئُونَ وَالنَّصَارَى مَنْ آَمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ وَعَمِلَ صَالِحًا فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ (69)निसन्देह, जो लोग (पैग़म्बरे इस्लाम पर) ईमान लाए, और यहूदियों, ईसाइयों तथा साबेईन अर्थात सितारों की पूजा करने वालों में से जो लोग भी ईश्वर तथा प्रलय पर (सच्चा) ईमान लाएं और भले कर्म करें तो उनके लिए न कोई भय होगा और न ही वे दुखी होंगे। (5:69)पिछले कार्यक्रम में 68वीं आयत में इस बात की ओर संकेत किया गया था कि किसी भी आसमानी धर्म के अनुयाइयों का तब तक ईश्वर के निकट कोई महत्त्व नहीं है जब तक वे अपनी आसमानी किताबों के आदेशों का पालन न करें और समाज को उसके अनुसार स्थापित न करें।यह आयत कहती है कि किसी भी ईश्वरीय धर्म के अनुयाइयों को दूसरों पर वरीयता प्राप्त नहीं है। मुस्लिम, यहूदी, ईसाई या साबेई होना, जो हज़रत नूह और हज़रत यहया जैसे पैग़म्बरों के अनुयाई हैं तथा अधिक संख्या, प्राचीनतम होना और उस समुदाय में अधिक पैग़म्बरों का आना, इनमें से कोई भी बात वरीयता और श्रेष्ठता का मापदण्ड नहीं है। ईश्वर के निकट केवल उन लोगों का महत्त्व है जो ईश्वर और प्रलय पर ईमान रखते हों और समाज में भले कर्म करते हों। अलबत्ता यह बात स्पष्ट है कि प्रत्येक ईश्वरीय धर्म के अनुयाइयों को अगले पैग़म्बर के आने के पश्चात उस पर ईमान लाना अर्थात उसे स्वीकार करना चाहिए और उसके बताए हुए मार्ग पर चलना चाहिए। यदि ऐसा न हो तो नए पैग़म्बरों को भेजना निर्रथक होगा और ईश्वर कभी कोई निरर्थक काम नहीं करता। अतः चूंकि हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ईश्वर के अंतिम पैग़म्बर हैं इसलिए ईश्वर पर वास्तविक ईमान के लिए, उन पर ईमान लाना आवश्यक है।इस आयत से हमने सीखा कि सभी आसमानी धर्मों में मुक्ति और कल्याण का आधार ईमान तथा शिष्ट कर्म हैं न कि ज़बानी दावे।मनुष्य को वास्तविक शांति केवल ईश्वर और प्रलय पर ईमान की छाया में ही प्राप्त हो सकती है।आइए अब सूरए माएदा की 70वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।لَقَدْ أَخَذْنَا مِيثَاقَ بَنِي إِسْرَائِيلَ وَأَرْسَلْنَا إِلَيْهِمْ رُسُلًا كُلَّمَا جَاءَهُمْ رَسُولٌ بِمَا لَا تَهْوَى أَنْفُسُهُمْ فَرِيقًا كَذَّبُوا وَفَرِيقًا يَقْتُلُونَ (70)निसन्देह, हमने बनी इस्राईल से परीक्षा ली और उनकी ओर पैग़म्बर भेजे, तो जब भी कोई पैग़म्बर उनकी आंतरिक इच्छाओं के विरुद्ध कोई आदेश लेकर आता तो वे कुछ पैग़म्बरों को झुठला देते और कुछ की हत्या कर दिया करते थे। (5:70)जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने बनी इस्राईल को फ़िरऔन के अत्याचारों से मुक्ति दिलाकर उन्हें स्वतंत्र करा दिया तो ईश्वर की आज्ञा से उन्होंने बनी इस्राईल से वचन लिया कि वे ईश्वरीय आदेशों का पालन करेंगे और उन पर कटिबद्ध भी रहेंगे। बनी इस्राईल ने यह बात स्वीकार कर ली।परन्तु जैसा कि क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में कहा गया है कि उन्होंने अपने इस वचन को तोड़ दिया और न केवल ईश्वरीय आदेशों का उल्लंघन किया बल्कि ईश्वर के पैग़म्बरों को इस अपराध के बदले में, कि वे उनकी आंतरिक इच्छाओं के विरुद्ध आदेश लेकर आए हैं, झुठला दिया, यहां तक कि कुछ की हत्या भी कर दी।यह आयत मुसलमानों के लिए एक चेतावनी है कि वे अपने उत्तराधिकारियों के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की सिफ़ारिशों को भुला न दें और इस सूरे में अब तक दो बार वर्णित होने वाले ग़दीर के वचन पर कटिबद्ध रहें।इस आयत से हमने सीखा कि काफ़िरों की ओर से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी का इन्कार, बुद्धि तथा तर्क के आधार पर नहीं है। इन विरोधों का असली कारण यह है कि मनुष्य चाहता है कि उसका मन जो चाहे वही करे और अपनी ग़लत आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति में स्वतंत्र रहे, जबकि ईश्वरीय धर्म मनुष्य की इच्छाओं और भावनाओं को नियंत्रित करता है ताकि मनुष्य के मानवीय पहलू, प्रगति करके पूर्ण हो जाएं।ग़लत समाज में पवित्र और भले लोगों के व्यक्तित्व की हत्या की जाती है अर्थात उन्हें झुठलाया जाता है या स्वयं उनकी हत्या कर दी जाती है।आइए अब सूरए माएदा की 71वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَحَسِبُوا أَلَّا تَكُونَ فِتْنَةٌ فَعَمُوا وَصَمُّوا ثُمَّ تَابَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ ثُمَّ عَمُوا وَصَمُّوا كَثِيرٌ مِنْهُمْ وَاللَّهُ بَصِيرٌ بِمَا يَعْمَلُونَ (71)और यहूदियों ने सोचा कि उनके लिए कोई मुसीबत या परीक्षा नहीं होगी तो वे (सत्य को देखने और सुनने की ओर से) अंधे और बहरे हो गए। फिर ईश्वर ने उनकी तौबा स्वीकार कर ली। एक बार फिर उनमें से अधिकांश लोग (ईश्वरीय आयतों को देखने और सुनने की ओर से) अंधे और बहरे हो गए और जो कुछ वे करते हैं, ईश्वर उससे भलि भांति अवगत है। (5:71)जैसा कि हमने पिछले कार्यक्रमों के कहा, यहूदी जाति स्वयं को अन्य लोगों से श्रेष्ठ और ईश्वर से निकट समझती थी। अतः यहूदियों का विचार था कि ईश्वर की ओर से उनकी परीक्षा नहीं ली जाएगी। और यदि ली भी गई तो वे चाहे जो भी करें उन्हें दण्डित नहीं किया जाएगा या फिर परीक्षा (दण्ड) का समय बहुत ही थोड़ा होगा।इसी अनुचित घमण्ड और अंहकार ने उन्हें अंधा और बहरा बना दिया और वे इस वास्तविकता को नहीं समझ पाए कि परीक्षा और उसके पश्चात पारितोषिक या दण्ड एक सर्वकालिक ईश्वरीय परंपरा है और कोई भी इसका अपवाद नहीं है। सभी मनुष्यों की परीक्षा होनी चाहिए ताकि वे अपने भीतर की बातों को स्पष्ट कर सकें।अलबत्ता ईश्वर अत्यंत दयावान है और मनुष्य द्वारा एक बार ग़लती और उल्लंघन के कारण, उसपर अपनी दया के द्वार बंद नहीं करता। अतः ईश्वर ने बारंबार उनकी तौबा स्वीकार की, परन्तु उनमें से कुछ ने ईश्वरीय आयतों और धार्मिक वास्तविकताओं की उपेक्षा का संकल्प कर रखा था, अतः स्वाभाविक रूप से ईश्वरीय दया व कृपा प्राप्त करने की उनमें कोई क्षमता नहीं रह गई।इस आयत से हमने सीखा कि घमण्ड और अहंकार पर आधारित अनुचित विचार, मनुष्य को वास्तविकताओं की सही पहचान से वंचित कर देते हैं।चाहे मनुष्य ईश्वर का इन्कार करे और सृष्टि में उसके अस्तित्व को न देखे परन्तु ईश्वर सदैव ही मनुष्य को देख रहा है।{