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    सूरए माएदा; आयत 72-75 (कार्यक्रम 181)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 72वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।لَقَدْ كَفَرَ الَّذِينَ قَالُوا إِنَّ اللَّهَ هُوَ الْمَسِيحُ ابْنُ مَرْيَمَ وَقَالَ الْمَسِيحُ يَا بَنِي إِسْرَائِيلَ اعْبُدُوا اللَّهَ رَبِّي وَرَبَّكُمْ إِنَّهُ مَنْ يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدْ حَرَّمَ اللَّهُ عَلَيْهِ الْجَنَّةَ وَمَأْوَاهُ النَّارُ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنْصَارٍ (72)वे लोग काफ़िर हो गए जिन्होंने कहा कि मरयम के पुत्र (ईसा) मसीह ही ईश्वर हैं, जबकि स्वयं (ईसा) मसीह ने बनी इस्राईल से कहा कि ईश्वर की उपासना करो जो मेरा और तुम्हारा पालनहार है। निःसन्देह, जिसने किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराया, ईश्वर उसपर स्वर्ग को हराम अर्थात वर्जित कर देगा तथा उसका ठिकाना नरक होगा और अत्याचारियों का कोई सहायक नहीं होगा। (5:72)पिछले कुछ कार्यक्रमों में क़ुरआने मजीद ने यहूदी जाति की विचार व ज्ञान संबंधी पथभ्रष्टताओं की ओर संकेत करते हुए उन्हें उनका अतीत याद दिलाया ताकि वे शत्रुता व द्वेष को छोड़ कर सत्य स्वीकार करे लें।यह आयत और इसके बाद की आयतें, ईसाइयों को संबोधित करते हुए कहती हैं कि तुम लोग किस प्रकार से ईसा मसीह को, जो ईश्वर के पैग़म्बर थे, ईश्वर के समान ठहराते हो और उन्हें ईश्वर का स्थान देते हो? क्या स्वयं ईसा मसीह ने यह दावा किया था या यहूदियों के मुक़ाबले में अपने धर्म को बढ़ाने के लिए तुम लोगों ने ऐसी बातें गढ़ ली हैं?इसके पश्चात क़ुरआने मजीद इस प्रकार की आस्था के ख़तरों की ओर संकेत करते हुए कहता है कि ईसा मसीह के बारे में तुम्हारी अतिशयोक्ति न केवल यह कि ईमान में तुम्हारी श्रेष्ठता का कारण नहीं है बल्कि एकेश्वरवाद से दूरी का भी कारण है। इस दावे से न केवल यह कि तुम ईश्वर के निकट नहीं होगे बल्कि ईसा मसीह को ईश्वर का समकक्ष ठहरा कर तुम उससे दूर हो जाओगे और संसार की यही दूरी प्रलय में ईश्वरीय स्वर्ग से दूरी तथा नरक में जाने का कारण बनेगी और नरक का दण्ड किसी के लिए भी सहनीय नहीं होगा और न ही वहां पर किसी सहायता की संभावना है।विचित्र बात यह है कि हमारे समय में मौजूद इंजील या बाइबिल में भी, कहीं पर भी ईसा मसीह का इस प्रकार का दावा वर्णित नहीं है बल्कि इंजील के एक स्थान पर ईसा मसीह ने कहा है कि हमारा ईश्वर बस अनन्य ईश्वर है।इस आयत से हमने सीखा कि जिस प्रकार से ईमान और कर्मों में कमी करना स्वीकार्य नहीं है उसी प्रकार से ईश्वरीय नेताओं के बारे में अतिशयोक्ति भी उचित और वैध नहीं है। अतिश्योक्ति एक प्रकार का कुफ़्र और अनेकेश्वरवाद है चाहे उसका दावेदार, ईमान का दावा ही क्यो न करता हो।कोई भी यहां तक कि ईसा मसीह भी नरकवासियों को ईश्वर के दण्ड से मुक्ति नहीं दिला सकते। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हज़रत ईसा मसीह हमारी मुक्ति के लिए स्वयं को बलिदान कर देंगे।आइए अब सूरए माएदा की 73वीं और 74वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।لَقَدْ كَفَرَ الَّذِينَ قَالُوا إِنَّ اللَّهَ ثَالِثُ ثَلَاثَةٍ وَمَا مِنْ إِلَهٍ إِلَّا إِلَهٌ وَاحِدٌ وَإِنْ لَمْ يَنْتَهُوا عَمَّا يَقُولُونَ لَيَمَسَّنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (73) أَفَلَا يَتُوبُونَ إِلَى اللَّهِ وَيَسْتَغْفِرُونَهُ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ (74)निसन्देह, वे लोग काफ़िर हो गए जिन्होंने कहा कि ईश्वर तीन में का तीसरा है, जबकि ईश्वर के अतिरिक्त और कोई पूज्य नहीं है और यदि यह लोग यह कहना नहीं छोड़ेंगे तो इनमें के काफ़िरों पर कड़ा दण्ड उतरेगा। (5:73) यह लोग ईश्वर की ओर क्यों नहीं पलटते (और तौबा अर्थात प्रायश्चित क्यों नहीं करते) कि ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (5:74)पिछली आयत में हज़रत ईसा मसीह के बारे में इसाइयों के विचारों का वर्णन हुआ कि वे उन्हें मनुष्य के स्तर से बढ़ा कर ईश्वर की सीमा तक ले जाते हैं। यह आयत सृष्टिकर्ता ईश्वर के बारे में उनके विचारों का उल्लेख करती है कि वे उसे उसके स्थान से नीचे लाकर तीन ईश्वरों में से एक ईश्वर मानते हैं। जबकि उसके ईश्वर होने की विशेषता, उसके सृष्टिकर्ता होने की विशेषता से अलग नहीं है और यदि सृष्टिकर्ता एक है तो फिर ईश्वर भी एक ही है।आगे चलकर आयत इस पथभ्रष्ट विचार पर अड़े रहने वालों को सचेत करती है कि जो लोग अपने विचारों और आस्थाओं को सुधारने के लिए तैयार नहीं हैं, उन्हें कड़ा ईश्वरीय दण्ड भुगतना होगा परन्तु यदि वे तौबा करने और एकमात्र ईश्वर की ओर पलट आएं तो निसन्देह, ईश्वरीय दया व क्षमा के पात्र बनकर मुक्ति पा जाएंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद, पिछले धर्मों और पैग़म्बरों का इन्कार करने के बजाए उन्हें स्वीकार करते हुए पिछले पैग़म्बरों की किताबों और शिक्षाओं में किये जाने वाले फेर-बदल को दूर करने के लिए क़दम बढ़ाता है।कुफ़्र का अर्थ, केवल ईश्वर का इन्कार ही नहीं है, किसी के ईश्वर के समकक्ष होने पर विश्वास और आस्था भी एक प्रकार का कुफ़्र ही है।ईश्वर अतीत को भी क्षमा कर देता है और भविष्य को भी अपनी दया व कृपा से सुरक्षित बना देता है, परन्तु पापों से तौबा इसकी शर्त है।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 75 की तिलावत सुनते हैं।مَا الْمَسِيحُ ابْنُ مَرْيَمَ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهِ الرُّسُلُ وَأُمُّهُ صِدِّيقَةٌ كَانَا يَأْكُلَانِ الطَّعَامَ انْظُرْ كَيْفَ نُبَيِّنُ لَهُمُ الْآَيَاتِ ثُمَّ انْظُرْ أَنَّى يُؤْفَكُونَ (75)मरयम के पुत्र (ईसा) मसीह, पैग़म्बर के अतिरिक्त कुछ नहीं, उनसे पहले भी पैग़म्बर गुज़र चुके हैं और उनकी माता भी सिद्दीक़ा अर्थात अत्यंत सत्य बोलने वाली थीं। वे दोनों (अन्य लोगों की भांति ही) खाना खाया करते थे। (हे पैग़म्बर!) देखिए कि हम अपनी निशानियों को किस प्रकार (स्पष्ट रूप से) बयान करते हैं और फिर देखिए कि यह लोग किस प्रकार (सत्य की ओर से) मुंह मोड़ लेते हैं। (5:75)पिछली आयतों में हज़रत ईसा मसीह और ईश्वर के बारे में ईसाइयों की आस्थाओं का वर्णन करने के पश्चात, क़ुरआन मजीद तीन तर्क प्रस्तुत करता है कि ईसा मसीह ईश्वर नहीं हैं।प्रथम यह कि माता हज़रत मरयम से उनका जन्म हुआ और ईश्वर का जन्म नहीं होता।दूसरे यह कि उनसे पहले हज़रत आदम अलैहिस्सलाम जैसे पैग़म्बर गुज़रे हैं जिनके माता और पिता दोनों ही नहीं थे परन्तु किसी ने उन्हें ईश्वर नहीं कहा।तीसरे यह कि यदि यह मान लिया जाए कि हज़रत ईसा जन्म के पश्चात ईश्वर बने तो फिर क्यों वे और उनकी माता अन्य लोगों की भांति खाना खाते थे और जीवन के अंत तक उन्हें खाने की आवश्यकता रही। आवश्यकता रखने वाला यह कैसा ईश्वर है जिसे तुमने स्वीकार कर लिया है।इस आयत से हमने सीखा कि कुछ विशिष्टताएं प्राप्त होना, ईश्वर होने का प्रमाण नहीं है यहां तक कि पैग़म्बरों के चमत्कार भी उनके ईश्वर होने का तर्क नहीं हैं।सच बोलना और अच्छा जीवन चरित्र, ईश्वर के निकट मनुष्य की सबसे महत्त्वपूर्ण मान्यताओं में से एक है। ईश्वर ने हज़रत मरयम की इसी विशेषता का उल्लेख करते हुए उनकी सराहना की है।हज़रत मरयम भी और उनके पुत्र ईसा मसीह भी, अनेक चमत्कारों और परिपूर्णताओं के बावजूद मनुष्य ही थे।