islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए माएदा; आयत 76-80 (कार्यक्रम 182)

    सूरए माएदा; आयत 76-80 (कार्यक्रम 182)

    Rate this post

    आइए पहले सूरए माएदा की 76वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ أَتَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّا وَلَا نَفْعًا وَاللَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ (76)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि क्या तुम ईश्वर के स्थान पर ऐसी वस्तुओं की उपासना करते हो जो तुम्हारे लिए लाभ और हानि की (भी) मालिक नहीं हैं और ईश्वर सुनने वाला (और) अत्यन्त जानकार है। (5:76)पिछले कार्यक्रमों की आयतों में हज़रत ईसा मसीह को ईश्वर मानने की ईसाइयों की आस्था के बारे में बात की गई थी। यह आयत उसी विषय को आगे बढ़ाते हुए कहती है।तुम किस प्रकार ईसा मसीह की उपासना करते हो जबकि वे न तो तुम्हें लाभ और न ही हानि पहुंचाने की क्षमता रखते हैं, जब ईश्वर का एक पैग़म्बर उसकी आज्ञा के बिना मानव जीवन में कोई भूमिका नहीं निभा सकता तो अन्य लोगों और वस्तुओं की उपासना के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता।इस आयत से हमने सीखा कि अनेकेश्वरवाद के मार्ग का असत्य होना, थोड़े से ध्यान व चिंतन से स्पष्ट हो जाता है, अतः ईश्वर मनुष्य से यह प्रश्न करता है कि क्या वे बातें या वस्तुएं जिनका तुम्हारे जीवन में कोई प्रभाव नहीं है, उपासना योग्य हैं।ईश्वर के अतिरिक्त जिनकी उपासना की जाती है वे मनुष्य की आवश्यकताओं को देखने, सुनने और समझने तक में अक्षम हैं, उन आवश्यकताओं की पूर्ति तो दूर की बात है।आइए अब सूरए माएदा की 77वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لَا تَغْلُوا فِي دِينِكُمْ غَيْرَ الْحَقِّ وَلَا تَتَّبِعُوا أَهْوَاءَ قَوْمٍ قَدْ ضَلُّوا مِنْ قَبْلُ وَأَضَلُّوا كَثِيرًا وَضَلُّوا عَنْ سَوَاءِ السَّبِيلِ (77)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि हे आसमानी किताब वालो! अपने धर्म में अनुचित अतिशयोक्ति न करो, और उन लोगों का अनुसरण न करो जो इससे पूर्व पथभ्रष्ट हो गए और जिन्होंने बहुत से लोगों को पथभ्रष्ट किया और अब भी सत्य के मार्ग से विचलित हैं। (5:77)पिछली आयतों में आसमानी किताब वालों को अपने पैग़म्बरों के बारे में अतिशयोक्ति से रोकने के पश्चात इस आयत में ईश्वर पुनः उन्हें अपने धर्म में अतिशयोक्ति से रोकते हुए कहता है।ईश्वरीय पैग़म्बरों की परिपूर्णताओं और चमत्कारों का वर्णन तुम्हें अतिशयोक्ति में न फंसा दे और तुम कुछ बातों को अनुचित ढंग से उनसे संबंधित करने लगो।मानव इतिहास अतिशयोक्ति और कमी से भरा हुआ है। कुछ गुटों ने ईश्वरीय पैग़म्बरों को साधारण मनुष्यों के स्तर से भी नीचे लाकर उन्हें पागल और दीवाना कहा जबकि कुछ अन्य गुटों ने पैग़म्बरों को मनुष्य से स्तर से बढ़ा कर उन्हें ईश्वर की सीमा तक पहुंचा दिया।जबकि पैग़म्बर ही अन्य लोगों की भांति ही मनुष्य हैं जिनमें अपनी पवित्रता और भलाई के चलते वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश प्राप्त करने की योग्यता उत्पन्न हो गई है। आगे चलकर आयत यहूदियों और इसाइयों की इस प्रकार की अतिशयोक्तिपूर्ण आस्थाओं को, उनसे पहले के अनेकेश्वरवादियों की आस्थाओं के समान बताती है जो भौतिक वस्तुओं को ईश्वर मानते थे। इस आयत से हमने सीखा कि धर्म का आधार संतुलन पर है। धार्मिक नेताओं के बारे में किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति, धर्म के आधार से मेल नहीं खाती।आइए अब सूरए माएदा की 78वीं और 79वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।لُعِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ بَنِي إِسْرَائِيلَ عَلَى لِسَانِ دَاوُودَ وَعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ ذَلِكَ بِمَا عَصَوْا وَكَانُوا يَعْتَدُونَ (78) كَانُوا لَا يَتَنَاهَوْنَ عَنْ مُنْكَرٍ فَعَلُوهُ لَبِئْسَ مَا كَانُوا يَفْعَلُونَ (79)बनी इस्राईल में जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया, उन पर दाऊद और मरयम के पुत्र ईसा की ज़बान से लानत अर्थात धिक्कार की गई। यह लानत उनके पापों और अतिशयोक्ति के दण्ड स्वरूप थी। (5:78) वे जो भी बुराई करते थे उसे (न स्वयं) छोड़ते थे (और न ही दूसरों को रोकते थे) और कितना बुरा कर्म था जो वे किया करते थे। (5:79)यद्यपि सारे ईश्वरीय पैग़म्बर ईश्वर की दया और मार्गदर्शन के साधन हैं परन्तु वे रंगभेद और जातिवाद के समर्थक नहीं हैं कि अपनी जाति के ग़लत व्यवहार की अनदेखी करें और चुप रहकर उसकी पुष्टि करें।इतिहास में वर्णित है कि जब बनी इस्राईल के लोगों ने शनिवार को मछलियों का शिकार न करने के बारे में ईश्वरीय आदेश का उल्लंघन किया तो हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने उन पर लानत की।इसी प्रकार जब बनी इस्राईल के बड़े-बूढ़ों ने हज़रत ईसा से कहा कि वे आसमान से दस्तरख़ान मंगवाएं तो वे उनपर ईमान ले आएंगे, और आसमान से दस्तरख़ान आने के बाद भी जब कुछ लोगों ने इस ईश्वरीय चमत्कार को मानने से इन्कार कर दिया तो वे हज़रत ईसा मसीह की लानत का पात्र बने।आगे चलकर आयत एक महत्वपूर्ण सामाजिक विषय की ओर संकेत करते हुए कहती है कि न केवल पापी पाप करते हैं और ईश्वरीय सीमाओं को पार कर जाते हैं बल्कि भले लोग भी चुप रहकर उनके पापों की भूमि समतल करते थे और उन्हें ईश्वर की अवज्ञा से नहीं रोकते थे।इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बर प्रेम और स्नेह की मूर्ति होते हैं परन्तु कभी वे आक्रोश करते और श्राप भी दे देते हैं तथा ईश्वरीय सीमाएं पार करने वालों के साथ सांठ-गांठ नहीं करते।बनी इस्राईल ने सदैव ही क़ानूनों का उल्लंघन किया और ईश्वरीय सीमाएं पार की हैं। केवल पापी ही नहीं बल्कि चुप रह कर उनके पाप की भूमि को समतल करने वाला भी ईश्वर के क्रोध का पात्र है।आइए अब सूरए माएदा की 80वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।تَرَى كَثِيرًا مِنْهُمْ يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَبِئْسَ مَا قَدَّمَتْ لَهُمْ أَنْفُسُهُمْ أَنْ سَخِطَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَفِي الْعَذَابِ هُمْ خَالِدُونَ (80)(हे पैग़म्बर!) आप अधिकांश यहूदियों को देखते हैं कि (वे ईमान वालों के स्थान पर) काफ़िरों को अपना अभिभावक बताते हैं। इन्होंने अपने आपके लिए पहले से जो भेजा है वह कितना बुरा है जिस पर ईश्वर क्रुद्ध होता है और वे सदैव ईश्वरीय दण्ड में रहने वाले हैं। (5:80)बनी इस्राईल के इतिहास के वर्णन को जारी रखते हुए यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लालो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि वे न केवल इस्लाम के आने से पूर्व, बल्कि इस्लाम के आने के पश्चात भी मुसलमानों से मित्रता के स्थान पर काफ़िरों से मित्रता को वरीयता देते हैं और यह भी ईश्वरीय पैग़म्बरों की लानत तथा धिक्कार के कारणों में से एक कारण है।इस आयत से हमने सीखा कि काफ़िरों की अभिभावकता स्वीकार करना, चाहे वह जिस स्वरूप और मात्रा में हो, ईश्वर के क्रोध का कारण है।प्रलय, संसार में किये गए मनुष्यों के कर्मों का फल है। नरक वह आग है जो स्वयं मनुष्य ने अपने हाथों से भड़काई है।