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    सूरए माएदा; आयत 81-83 (कार्यक्रम 183)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 81वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ كَانُوا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالنَّبِيِّ وَمَا أُنْزِلَ إِلَيْهِ مَا اتَّخَذُوهُمْ أَوْلِيَاءَ وَلَكِنَّ كَثِيرًا مِنْهُمْ فَاسِقُونَ (81)और यदि वे ईश्वर, पैग़म्बर और जो कुछ उनपर उतरा है, उस पर ईमान ले आते तो कदापि काफ़िरों को अपना अभिभावक न बनाते परन्तु उनमें के अधिकांश लोग अवज्ञाकारी हैं। (5:81)पिछले कार्यक्रम में, आयत संख्या ८० की व्याख्या में हमने सुना था कि ईश्वर ने कहा, अनेक यहूदी, काफ़िरों को अपना मित्र तथा अभिभावक बताते हैं जो उन पर ईश्वर के कोप का कारण है, इसी संबंध में यह आयत कहती है कि काफ़िरों से मित्रता और उनकी अभिभावकता को स्वीकार करना, इस बात की निशानी है कि यहूदी वास्तव में ईश्वर, पैग़म्बर और आसमानी किताब पर ईमान नहीं लाए हैं, वरना ईश्वर पर ईमान और काफ़िरों की अभिभावकता दोनों को एक साथ स्वीकार किया ही नहीं जा सकता।यह आयत यहूदियों की आलोचना करते हुए कहती है कि वे न केवल पैग़म्बरे इस्लाम व क़ुरआन पर ईमान नहीं लाते बल्कि अपने पैग़म्बर और अपनी आसमानी किताब पर भी वास्तविक ईमान नहीं रखते हैं और उसके विरुद्ध काम करते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि काफ़िरों के वर्चस्व से मुक्ति पाने और वास्तविक स्वाधीनता प्राप्त करने का मार्ग, ईश्वर और आसमानी किताब पर ईमान है।काफ़िरों का वर्चस्व स्वीकार करना तथा उनसे सांठ-गांठ करना, अवज्ञा तथा अधर्म की निशानी है।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 82 की तिलावत सुनते हैं।لَتَجِدَنَّ أَشَدَّ النَّاسِ عَدَاوَةً لِلَّذِينَ آَمَنُوا الْيَهُودَ وَالَّذِينَ أَشْرَكُوا وَلَتَجِدَنَّ أَقْرَبَهُمْ مَوَدَّةً لِلَّذِينَ آَمَنُوا الَّذِينَ قَالُوا إِنَّا نَصَارَى ذَلِكَ بِأَنَّ مِنْهُمْ قِسِّيسِينَ وَرُهْبَانًا وَأَنَّهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ (82)(हे पैग़म्बर) आप देखेंगे कि ईमान वालों से शत्रुता के मामले में यहूदी और अनेकेश्वरवादी सबसे आगे हैं और ईमान वालों से मित्रता की दृष्टि से, उनसे सबसे निकट आपको वे लोग मिलेंगे जो कहते हैं कि हम ईसाई हैं। यह मित्रता इस कारण है कि उनमें बहुत से पादरी और वैरागी उपासक हैं जो (सत्य के समक्ष) घमण्ड नहीं करते। (5:82)इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी की घोषणा के पांचवें वर्ष उनके आदेश पर, मक्के के अनेकेश्वरवादियों की यातनाओं से बचने के लिए, मुसलमानों का एक गुट अफ़्रीक़ा के तत्कालीन देश हबशा की ओर पलायन कर गया। हब्शा का राजा नज्जाशी ईसाई था परन्तु उसने मुसलमानों का भरपूर स्वागत किया और उन्हें मक्के के अनेकेश्वरवादियों के प्रतिनिधि के हवाले करने पर तैयार नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त नज्जाशी और उसके दरबार में उपस्थित पादरियों की आंखों में, मुसलमानों के प्रतिनिधि जाफ़र इब्ने अबी तालिब द्वारा पढ़ी गई सूरए मरयम की आयतों को सुनकर आंसू आ गए और उन्होंने मुसलमानों का समर्थन किया।परन्तु पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के मदीने, पलायन के पश्चात, यहूदियों ने, जिन्होंने आरंभ में मुसलमानों से समझौता किया था, अपना समझौता तोड़ दिया और वे मुसलमानों के विरुद्ध षड्यंत्र में अनेकेश्वरवादियों के साथ हो गए। यहां तक कि उन्होंने अहज़ाब नामक युद्ध की आग भड़का दी। अतः क़ुरआन इस आयत में इन दोनों गुटों के विभिन्न व्यवहार की तुलना करते हुए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करता है और कहता है कि इस प्रकार के ईसाई आपसे अधिक निकट हैं क्योंकि इनके बीच ऐसे धर्मगुरू हैं जो सत्य के सामने सिर झुका देते हैं परन्तु यहूदी न केवल यह कि आपका समर्थन नहीं करते बल्कि अनेकेश्वरवादियों से गठजोड़ करके आपके विरुद्ध षड्यंत्र रचते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि मुसलमानों से यहूदियों की शत्रुता इस्लाम के आरंभिक काल से ही चली आ रही है, यदि आज इस्राईल, फ़िलिस्तीन की भूमि हड़प करता है और फ़िलिस्तीनियों को उनके देश से बाहर निकालता है तो इस्लाम के आरंभिक काल में भी यहूदी, मुसलमानों को मदीने से बाहर निकालना चाहते थे परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली।राष्ट्रों व जातियों के सामाजिक दिशा निर्देश में धर्म गुरुओं और उपासकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उनका सुधार, समाज के सुधार और उनकी बुराई, समाज की बुराई का कारण बनती है।इस्लाम में अनुचित सांप्रदायिकता नहीं है और वह अन्य धर्मों के अनुयाइयों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करता है। अगली आयत में ईश्वर ईसाई धर्म के धर्मगुरुओं और उपासकों की सराहना करता है।आइए अब सूरए माएदा की 83वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا سَمِعُوا مَا أُنْزِلَ إِلَى الرَّسُولِ تَرَى أَعْيُنَهُمْ تَفِيضُ مِنَ الدَّمْعِ مِمَّا عَرَفُوا مِنَ الْحَقِّ يَقُولُونَ رَبَّنَا آَمَنَّا فَاكْتُبْنَا مَعَ الشَّاهِدِينَ (83)और (वे ईसाई पादरी और उपासक) जब भी पैग़म्बरे इस्लाम पर उतरने वाली आयतों को सुनते हैं तो तुम देखते हो कि सत्य को पहचान लेने के कारण उनकी आंखें आंसुओं से भर जाती हैं और वे कहते हैं कि हे हमारे पालनहार! हम ईमान ले आए और तू हमारा नाम (सत्य की) गवाही देने वालों में लिख ले। (5:83)पिछली आयत की व्याख्या में हमने कहा था कि जब जाफ़र इब्ने अबी तालिब ने हबशा के ईसाइयों के समक्ष सूरए मरयम की कुछ आयतों की तिलावत की तो उनकी आंखें आंसूओं से भर आईं। जब मुसलमानों का गुट हबशा से लौटा तो कुछ ईसाई भी उनके साथ, पैग़म्बर से मिलने के लिए आए और जब उन्होंने सूरए यासीन की आयतें सुनीं तो उनकी आखों से आंसू बहने लगे।इस आयत में ईश्वर उन ईसाइयों के पवित्र हृदय और सत्य स्वीकार करने की भावना की सराहना करता है जो सत्य सुनते ही उसे स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाते हैं।अलबत्ता स्पष्ट है कि वही आंसू मूल्यवान हैं जो सत्य की पहचान के साथ हों अन्यथा बिना पहचान के और गहराई के जल्द ही समाप्त हो जाने वाली किसी भी भावना का कोई महत्त्व नहीं है। यह आयत भलि-भांति स्पष्ट करती है कि मनुष्य वास्वतिकता और सत्य का खोजी है और यदि आत्मा पवित्र हो तो, वह सत्य और वास्वतविकता को पहचान लेता है और वर्षों तक मां से बिछड़े रहने के पश्चात उसकी बाहों में वापस पहुंचने वाले बच्चे की भांति रोने लगता है।मनुष्य की परिपूर्णता, प्रेम के साथ पहचान में निहित है अर्थात दिल भी स्वीकार करे और बुद्धि भी समझे और संतुष्ट हो जाए।यदि हृदय तैयार है तो मनुष्य वर्षों का रास्ता क्षणों में तय कर लेता है। कितने ऐसे मुसलमान थे जो वर्षों तक पैग़म्बर के साथ रहे परन्तु उन्होंने वास्तविकता को नहीं पहचाना और ईमान केवल उनकी ज़बान तक ही सीमित रहा, परन्तु कुछ ईसाई ऐसे थे जो ईश्वर का कथन सुनकर इस प्रकार परिवर्तित हुए कि ईश्वर ने उनकी सराहना की है।{