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    सूरए माएदा; आयत 84-88 (कार्यक्रम 184)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 84, 85 और 86वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।وَمَا لَنَا لَا نُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَمَا جَاءَنَا مِنَ الْحَقِّ وَنَطْمَعُ أَنْ يُدْخِلَنَا رَبُّنَا مَعَ الْقَوْمِ الصَّالِحِينَ (84) فَأَثَابَهُمُ اللَّهُ بِمَا قَالُوا جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا وَذَلِكَ جَزَاءُ الْمُحْسِنِينَ (85) وَالَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا أُولَئِكَ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ (86)(वे कहते हैं) हम ईश्वर पर और जो कुछ (उसकी ओर से) सत्य (के रूप में) हमारे पास आया है उस पर क्यों ईमान न लाएं? जबकि हमें आशा है कि हमारा पालनहार हमें भले लोगों के साथ स्वर्ग में प्रविष्ट करेगा, (5:84) तो ईश्वर ने (उनके) इस कथन (और गवाही) के बदले में उन्हें वे बाग़ दे दिये हैं जिनके नीचे नहरें बह रही हैं। वे सदैव उनमें रहेंगे और यही भले लोगों का बदला है। (5:85) और जो लोग काफ़िर हुए और जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया तो ऐसे लोग नरक में जाने वाले हैं। (5:86)जैसाकि पिछले कार्यक्रम में कहा गया था, ईसाईयों का एक गुट क़ुरआने मजीद की आयतें सुनकर आंसू बहाने लगा और उसने क़ुरआन की सत्यता की गवाही दी। यह आयत कहती है कि वे लोग क़ुरआन की सत्यता को इस प्रकार हृदय से स्वीकार कर रहे थे कि उन्होंने अपने आपसे कहा कि हम इस सत्य कथन पर जो ईश्वर की वाणी है और उसकी ओर से हमारे पास आया है क्यों ईमान न लाएं? क्या हम नहीं चाहते कि ईश्वर के भले बंदों के साथ स्वर्ग में जाएं?इन आयतों में ईश्वर भी, इस प्रकार से हृदय से की जाने वाली स्वीकारोक्ति का बदला, अपने सदैव रहने वाले स्वर्ग में प्रवेश बताता है कि जो पवित्र और भले लोगों का ठिकाना है और उनके अतिरिक्त कोई भी उनमें प्रवेश नहीं कर पाएगा।आगे चलकर आयत कहती है कि कुछ लोग, इस वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए और उन्होंने इसका इन्कार कर दिया। ऐसे लोगों का ठिकाना नरक है।इन आयतों से हमने सीखा कि जब मनुष्य सत्य को पहचान ले तो उसे न मानने का कोई भी बहाना स्वीकार्य नहीं है।ईश्वर के अस्तित्व पर ईमान, वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश पर ईमान से अलग नहीं है। ऐसे ईश्वर को मानना जो लोगों के मार्गदर्शन का ध्यान न रखे, निरर्थक है।अपनी अंतरात्मा की ओर पलटना और स्वयं से प्रश्न करना, सत्य को समझने और परिपूर्णता की ओर बढ़ने का मार्ग है। ईश्वर भी ऐसे लोगों की प्रशंसा और सराहना करता है।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 87 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ (87)हे ईमान वालो! जो पवित्र वस्तुएं ईश्वर ने तुम्हारे लिए हलाल की हैं उन्हें (अपने ऊपर) हराम या वर्जित मत करो और हद से मत बढ़ो कि ईश्वर हद से बढ़ जाने वालों को पसंद नहीं करता। (5:87)इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम लोगों को प्रलय में घटने वाली बातें बता रहे थे। इसका कुछ लोगों पर प्रभाव हुआ कि वे बहुत रोए और उन्होंने प्रण कर लिया कि इसके पश्चात वे अच्छे खाने नहीं खाएंगे और आराम को अपने लिए वर्जित कर लेंगे। उन्होंने निश्चय किया कि दिन में रोज़ा रखेंगे और रातों को उपासना करेंगे तथा अपनी पत्नियों से भी कोई संबंध नहीं रखेंगे। अपने इस निश्चय पर अडिग रहने के लिए उन्होंने सौगंध तक खा डाली।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने उन लोगों को मस्जिद में एकत्रित किया और उनसे कहा कि हमारा धर्म समाज से कट कर रहने वाला धर्म नहीं है, मै जो ईश्वर का दूत हूं, अपने घर और परिवार से अलग नहीं रहता हूं। मै अपने परिजनों के साथ रहता हूं उनके साथ खाना खाता हूं। अपनी पत्नियों से संबंध रखता हूं। जान लो कि जो कोई मेरी पद्धति के विपरीत करे वह मुसलमान नहीं है।यह आयत जीवन में संतुलन की ओर संकेत करती है। जिस प्रकार से ईश्वर ने कुछ बातों को तुम्हारे लिए वर्जित किया है और उनका करना वैध नहीं है, उसी प्रकार उसने कुछ बातों को तुम्हारे लिए हलाल किया है, जिन्हें अपने लिए वर्जित करना तुम्हारे लिए वैध नहीं है। मोमिन, ईश्वर के आदेशों पर नतमस्तक रहते हुए ईश्वर के क़ानूनों की सीमा के भीतर ही रहता है। वह न आगे बढ़ता है और न ही पीछे रहता है।ईश्वर द्वारा हलाल की गई वस्तुओं को अपने लिए वर्जित कर लेना, एक प्रकार से ईश्वरीय सीमाओं को पार करना है जो ईमान से मेल नहीं खाता।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने खाने पीने की वस्तुएं और वैध आनंद ईमान वालों के लिए रखे हैं तो उन्हें छोड़ देना एक प्रकार से, ईश्वरीय कृपाओं की अनदेखी है।इस्लाम, प्रवृत्ति का धर्म है और पवित्र वस्तुओं को छोड़ना मानव प्रवृत्ति से मेल नहीं खाता।इस्लाम में हद से आगे बढ़ना या पीछे हटना दोनों ही वर्जित है और दोनों एक प्रकार से ईश्वरीय सीमाओं का उल्लंघन है। न हलाल को हराम करना वैध है और न ही हराम को हलाल करना वैध है। यह काम मनुष्य का नहीं बल्कि ईश्वर का है।यद्यपि हमें स्वयं को हलाल वस्तुओं से वंचित नहीं करना चाहिए परन्तु उनसे लाभान्वित होने में अतिश्योक्ति नहीं करनी चाहिए।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 88 की तिलावत सुनते हैं।وَكُلُوا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللَّهُ حَلَالًا طَيِّبًا وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي أَنْتُمْ بِهِ مُؤْمِنُونَ (88)और जो कुछ ईश्वर ने तुम्हें हलाल और पवित्र रोज़ी दी है उसमें से खाओ और ईश्वर से डरते रहो कि जिसपर तुम ईमान रखते हो। (5:88)पिछली आयत में लोगों को हलाल और वैध आनंदों को छोड़ने से रोकने के पश्चात इस आयत में ईश्वर, हलाल और पवित्र वस्तुओं से लाभान्वित होने का आदेश देता है और कहता है कि यह मत सोचो कि सांसारिक वस्तुओं से लाभ उठाना कोई बुरी बात है बल्कि सभी सांसारिक विभूतियां तुम्हारे लिए ईश्वर की ओर से दी गई रोज़ी हैं और उसी ने उन्हें तुम्हारे लिए बनाया है। अतः तुम्हें उनसे लाभान्वित होना चाहिए।परन्तु इस संबंध में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सांसारिक विभूतियों से लाभान्वित होने में ईश्वर से भय और न्याय को दृष्टिगत रखना चाहिए और यह भी कि लाभान्वित होने का लक्ष्य और पद्धति कैसी है? अतः क़ुरआने मजीद की कुछ अन्य आयतों में ईश्वर कहता है कि खाओ-पियो परन्तु अपव्यय न करो, या यह कि खाओ और भले कर्म करो, और खाओ तथा दूसरों को खिलाओ।इस आयत से हमने सीखा कि सांसारिक संभावनाओं से लाभ उठाना न केवल ईमान के प्रतिकूल नहीं है बल्कि यह ईमान के लिए आवश्यक है कि मनुष्य संसार पर ध्यान दे और ईश्वरीय विभूतियों से लाभान्वित हो।ईश्वर से भय का अर्थ संसार को छोड़ना नहीं बल्कि प्रलय के लिए संसार से उचित लाभ उठाना है।