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    सूरए माएदा; आयत 89-91 (कार्यक्रम 185)

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    आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 89 की तिलावत सुनते हैं।لَا يُؤَاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ وَلَكِنْ يُؤَاخِذُكُمْ بِمَا عَقَّدْتُمُ الْأَيْمَانَ فَكَفَّارَتُهُ إِطْعَامُ عَشَرَةِ مَسَاكِينَ مِنْ أَوْسَطِ مَا تُطْعِمُونَ أَهْلِيكُمْ أَوْ كِسْوَتُهُمْ أَوْ تَحْرِيرُ رَقَبَةٍ فَمَنْ لَمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلَاثَةِ أَيَّامٍ ذَلِكَ كَفَّارَةُ أَيْمَانِكُمْ إِذَا حَلَفْتُمْ وَاحْفَظُوا أَيْمَانَكُمْ كَذَلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آَيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ (89)ईश्वर व्यर्थ और बिना सोचे समझे खाई गई तुम्हारी सौगंध पर, तुम्हारी पकड़ नहीं करेगा परन्तु जो सौगंधें तुमने सोच समझ कर खाई हैं, उन पर वह तुम्हारी पकड़ करेगा तो उसका कफ़्फ़ारा या जुर्माना, दस दरिद्रों को उस प्रकार का खाना खिलाना है जो तुम अपने परिजनों को खिलाते हो, या उन्हें वस्त्र पहनाना या एक दास को स्वतंत्र करना है। फिर यदि यह सब संभव न हो तो तीन दिन तक रोज़ा रखना है। यह तुम्हारी सौगंध का कफ़्फ़ारा है जब भी तुम सौगंध खाकर उसे तोड़ दो, तो अपनी सौगंधों (के प्रति सचेत रहो और उन) की रक्षा करो। इस प्रकार ईश्वर अपनी आयतों या निशानियों को तुम्हारे लिए वर्णित करता है कि शायद तुम उसके कृतज्ञ रहो। (5:89)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि मुसलमानों के एक गुट ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के मुख से प्रलय के दिन की बातें सुनकर अपने लिए अच्छा खाना और कपड़ा अपने ऊपर वर्जित कर लिया और वे अपनी पत्नियों से दूर हो गए। अपने इस निर्णय पर उन्होंने सौगंध तक खा ली।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने उनको इस काम से रोका और कहा कि हमारा धर्म एकान्त और संसार से अलग-थलग रहने का नहीं है। उन लोगों ने पूछा कि फिर हमारी उन सौगंधों का क्या होगा जो हमने खाई हैं?इस आयत ने उनको संबोधित करते हुए कहा कि चूंकि तुमने एक अप्रिय और बेकार बात के लिए सौगंध खाई है अतः उसकी कोई मान्यता नहीं है और ईश्वर इस सौगंध के लिए तुमसे प्रश्न नहीं करेगा परन्तु जान लो कि अकारण सौगंध नहीं खानी चाहिए क्योंकि फिर तुम्हें वह काम करना होगा तथा सौगंध तोड़ने पर कि जो एक हराम कार्य है, तुम्हें कफ़्फ़ारा अर्थात जुर्माना देना होगा।इस्लाम की विशिष्टताओं में से एक यह है कि उसने धार्मिक मामलों में उल्लंघन करने वालों का जुर्माना, समाज के दरिद्र तथा वंचित वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति रखा है। अतः यदि कोई रमज़ान में किसी कारणवश रोज़ा न रख पाए तो उसे दरिद्र भूखों को खाना खिलाना चाहिए। इसी प्रकार यदि किसी ने अपनी सौगंध तोड़ दी है तो उसे १० दरिद्रों को खाना खिलाना चाहिए या उन्हें कपड़ा पहनाना चाहिए या एक दास को स्वतंत्र करना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि जिस प्रकार ईश्वर सौगंधों के संबंध में लोगों की ग़लतियों को क्षमा कर देता है, उसी प्रकार हमें भी उनकी ग़लतियों को क्षमा कर देना चाहिए और दिल में नहीं रखना चाहिए।इस्लाम के क़ानून, दण्ड तक के मामलों में दरिद्रता समाप्त करने के मार्ग में हैं।जुर्माना, लोगों की आर्थिक स्थिति के अनुरूप होना चाहिए तथा व्यक्ति को उसके चयन में स्वतंत्र होना चाहिए।ईश्वर के पवित्र नामों का सम्मान करना चाहिए। या तो सौगंध नहीं खानी चाहिए, या फिर उसे अवश्य पूरा करना चाहिए, वरना जु्र्माना देना चाहिए।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 90 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِنَّمَا الْخَمْرُ وَالْمَيْسِرُ وَالْأَنْصَابُ وَالْأَزْلَامُ رِجْسٌ مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ فَاجْتَنِبُوهُ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ (90)हे ईमान वालो! निःसन्देह, शराब, जुआ, मूर्तियां और पांसे ये सब शैतान के गंदे कर्म हैं तो इनसे दूर रहो ताकि तुम सफल हो सको। (5:90)इस्लाम धर्म एक ऐसे वातावरण और समाज में आया जिसमें शराब, जुए और मूर्तिपूजा का अत्यधिक प्रचलन था। इस वातावरण को क़ुरआने मजीद ने पहली अज्ञानता का नाम दिया। आज के समाज में भी शराब और जुए का बहुत प्रचलन है। आज विभिन्न रूपों में मूर्तिपूजा भी प्रचलित है परन्तु ईमान की शर्त हर प्रकार के शैतानी प्रतीकों से दूर रहना है।हर वह काम जो मूर्खतापूर्ण व्यवहार का कारण बने, इस्लाम में निंदनीय है और चूंकि शराब, बुद्धि पर पर्दा डाल देती है और जुआ बिना शारीरिक और बौद्धिक प्रयास के आय का कारण बनता है अतः इस्लाम में इन दोनों से, कड़ाई से रोका गया है।चूंकि अरब के लोग शराब और कविता के अत्यधिक आदी थे और अचानक ही शराब के वर्जित होने के आदेश को स्वीकार नहीं कर सकते थे अतः शराब के वर्जित होने का आदेश धीरे-धीरे चार चरणों में आया। जैसाकि इस आयत में शराबी को मूर्तिपूजा करने वालों के साथ रखा गया है।इस आयत से हमने सीखा कि शराब जैसी खाने-पीने की वस्तुओं के वर्जित होने का कारण उनकी बुराई और गंदगी है, चाहे आंतरिक बुराई हो या भौतिक गंदगी।ईमान की शर्त, शैतानी कामों से दूर रहना है। केवल उपासना ही काफ़ी नहीं है बल्कि पेट और वासना को भी नियंत्रण में रखना आवश्यक है।इस्लाम की सभी शिक्षाएं, मनुष्य को मोक्ष तथा कल्याण तक पहुंचाने के लिए हैं। यद्यपि उनमें से कुछ का पालन हमारे लिए कठिन है परन्तु यह उन कार्यों की भांति हैं जो माता-पिता अपने बच्चों के प्रशिक्षण के लिए उनसे करवाते हैं।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 91 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّمَا يُرِيدُ الشَّيْطَانُ أَنْ يُوقِعَ بَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةَ وَالْبَغْضَاءَ فِي الْخَمْرِ وَالْمَيْسِرِ وَيَصُدَّكُمْ عَنْ ذِكْرِ اللَّهِ وَعَنِ الصَّلَاةِ فَهَلْ أَنْتُمْ مُنْتَهُونَ (91)शैतान तो केवल यही चाहता है कि शराब और जुए के बारे में तुम्हारे बीच शत्रुता और द्वेष उत्पन्न कर दे और तुम्हें ईश्वर की याद तथा नमाज़ से रोक दे, तो क्या तुम रुक जाओगे? (5:91)पिछली आयत में ईश्वर ने शराब और जुए को शैतानी कर्मों में से बताया था। यह आयत कहती है कि शैतान इन दो वस्तुओं द्वारा समाज के अन्य लोगों से तुम्हारे संबंध भी बिगाड़ना चाहता है और समाज में शत्रुता और द्वेष भी प्रचलित करना चाहता है। और इसी के साथ वह ईश्वर से तुम्हारा संबंध समाप्त करवा के तुम्हें अपनी याद और नमाज़ से रोकना चाहता है।यद्यपि शराब से अनके शारीरिक व आत्मिक रोग होते हैं परन्तु क़ुरआने मजीद उसके हराम होने के कारणों के वर्णन मे दो बातों पर बल देता है। एक सामाजिक क्षति और दूसरे भौतिक हानि।इस आयत से हमने सीखा कि जो भी लोगों के बीच द्वेष और शत्रुता का कारण बने वह शैतान है, चाहे मनुष्य के रूप में ही क्यों न हो।नमाज़, ईश्वर की याद का सबसे बड़ा प्रतीक है और जो वस्तु हमें ईश्वर की याद से निश्चेत कर दे वह अप्रिय है और उससे दूर रहना चाहिए। चाहे वह व्यापार जैसा सामान्य काम ही क्यों न हो।