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    सूरए माएदा; आयत 92-94 (कार्यक्रम 186)

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    आइए पहले सूरए माएदा की आयत संख्या 92 की तिलावत सुनते हैं।وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَاحْذَرُوا فَإِنْ تَوَلَّيْتُمْ فَاعْلَمُوا أَنَّمَا عَلَى رَسُولِنَا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ (92)ईश्वर का आज्ञा पालन करो और पैग़म्बर का (भी) आज्ञा पालन करो तथा अवज्ञा न करो। तो यदि तुमने पीठ दिखाई (और आज्ञा पालन न किया) तो जान लो कि हमारे पैग़म्बर का दायित्व स्पष्ट संदेश पहुंचाने के अतिरिक्त कुछ नहीं। (5:92)पिछले कार्यक्रम में जिन आयतों की व्याख्या की थी उनमें ईश्वर ने शराब और जुए से दूर रहने का आदेश दिया था। यह आयत कहती है कि ईश्वरीय आदेशों का पालन करो कि यह स्वयं तुम्हारे हित में है। इन बुरे कर्मों के अंत से डरो और यह मत सोचो कि ईश्वरीय आदेशों की अवज्ञा करके तुम उसे और उसके पैग़म्बर को क्षति पहुंचा सकोगे। पैग़म्बर का दायित्व केवल ईश्वर का संदेश पहुंचाना है। ईश्वरीय आदेशों के पालन से न उन्हें कोई लाभ होता और न ही अवज्ञा से कोई क्षति।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का काम, ईश्वर का संदेश पहुंचाना था न कि लोगों पर संदेश को स्वीकार करने के लिए कड़ाई करना। वे लोगों को अवगत कराना चाहते थे परन्तु लोग अपने मार्ग के चयन में स्वतंत्र हैं।ईश्वर का आज्ञापालन, पैग़म्बर के आज्ञापालन में प्रज्वलित होता है, अतः क़ुरआन में आने वाले आदेशों के साथ ही, पैग़म्बर के आदेशों का भी पालन करना चाहिए जिन्हें “सुन्नत” कहा जाता है।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 93 की तिलावत सुनते हैं।لَيْسَ عَلَى الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جُنَاحٌ فِيمَا طَعِمُوا إِذَا مَا اتَّقَوْا وَآَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ ثُمَّ اتَّقَوْا وَآَمَنُوا ثُمَّ اتَّقَوْا وَأَحْسَنُوا وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ (93)जो लोग ईमान लाए और भले कर्म करते रहे उनके लिए उसमें कोई बुराई नहीं है जो कुछ वे (पहले) खा-पी चुके हैं। अलबत्ता यदि वे ईश्वर का भय व ईमान रखते हों और भले कर्म करते हों तो फिर (हराम या वर्जित वस्तुओं से) बचते हों और (उनके हराम होने पर) ईमान रखते हों। फिर (बुराइयों से) दूर रहते हों और भलाई करते हों और ईश्वर भलाई करने वालों को पसंद करता है। (5:93)इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि शराब को हराम या वर्जित घोषित करने वाली आयतों के आने के पश्चात कुछ मुसलमानों ने उन लोगों के बारे में प्रश्न किया जो इस आदेश के आने से पहले शराब पी चुके थे। उस समय यह आयत आई, जिसमें उनके उत्तर में कहा गया है कि जो कुछ इस आदेश से पहले हो चुका है, उसका कोई दण्ड नहीं है परन्तु शर्त यह है कि अब उसके चक्कर में न रहें, बल्कि ईश्वर से डरें और शराब और जुए के बजाए भले कर्म करें और इस मार्ग पर मज़बूती से जमे रहें।इस आयत मे तक़वा अर्थात ईश्वर से भय और ईमान का शब्द तीन बार आया है कि जो जीवन के विभिन्न मामलों में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका का सूचक है। हृदय से ईमान लाना तथा अपने व्यवहार में ईश्वर से डरते रहना, लोक-परलोक में मनुष्य के कल्याण को सुनिश्चित बनाता है।इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों के साथ भलाई, ईमान के ऊंचे दर्जों में से है और यह ईश्वर के निकट मनुष्य के प्रिय होने के कारणों में से भी है।केवल ईमान काफ़ी नहीं है बल्कि कर्म भी आवश्यक है और वह भी इस प्रकार की बुराई से दूर, भले कर्म।अस्थाई और ढुलमुल ईमान का कोई लाभ नहीं है। पूरे जीवन भर और हर मामले में ईमान का जारी रहना, कल्याणकारी और जीवनदायक है।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 94 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَيَبْلُوَنَّكُمُ اللَّهُ بِشَيْءٍ مِنَ الصَّيْدِ تَنَالُهُ أَيْدِيكُمْ وَرِمَاحُكُمْ لِيَعْلَمَ اللَّهُ مَنْ يَخَافُهُ بِالْغَيْبِ فَمَنِ اعْتَدَى بَعْدَ ذَلِكَ فَلَهُ عَذَابٌ أَلِيمٌ (94)हे ईमान वालो! ईश्वर उन शिकारों द्वारा, जिन तक तुम्हारे हाथ व भाले पहुंच जाते हैं, अवश्य ही तुम्हारी परीक्षा लेगा ताकि यह देखे कि कौन अंदर से भी उससे डरता है (और उसके आदेशों का पालन करता है) तो जो कोई इस (ईश्वरीय आदेश) के बाद उल्लघंन करे तो उसके लिए कड़ा दण्ड है। (5:94)यह आयत और इसके बाद की आयतें, हज के आदेशों और उन लोगों के बारे में है जो हज के लिए मक्का नगर जाना चाहते हैं। हज के दिनों में हाजी को यह अधिकार नहीं है कि वह एहराम की स्थिति में शिकार करे।कभी ऐसा होता है कि उन दिनों में शिकार मनुष्य के इतने निकट आ जाता है कि वह बड़ी सरलता से उसे पकड़ सकता है परन्तु ईश्वर की परीक्षा इस प्रकार से है कि यह स्पष्ट हो जाए कि कौन ईश्वर के आदेशों का पालन करता है और कौन उल्लंघन।अलबत्ता ईश्वर अपने असीम ज्ञान के चलते हमारे सभी कर्मों से अवगत है और उसकी परीक्षाएं, हमारे कार्यों से उसके परिचित होने के लिए नहीं हैं बल्कि वह हमारी परीक्षाएं लेता है ताकि हमारी प्रगति और योग्यताओं के निखरने की भूमिका भी समतल हो और हम स्वयं को पहचान भी सकें। इसी के साथ वो परीक्षा लेकर मनुष्य को पारितोषिक और बदला भी देना चाहता है क्योंकि बदला, कर्म के मुक़ाबले में होता है, न कि ईश्वर के ज्ञान के मुक़ाबले में। जैसा कि हम भी किसी व्यक्ति को केवल यह जानकर पारितोषिक और बदला नहीं देते कि वह अच्छा कलाकार है, बल्कि जब वह हमारे लिए कुछ करता है तभी उसे इनाम दिया जाता है।प्रत्येक दशा मे ईमान वालों का दावा है कि वे ईश्वर के आदेशों का पालन करते हैं और उसके समक्ष नतमस्तक रहते हैं, परन्तु जब तक परीक्षा न हो जाए यह दावा सिद्ध नहीं होता। यदि ईश्वर कोई आदेश दे और अपनी इच्छा के विपरीत होने के बावजूद हम उसका पालन करें तो ज्ञात होगा कि हम ईश्वर के आज्ञापालक हैं। न केवल शराब जैसी वर्जित वस्तुओं से दूर रहना आवश्यक है, बल्कि समय पड़ने पर वैध वस्तुओं को भी छोड़ देना चाहिए ताकि स्पष्ट हो जाए कि हम ईश्वर का आज्ञापालन करते हैं न कि अपनी आंतरिक इच्छाओं का।इस आयत से हमने सीखा कि, सभी मनुष्यों विशेषकर ईमान वालों और ईमान का दावा करने वालों की परीक्षा लेना, ईश्वर की सदा की परंपरा रही है।ईश्वर से भय और ईमान का मानदण्ड, आंतरिक भय है न कि केवल विदित लज्जा जो कारण बनती है कि मनुष्य, लोगों के सामने पाप न करे।हज के अवसर पर ईश्वर अनेक हलाल और वैध बातों को वर्णित कर देता है ताकि अपने समक्ष नतमस्तक रहने की भावना का मनुष्य के भीतर पोषण करे और विभिन्न परिस्थितियों मे उसकी परीक्षा ले।