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    सूरए माएदा; आयत 95-97 (कार्यक्रम 187)

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    आइए पहले सूरए माएदा की आयत संख्या 95 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَقْتُلُوا الصَّيْدَ وَأَنْتُمْ حُرُمٌ وَمَنْ قَتَلَهُ مِنْكُمْ مُتَعَمِّدًا فَجَزَاءٌ مِثْلُ مَا قَتَلَ مِنَ النَّعَمِ يَحْكُمُ بِهِ ذَوَا عَدْلٍ مِنْكُمْ هَدْيًا بَالِغَ الْكَعْبَةِ أَوْ كَفَّارَةٌ طَعَامُ مَسَاكِينَ أَوْ عَدْلُ ذَلِكَ صِيَامًا لِيَذُوقَ وَبَالَ أَمْرِهِ عَفَا اللَّهُ عَمَّا سَلَفَ وَمَنْ عَادَ فَيَنْتَقِمُ اللَّهُ مِنْهُ وَاللَّهُ عَزِيزٌ ذُو انْتِقَامٍ (95)हे ईमान वालो! एहराम की स्थिति में शिकार को मत मारो और तुममें से जो कोई जान-बूझ कर ऐसा करे तो उसका कफ़्फ़ारा या जुर्माना, मारे गए पशु के समान एक पशु की, जिसकी समानता की गवाही दो न्यायिक व्यक्ति कर दें, क़ुरबानी करके उसे उपहार स्वरूप काबे तक पहुंचाना है। या कुछ दरिद्रों को खाना खिलाए या उस के मूल्य के अनुरूप रोज़ा रखे ताकि वह अपने काम का मज़ा चखे। अलबत्ता ईश्वर ने इस संबंध में तुम्हारे पिछले मामलों को क्षमा कर दिया है परन्तु (अब) जो इसे दोहराएगा तो ईश्वर उससे बदला लेगा और ईश्वर सबसे प्रभुत्वशाली और प्रतिशोध लेने वाला है। (5:95)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वर ने हज करने वालों के लिए कुछ क़ानून निर्धारित किये हैं ताकि उनकी परीक्षा ले सके। उनमें से एक एहराम की स्थति मे शिकार का वर्जित होना है। यह आयत इस ईश्वरीय आदेश पर बल देते हुए, उस व्यक्ति के दण्ड का वर्णन करती है जो जान-बूझ कर शिकार करे और ईश्वरीय आदेश की अवहेलना करे। ऐसे व्यक्ति का दण्ड, शिकार किये गए पशु के समान ही एक पशु की क़ुर्बानी करना है, वह भी काबे के निकट, ताकि उसका मांस दरिद्रों और वंचितों को दिया जा सके। और यदि उस व्यक्ति के लिए क़ुर्बानी करना संभव न हो तो दरिद्रों और वंचितों को खाना खिलाए और कम से कम ६० दरिद्रों को पेट भर कर खिलाए और यदि वह यह भी न कर सके तो कम से कम ६० दिन रोज़ा रखे ताकि उसे भूख का पता चले और वास्तव में अपने कर्म का परिणाम देखे।इस आयत से हमने सीखा कि एहराम की स्थिति में न केवल मनुष्यों को भी सुरक्षित होना चाहिए बल्कि सुरक्षा अपने पूरे अर्थों में स्थापित होनी चाहिए।बुरे कर्म से भी अधिक ख़तरनाक, सोच-समझकर तथा जानबूझकर पाप करने की भावना है जो दण्ड में वृद्धि का कारण है।इस्लाम के दण्डात्मक क़ानूनों में, आर्थिक जुर्माना, सामान्यतः दरिद्र और वंचितों की सहायता के लिए है जबकि मनुष्य द्वारा बनाए गए क़ानूनों में, जुर्माना सरकारी ख़जाने में जाता है।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 96 की तिलावत सुनते हैं।أُحِلَّ لَكُمْ صَيْدُ الْبَحْرِ وَطَعَامُهُ مَتَاعًا لَكُمْ وَلِلسَّيَّارَةِ وَحُرِّمَ عَلَيْكُمْ صَيْدُ الْبَرِّ مَا دُمْتُمْ حُرُمًا وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ (96)तुम्हारे लिए (एहराम की स्थिति में) समुद्री पशु का शिकार और उसका खाना वैध कर दिया गया कि तुम्हारे और यात्रियों के लिए लाभ का साधन है परन्तु जब तक तुम एहराम की स्थिति में रहो तुम्हारे लिए धरती के पशुओं का शिकार वर्जित कर दिया गया है। तो उस ईश्वर से डरते रहो जिसके पास लौटकर तुम्हें जाना है। (5:96)पिछली आयत में, एहराम की स्थिति में धरती के पशुओं के शिकार को वर्जित करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि तुम्हारे लिए पानी के पशुओं का शिकार और उनका खाना, वैध है। ऐसा नहीं है कि हमने तुम्हारे लिए मार्ग भी बंद कर दिए हों और तुम्हे कुछ खाने की अनुमति भी न दी हो।साधारणतः इस प्रकार के ईश्वरीय आदेश, लोगों की परीक्षा के लिए हैं ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि लोग ईश्वर से कितना डरते हैं और कितना अपनी आंतरिक इच्छाओं का पालन करते हैं। इसी कारण ईश्वर ने एक मार्ग को बंद करके दूसरा मार्ग खोल दिया है।इस आयत से हमने सीखा कि समुद्री पशुओं और वस्तुओं को केवल तट पर रहने वालों के लिए विशेष नहीं किया गया है बल्कि सभी लोगों को उनसे लाभान्वित होने का अधिकार है।शिकार उस समय वैध है जब वह खाने के लिए हो न कि मज़े और आनंद के लिए कि कोई व्यक्ति किसी पशु की जान लेकर आनंदित हो।प्रलय तथा ईश्वर के न्यायालय में उपस्थिति की ओर ध्यान, पाप तथा उदंडता से रोकने का सबसे अच्छा कारक है।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 97 की तिलावत सुनते हैं।جَعَلَ اللَّهُ الْكَعْبَةَ الْبَيْتَ الْحَرَامَ قِيَامًا لِلنَّاسِ وَالشَّهْرَ الْحَرَامَ وَالْهَدْيَ وَالْقَلَائِدَ ذَلِكَ لِتَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَأَنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ (97)ईश्वर ने काबे को जो सम्मानीय व पवित्र घर है, तथा (युद्ध आरंभ करने के लिए) वर्जित किये गए महीनों और क़ुर्बानी के साधारण व निशान डाल दिये गए पशुओं को, लोगों के सुधार और सुदृढ़ता का साधन बताया है। यह इसलिए है कि तुम जान लो कि निःसन्देह, ईश्वर आकाशों और धरती की हर बात और वस्तु से अवगत है और निःसन्देह, ईश्वर हर बात का जानने वाला है। (5:97)पिछली आयतों में हज के कुछ आदेशों का वर्णन करने के पश्चात यह आयत हज के केन्द्र अर्थात काबे की ओर संकेत करती है और कहती है कि ईश्वर ने इस घर को शांति, उपासना एकता और ईश्वरीय पहचान का केन्द्र बनाया है और यह बातें समाज तथा लोगों की सुदृढ़ता कारण हैं।काबा ऐसा घर है जिसके सम्मान की रक्षा करना सदैव आवश्यक है। विशेषकर हज के दिनों में, जो वर्जित महीनों में पड़ते हैं और उनमें हर प्रकार का युद्ध वर्जित है। न केवल स्थान और समय सम्मानीय है बल्कि हज के लिए निर्धारित होने वाले क़ुर्बानी के जानवर भी, या वह जानवर भी जो अभी निर्धारित नहीं हुए हैं, सम्मानीय हैं क्योंकि हज के संस्कारों में वे शामिल हैं। वर्जित महीनों में दसियों लाख मुसलमानों का ईश्वर के घर के निकट एकत्रित होना, वह भी बिना किसी भेद-भाव, विशिष्टता, मतभेद और विवाद के, इस्लाम की विशेषताओं में से एक है और हज के कार्यक्रमों पर अत्याधिक ध्यान दिया जाना इस बात की निशानी है कि हज, ईश्वर के असीम ज्ञान से प्रवाहित हुआ है और मनुष्य का सीमित ज्ञान कभी भी इतने रोचक और व्यापक क़ानून नहीं बना सकता।इस आयत से हमने सीखा कि कुछ स्थान और समय इस्लाम की दृष्टि से सम्मानीय है और उनका सम्मान, समाज की सुदृढ़ता का कारण है।मस्जिद और क़ुर्बानी का स्थान, उपासना और अर्थव्यवस्था का प्रतीक है, यह दोनो लोगों के धर्म व संसार को सुनिश्चित बनाते हैं। ईश्वर ने हज के संस्कारों में दोनों को एक साथ रखा है।