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    सूरए माएदा; आयत 98-102कार्यक्रम 188)

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    आइए पहले सूरए माएदा की आयत संख्या 98 और 99 की तिलावत सुनते हैं।اعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ وَأَنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (98) مَا عَلَى الرَّسُولِ إِلَّا الْبَلَاغُ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ (99)जान लो कि ईश्वर कड़ा दण्ड देने वाला है और (इसी के साथ) वह अत्यंत क्षमाशील और दयावान (भी) है। (5:98) और (जान लो कि) हमारे पैग़म्बर का काम केवल (ईश्वरीय आदेश) पहुंचाना है, और जो कुछ तुम प्रकट करते हो और छिपाते हो, ईश्वर उससे अवगत है। (5:99)कुछ लोगों का मानना था कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम लोगों को जो भी धार्मिक आदेश देते थे, वह अपनी ओर से निर्धारित करते थे, और वे जिस प्रकार चाहते थे, उसका पारितोषिक निश्चित करते थे।इस आयत में ऐसे अनुचित विचारों के उत्तर में कहा गया है कि प्रथम तो यह कि पैग़म्बर का दायित्व केवल ईश्वर का आदेश लोगों तक पहुंचाना है और वे अपनी ओर से उनमें कमी-बेशी नहीं करते और दूसरे यह कि बदला तथा पारितोषिक देना केवल ईश्वर के हाथ में है और पैग़म्बर की इसमें कोई भूमिका नहीं है। जो कोई अपने दायित्वों का निर्वाह करता है, ईश्वर उसे पारितोषिक देता है। अतः दायित्व व पारितोषिक ईश्वर की ओर से है और पैग़म्बर की भूमिका केवल प्रचारक की है।इसके अतिरिक्त पैग़म्बर ने धर्म स्वीकार करने और ईमान लाने पर किसी को विवश नहीं किया है कि उनकी बातों को स्वीकार करे क्योंकि मूल रूप से ईमान, एक आंतरिक बात है और केवल ईश्वर ही जानता है कि कौन दिल से ईमान लाया है और किसने अपने भीतर कुफ़्र को छिपा रखा है और दिखावे के लिए ईमान का दावा करता है।इन आयतों से हमने यह सीखा कि ईमान वालों को सदैव ही आशा और भय दोनों के बीच रहना चाहिए। अपनी ग़लतियों पर दण्ड का भय और ईश्वर की दया तथा क्षमा की आशा।पैग़म्बर का दायित्व, धर्म पहुंचाना है न कि उसके स्वीकार करने के लिए लोगों को विवश करना।विदित और निहित, ईश्वर के लिए समान है अतः मिथ्या और दिखावे का कोई लाभ नहीं है।आइए अब सूरए माएदा की 100वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ لَا يَسْتَوِي الْخَبِيثُ وَالطَّيِّبُ وَلَوْ أَعْجَبَكَ كَثْرَةُ الْخَبِيثِ فَاتَّقُوا اللَّهَ يَا أُولِي الْأَلْبَابِ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ (100)(हे पैग़म्बर!) लोगों से कह दीजिए कि भ्रष्ट और पवित्र एक समान नहीं हैं चाहे भ्रष्टों की संख्या आपको अचरज में डाल दे। तो हे बुद्धि वालो! ईश्वर से डरो कि शायद तुम्हें कल्याण प्राप्त हो जाए। (5:100)अपने धर्म तथा अपनी आस्था के संबंध में कुछ ईमान वालों की लड़खड़ाहट के कारणों में से एक ईमान वालों की कमी और काफ़िरों की बहुतायत है। यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि सत्यता का मानदण्ड बहुतायत नहीं है। यदि किसी समाज के अधिकांश लोग धर्म और पैग़म्बरों के विपरीत काम करें तो उस आस्था की सत्यता समाप्त नहीं हो जाती। सत्य वह बात है जो ईश्वर की ओर से हो और मनुष्य की बुद्धि उसकी अच्छाई की गवाही दे।अतः ईश्वर इस आयत के अंत में बुद्धि वालों को संबोधित करते हुए कहता है कि यदि तुम कल्याण प्राप्त करना चाहते हो तो ईश्वर की ओर जो कुछ उसकी ओर से है उसे दृष्टि में रखो और सत्य तथा असत्य का मानदण्ड बनाओ। क्योंकि कभी भी अच्छाई और बुराई, सुदंर और कुरूप तथा भ्रष्ट और पवित्र एक नहीं हो सकते चाहे एक समाज के अधिकांश लोग भ्रष्ट व बुरे कामों की ओर उन्मुख हो जाएं। क्या यह स्वीकार किया जा सकता है कि अधिक अनुयाइयों के चलते कर्मों की बुराई समाप्त हो जाती है और वह सुंदर तथा पवित्र हो जाते हैं?ज़रा सोचिए कि एक कमरे में पांच व्यक्ति हों और चार, सिगरेट पी कर कमरे के वातावरण को दूषित करना चाहते हों जबकि एक व्यक्ति स्वच्छ तथा बिना प्रदूषण के वातावरण में रहना चाहता हो, आपके विचार में कौन सत्य पर है?क्या माना जा सकता है कि चूंकि यह एक व्यक्ति अल्पसंख्या में है अतः उसे कमरे से बाहर निकल कर बिना प्रदूषण के वातावरण में सांस लेना चाहिए और चूंकि चार व्यक्ति बहुसंख्या में हैं अतः उन्हें कमरे में रहकर उसे धुंए से भर देना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि बहुसंख्या न तो सत्यता की निशानी है और न ही श्रेष्ठता का चिन्ह है अतः जो यह कहते हैं कि जैसा देस वैसा भेस उनकी बात तर्कसंगत नहीं है और क़ुरआन के अनुसार नहीं है।सबके पास बुद्धि है परन्तु अधिकांश लोग बुद्धि के अनुसार व्यवहार नहीं करते बल्कि सामाजिक रीति-रिवाजों के आधार पर जीवन व्यतीत करते हैं। अतः बहुसंख्या में होने के बावजूद उनका व्यवहार, तर्क नहीं बन सकता।मोक्ष व कल्याण के लिए बुद्धि के अतिरिक्त ईमान और ईश्वर से भय भी आवश्यक है ताकि मनुष्य ईश्वरीय मानदण्डों के आधार पर सत्य और असत्य को सही ढंग से पहचान कर निर्णय कर सके।आइए अब सूरए माएदा की आयत संख्या 101 और 102 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَسْأَلُوا عَنْ أَشْيَاءَ إِنْ تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْ وَإِنْ تَسْأَلُوا عَنْهَا حِينَ يُنَزَّلُ الْقُرْآَنُ تُبْدَ لَكُمْ عَفَا اللَّهُ عَنْهَا وَاللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ (101) قَدْ سَأَلَهَا قَوْمٌ مِنْ قَبْلِكُمْ ثُمَّ أَصْبَحُوا بِهَا كَافِرِينَ (102)हे ईमान वालो! पैग़म्बर से उन वस्तुओं के बारे में मत पूछो, जो यदि तुम्हारे लिए स्पष्ट हो जाएं तो तुम्हें बुरा लगे। और यदि क़ुरआन के उतरने के समय उनके बारे में प्रश्न करो तो वह तुम्हारे लिए स्पष्ट हो जाएंगी। ईश्वर ने तुम्हारे अनुचित प्रश्नों को क्षमा कर दिया है कि ईश्वर अत्यंत क्षमाशील व दयावान है। (5:101) निसन्देह तुमसे पहले के एक गुट ने (भी) इसी प्रकार के प्रश्न किये और (चूंकि उनमें पालन की शक्ति नहीं थी अतः) वे उनका इन्कार कर बैठे और काफ़िर हो गए। (5:102)यद्यपि प्रश्न, ज्ञान तथा सूचना की कुंजी है परन्तु कुछ प्रश्न न केवल लाभदायक नहीं होते हैं बल्कि समाज में कठिनाइयां उत्पन्न होने का कारण बनते हैं। उदाहरण स्वरूप यदि युद्ध में व्यस्त किसी सरकार से यह पूछा जाए कि उसके पास गेहूं का कितना स्टाक है तो यह आटे के मंहगे होने का कारण भी बनेगा और अतिक्रमणकारी शत्रु के दबाव को भी बढ़ा देगा।धार्मिक मामलों में भी, जितनी आवश्यकता थी, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने, ईमान वालों को बता दिया है। कुछ प्रश्न संदेह और भ्रम के कारण होते हैं कि जिनका उत्तर, समाज में कठिनाइयां उत्पन्न होने का कारण बन सकता है।इसके अतिरिक्त कभी-कभी निरंतर प्रश्न करने का उद्देश्य दायित्व पालन से भागने का मार्ग खोजना भी होता है। जैसाकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के काल में बनी इस्राईल के लिए ईश्वरीय आदेश आया था कि वे एक गाय ज़िबह करें। उन्होंने इससे बचने के लिए उसके स्वरूप, रंग, आयु और अन्य विशेषताओं के बारे में प्रश्न किए। जब उन सभी प्रश्नों का उत्तर दे दिया गया तो फिर उन विशेषताओं वाली गाय उनके लिए खोजना कठिन हो गया।इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम हज के बारे में लोगों से बात कर रहे थे कि किसी ने पूछा कि क्या हज आयु में एक बार अनिवार्य होता है या प्रतिवर्ष? पैग़म्बर ने उत्तर नहीं दिया। प्रश्न करने वाले ने अपने प्रश्न को कई बार दोहराया। पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि इतना आग्रह क्यों कर रहे हो, यदि प्रतिवर्ष हज करना अनिवार्य होता तो मैं स्वयं कहता।इन आयतों से हमने सीखा कि हर बात का जानना, न तो आवश्यक ही है और न ही लाभदायक। हमें लाभदायक बातों को जानने का प्रयास करना चाहिए। ऐसी बातों का जानना आवश्यक नहीं है जो समाज में द्वेष, संकट और समस्याओं का कारण बनें।कुछ आदेशों के पालन के संबंध में लोगों का प्रतिबद्ध न बनना ईश्वरीय दया की निशानी है। जैसा कि ऐसी वास्तविकताएं लोगों को बताना, जिनको समझने या स्वीकार करने की क्षमता उनमें न हो तो वह उनके कुफ़्र और इन्कार का कारण बनता है।