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    सूरए मोमिनून, आयतें 1-7, (कार्यक्रम 607)

    सूरए मोमिनून, आयतें 1-7, (कार्यक्रम 607)
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    بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ قَدْ أَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَ (1) الَّذِينَ هُمْ فِي صَلَاتِهِمْ خَاشِعُونَ (2)
    अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। निश्चित रूप से ईश्वर पर ईमान रखने वाले सफल रहे।(23:1) कि जो अपनी नमाज़ों में विनम्र रहते हैं। (23:2)
    सूरए हज की आयतों की व्याख्या समाप्त होने के बाद अब सूरए मोमिनून की आयतों की व्याख्या आरंभ हो रही है। यह सूरा मक्के में उतरा है और इसकी एक सौ अट्ठारह आयतें हैं। इस सूरे की आरंभिक आयतों में ईमान वालों की विशेषताओं का वर्णन किया गया है और फिर हज़रत नूह, हूद, मूसा व ईसा अलैहिमुस्सलाम जैसे ईश्वरीय पैग़म्बरों और उनकी जातियों के बारे में संक्षेप में बयान किया गया है। पहली आयत एक संक्षिप्त वाक्य में स्पष्ट रूप से लोक-परलोक में ईमान वालों के निश्चित कल्याण व सफलता की सूचना देती है। आयत में प्रयोग होने वाले शब्द फ़लाह का अर्थ होता है सामने मौजूद रुकावटों को दूर करना और उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए समस्याओं को नियंत्रित करना जो विजय व सफलता का कारण बनता है।
    ईमान वाले ईश्वर पर भरोसा करते हुए लक्ष्य तक पहुंचने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं और संसार की क्षमता के अनुसार सफलताएं प्राप्त करते हैं किंतु उनके प्रयासों का संपूर्ण पारितोषिक प्रलय में दिया जाएगा और वे ईश्वरीय दया की छाया में और पवित्र व भले लोगों के साथ स्वर्ग में सदा के लिए रहेंगे।
    अगली आयतें उन विशेषताओं की ओर संकेत करती हैं जो ईमान वालों को सफलता व कल्याण तक पहुंचाती हैं। इस संबंध में नमाज़ में विनम्रता को सबसे पहले बयान किया गया है। जो व्यक्ति विनम्रता के साथ नमाज़ पढ़ता है वह उसे अपने लिए बोझ नहीं समझता बल्कि ईश्वर के साथ बात करना उसके अत्यंत आनंददायक होता है। सभी ईमान वाले नमाज़ पढ़ते हैं किंतु सफलता व कल्याण के लिए नमाज़ में विनम्रता आवश्यक है क्योंकि इस प्रकार पढ़ी जाने वाली नमाज़ मनुष्य के भीतर से घमंड व अहं को समाप्त करती है और उसके नैतिक गुणों व परिपूर्णताओं के उभरने का मार्ग प्रशस्त करती है।
    इस आयत से हमने सीखा कि यद्यपि काफ़िर विदित रूप से संसार में सफल दिखाई देते हैं किंतु ईमान वाले ही लोक-परलोक में वास्तविक रूप में सफल होते हैं।
    नमाज़ के बिना ईमान अधूरा होता है और सच्ची नमाज़, मनुष्य को विनम्रता के लिए प्रेरित करती है।
    आइये अब सूरए मोमिनून की तीसरी और चौथी आयत की तिलावत सुनें।
    وَالَّذِينَ هُمْ عَنِ اللَّغْوِ مُعْرِضُونَ (3) وَالَّذِينَ هُمْ لِلزَّكَاةِ فَاعِلُونَ (4)
    और जो लोग व्यर्थ बातों व कार्यों से मुंह मोड़ लेते हैं।(23:3) और जो ज़कात अदा करते हैं। (23:4)
    ईमान वाले केवल उपासना, नमाज, दुआ और प्रार्थना में व्यस्त नहीं होते। वे समाज के वंचित लोगों के बारे में भी सोचते हैं और अपनी संपत्ति का एक भाग उन्हें देते हैं चाहे वह ख़ुम्स व ज़कात जैसे अनिवार्य धार्मिक करों के रूप में हो या दान-दक्षिणा के रूप में।
    स्वाभाविक है कि जो मनुष्य ईश्वर पर ईमान रखता है वह संसार को लक्ष्यपूर्ण समझता है और अनावश्यक एवं व्यर्थ कार्य नहीं करता क्योंकि ऐसे बहुत से वैध काम होते हैं जिनका व्यक्ति, उसके परिवार तथा समाज को कोई लाभ नहीं होता और इस प्रकार के काम से कवल समय व पूंजि नष्ट होती है। ईमान वाले व्यक्ति को ऐसे कामों से बचना चाहिए। यदि उसका सामना ऐसे लोगों से हो तो उसे बड़ी सज्जनता के साथ उनसे दूर हो जाना चाहिए।
    इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान वालों की बातें और उनके कार्य तर्कसंगत और लक्ष्यपूर्ण होने चाहिए और हर प्रकार के व्यर्थ कार्य से बचना चाहिए।
    रचयिता की उपासना, उसके दासों व रचनाओं से दूरी का कारण नहीं बननी चाहिए। दूसरे शब्दों में वंचितों और दरिद्रों की सहायता, ईश्वर पर ईमान का अटूट अंग है।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 5, 6 और सात की तिलावत सुनें।
    وَالَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَافِظُونَ (5) إِلَّا عَلَى أَزْوَاجِهِمْ أوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ (6) فَمَنِ ابْتَغَى وَرَاءَ ذَلِكَ فَأُولَئِكَ هُمُ الْعَادُونَ (7)
    और जो स्वयं को व्यभिचार से बचाते हैं।(23:5) सिवाय अपनी पत्नियों या (ख़रीदी हुई) दासियों के, कि इस पर वे निन्दनीय नहीं हैं। (23:6) तो जो कोई इसके अतिरिक्त कुछ और चाहे तो ऐसे ही लोग सीमा लांघने वाले है। (23:7)
    नमाज़ में विनम्रता, ज़कात देने और व्यर्थ बातों व कार्यों से दूर रहने की सिफ़ारिश करने के बाद ये आयतें नैतिक पवित्रता को ईमान वालों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बताते हुए कहती है कि वासना पर नियंत्रण और हर प्रकार के व्यभिचार से दूरी ईश्वर पर ईमान का भाग है। ईमान वाले लोग केवल विवाह और क़ानूनी दांपत्य जीवन से अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं और इसके अतिरिक्त हर मार्ग से दूर रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यह मानवीय प्रवृत्ति और धार्मिक शिक्षाओं के विपरीत है।
    ईसाइयों के एक गुट के विपरीत जो विवाह को निंदनीय कार्य मानता है और पादरियों तथा ननों को विवाह की अनुमति नहीं देता, इस्लाम व क़ुरआन मनुष्य की प्राकृतिक व यौन आवश्यकताओं के संबंध में संतुलित मार्ग प्रस्तुत करते हैं। इन आयतों में कहा गया है कि यदि कोई विवाह के माध्यम से अपनी यौन संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करे तो उसके लिए कोई निंदा नहीं है और किसी को यह अधिकार नहीं है कि उसकी आलोचना करे।
    इन आयतों से हमने सीखा कि नैतिक पवित्रता ईश्वर पर ईमान का भाग है और हर प्रकार की उच्छृंखलता और व्यभिचार से ईमान कमज़ोर होता है।
    इस्लाम, संतुलन का धर्म है, वह न तो यौन संबंधों में उच्छृंखलता को वैध मानता है और ही मूल रूप से शारीरिक संबंधों को अवैध कहता है बल्कि वह इस प्रकार के संबंधों को वैध दांपत्य जीवन तक सीमित करता है।

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