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    सूरए मोमिनून, आयतें 112-118, (कार्यक्रम 624)

    सूरए मोमिनून, आयतें 112-118, (कार्यक्रम 624)
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    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-605الَ كَمْ لَبِثْتُمْ فِي الْأَرْضِ عَدَدَ سِنِينَ (112) قَالُوا لَبِثْنَا يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ فَاسْأَلِ الْعَادِّينَ (113) قَالَ إِنْ لَبِثْتُمْ إِلَّا قَلِيلًا لَوْ أَنَّكُمْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ (114)

    (ईश्वर) कहेगाः तुम धरती में कितने वर्ष रहे? (23:112) वे (उत्तर में) कहेंगे, एक दिन या एक दिन का कुछ भाग। और (उचित तो यह है कि) तू गिनने वालों से पूछ ले। (23:113) ईश्वर कहेगा, (हाँ धरती में) तुम बहुत कम ठहरे, यदि तुम जानते होते! (23:114)

    इससे पहले क़ुरआने मजीद ने नरकवासियों से ईश्वर की वार्ता का वर्णन किया था। ये आयतें उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं कि ईश्वर उनसे, संसार में उनकी आयु के बारे में पूछेगा कि वे कितने वर्ष धरती में रहे? वे उत्तर में कहेंगे कि यदि वह दिनों व वर्षों की सही संख्या के बारे में पूछ रहा है तो उसे अपने फ़रिश्तों से पूछना चाहिए जिन्हें लोगों की आयु के हिसाब का दायित्व दिया गया था। हम तो दंड में ग्रस्त हैं और हमें कुछ याद नहीं है। हमारे विचार में तो धरती में हमारी आयु एक दिन भी नहीं थी, सप्ताह, महीने और वर्ष की तो बात ही अलग है।

    ईश्वर, संसार में कम समय बिताने की उनकी बात की पुष्टि करेगा और कहेगा कि अब जबकि तुम प्रलय में आ गए हो तो यह बात तुम्हारी समझ में आ रही है। काश उस समय यह बात तुम्हारी समझ में आ गई होती जब तुम पाप और उद्दंडता पर आग्रह कर रहे थे कि ऐसा दिन आने वाला है और इसके मुक़ाबले में संसार का कोई मूल्य नहीं है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय में कुछ लोगों को बहुत अधिक निराशा व खेद होगा क्योंकि उनकी समझ में आ जाएगा कि संसार के कुछ दिनों के ऐश्वर्य व आनंद के लिए उन्होंने अनंत दंड को ख़रीद लिया है।

    संसार एक पुल की भांति है जिस पर से हम गुज़रते हैं। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पुल के आस-पास के सुंदर दृष्य, हमें पुल के उस ओर अपने गंतव्य अर्थात प्रलय के अमर जीवन की ओर से निश्चेत न कर दें।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 115 की तिलावत सुनें।

    أَفَحَسِبْتُمْ أَنَّمَا خَلَقْنَاكُمْ عَبَثًا وَأَنَّكُمْ إِلَيْنَا لَا تُرْجَعُونَ (115)
    तो क्या तुमने यह समझ रखा है कि हमने तुम्हें व्यर्थ पैदा किया है और यह कि तुम हमारी ओर लौटाए नहीं जाओगे? (23:115)

    यह आयत प्रलय के अस्तित्व के कारण का उल्लेख करते हुए कहती है कि यदि प्रलय न हो तो संसार का जीवन निरर्थक एवं व्यर्थ हो जाएगा क्योंकि एक भौतिक व सांसारिक जीवन के लिए ईश्वर की ओर से मनुष्य में इतनी अधिक क्षमताओं व संभावनाओं की आवश्यकता नहीं थी और लोग बहुत से पशुओं की भांति बुद्धि व विचार तथा चयन की शक्ति रखे बिना ही संसार तथा उसके आनंदों से लाभान्वित हो सकते थे।
    यदि ईश्वर ने मनुष्य को इतनी विशेषताएं दी हैं और उससे कहा है कि वह अपने चयन व बुद्धि के आधार पर कर्म करे तो आवश्यक है कि मनुष्य अपने कार्यों के परिणाम पर ध्यान दे। अन्यथा अच्छे व बुरे कर्म एक समान हो जाएंगे और बुराई व अत्याचार हर स्थान पर फैल जाएगा।

    क्या बुद्धि इस बात को स्वीकार करती है कि यह महान संसार और अपार क्षमताओं का स्वामी यह मनुष्य, जो ज्ञानी एवं तत्वदर्शी रचयिता की ओर से बनाया गया है उसका बिना किसी हिसाब-किताब के अचानक ही अंत हो जाएगा?
    इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य की सृष्टि कि जो इस भव्य संसार का एक भाग है, व्यर्थ व निरर्थक नहीं हो सकती, हाँ यदि हम ईश्वर पर ईमान ही न रखते हों या उसे तत्वदर्शी न मानते हों तो बात ही अलग है।

    मनुष्य की सृष्टि का मुख्य लक्ष्य, परलोक में प्राप्त होगा और परलोक के बिना संसार की कल्पना, एक अधूरी व अस्पष्ट कल्पना है।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 116 और 117 की तिलावत सुनें।

    فَتَعَالَى اللَّهُ الْمَلِكُ الْحَقُّ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْكَرِيمِ (116) وَمَنْ يَدْعُ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آَخَرَ لَا بُرْهَانَ لَهُ بِهِ فَإِنَّمَا حِسَابُهُ عِنْدَ رَبِّهِ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْكَافِرُونَ (117)
    तो सर्वोच्च है वह ईश्वर जो सच्चा सम्राट है और उसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है और वही महान अर्श अर्थात सिंहासन का स्वामी है। (23:116) और जो कोई ईश्वर के साथ किसी दूसरे पूज्य को पुकारे, जिसके लिए उसके पास कोई तर्क नहीं, तो निश्चय ही उसका हिसाब उसके पालनहार के पास है। निश्चय ही काफ़िर कभी सफल नहीं होंगे। (23:117)

    यह आयत सृष्टि की व्यवस्था और मनुष्य की रचना के निरर्थक होने की बात को नकारते हुए कहती है कि ईश्वर रचयिता भी है और पालनहार भी, वह स्वामी भी है और शासक भी, तो फिर कैसे संभव है कि इस प्रकार का ईश्वर कोई निरर्थक कार्य करे? जबकि उसमें न किसी प्रकार की अज्ञानता है, न कमज़ोरी है और न अक्षमता। वह जो ज्ञान व तत्वदर्शिता का स्रोत है और लोगों को व्यर्थ एवं निरर्थक कार्यों से रोकता है तो यह बात कैसे स्वीकार की जा सकती है कि वह स्वयं व्यर्थ कार्य करेगा?

    हाँ यदि सृष्टि या संसार के संचालन के कार्य में उसका कोई सहभागी और समकक्ष होता तो संभव था कि सृष्टि की व्यवस्था में गड़बड़ हो जाती और मनुष्य को पैदा करने का लक्ष्य प्राप्त न हो पाता किंतु स्पष्ट है कि इस प्रकार की कल्पना पूर्ण रूप से निराधार है और कोई भी सही बुद्धि रखने वाला व्यक्ति ईश्वर के समान अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेगा, उसके समकक्ष को स्वीकार करने की बात संभव ही नहीं है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर हमारे मन में आने वाली हर वस्तु से श्रेष्ठ है क्योंकि जो कुछ मन में कल्पना स्वरूप आता है वह सीमित अस्तित्व है।

    सृष्टि, सदैव ईश्वर की युक्ति व उसके संचालन के अंतर्गत है। ऐसा नहीं है कि ईश्वर ने उसकी रचना करके उसे उसकी स्थिति पर छोड़ दिया हो।
    आइये अब सूरए मोमिनून की अंतिम आयत अर्थात आयत क्रमांक 118 की तिलावत सुनें।

    وَقُلْ رَبِّ اغْفِرْ وَارْحَمْ وَأَنْتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ (118)
    और (हे पैग़म्बर) कह दीजिए कि हे मेरे पालनहार! मुझे क्षमा कर दे और (मुझ पर) दया कर कि तू तो दया करने वालों में सबसे अच्छा है। (23:118)

    ईश्वर सूरए मोमिनून के अंत में अपने पैग़म्बर और लोगों को सिखाता है कि सदैव उसकी शरण में आएं और उसकी असीम दया व कृपा की प्राप्ति का आग्रह करें और यह जान लें कि अपने बंदों से ईश्वर का प्रेम किसी भी दूसरे से अधिक है। दूसरे लोग तभी तक हमें चाहते हैं जब तक हम उनके साथ अच्छाई करें किंतु यदि हम से कोई ग़लती या भूल हो जाए तो उनके प्रेम में कमी आ जाती है और कभी कभी तो हमसे उनका संपर्क पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है किंतु दयालु ईश्वर इस प्रकार का नहीं है वह गलती करने वाले अपने दासों से भी प्रेम करता है। इसी लिए उसने अपने इस प्रकार के दासों को पुकारते हुए कहा है कि मेरी ओर आओ ताकि मैं तुम लोगों को क्षमा करूं और तुम लोगों को पुनः अपनी कृपा का पात्र बनाऊं।

    इस आयत से हमने सीखा कि कोई भी यहां तक कि ईश्वरीय दूत भी ईश्वरीय कृपा से आवश्यकता मुक्त नहीं हैं और हरेक को उसके समक्ष नतमस्तक होना और अपनी दासता को स्वीकार करना चाहिए।
    हमें सदैव ईश्वर के समक्ष स्वंय को गलती करने वाला और पापी समझना चाहिए और अपनी गलतियों और पापों के लिए उससे क्षमा मांगनी चाहिए।