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    सूरए मोमिनून, आयतें 19-24, (कार्यक्रम 610)

    सूरए मोमिनून, आयतें 19-24, (कार्यक्रम 610)
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    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-591
    आइये पहले सूरए मोमिनून की 19वीं और 20वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    فَأَنْشَأْنَا لَكُمْ بِهِ جَنَّاتٍ مِنْ نَخِيلٍ وَأَعْنَابٍ لَكُمْ فِيهَا فَوَاكِهُ كَثِيرَةٌ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ (19) وَشَجَرَةً تَخْرُجُ مِنْ طُورِ سَيْنَاءَ تَنْبُتُ بِالدُّهْنِ وَصِبْغٍ لِلْآَكِلِينَ (20)
    फिर हमने उस (पानी) के द्वारा तुम्हारे लिए खजूरों और अंगूरों के बाग़ पैदा किए जिनमें तुम्हारे लिए बहुत अधिक फल हैं और उनमें से तुम खाते हो। (23:19) और वह वृक्ष भी जो सैना पर्वत से उगता है (और) तेल युक्त होता है और खाने वालों के लिए सालन भी है। (23:20)

    इससे पहले ईश्वर ने आकाश से वर्षा होने और धरती में पानी एकत्रित होने को अपनी एक मूल्यवान अनुकंपा बताया था। यह आयत उसी क्रम को जारी रखते हुए कहती है कि धरती के विभिन्न स्थानों में उगने वाले बाग़ और खजूर के बाग़ भी उसी वर्षा के पानी के कारण अस्तित्व में आते हैं जिसे ईश्वर भेजता है और इन बाग़ों के फल इतने अधिक हैं कि अपने मालिकों की खाने पीने की आवश्यकता की पूर्ति करने के अतिरिक्त उनकी आय का भी साधन बनते हैं।

    जैसे कि ज़ैतून का पेड़, कि जिसके महत्वपूर्ण केंद्र इस समय सीरिया व फ़िलिस्तीन हैं, खाने के तेल की आपूर्ति का भी अच्छा स्रोत है और उसका फल दस्तरख़ान पर भोजन के साथ खाई जाने वाली वस्तुओं में से भी एक है। क़ुरआने मजीद में ईश्वर द्वारा पैदा किए गए फलों में खजूर, अंगूर और ज़ैतून पर विशेष ध्यान से, मानवीय शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति में इनके विशेष स्थान का पता चलता है। रोचक बात यह है कि आज पोषण विज्ञान के विशेषज्ञ भी अपनी खोजों में इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि ये तीन फल बहुत से रोगों की रोक थाम और उनके उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पानी, वनस्पतियों, पशुओं और मनुष्यों के जीवन का आधार है। ईश्वर ने प्रकृति में पानी के चक्र और आकाश से वर्षा बरसा कर इस जीवनदायक तत्व की आपूर्ति को सुनिश्चित बनाया है।
    ईश्वर ने, जो मनुष्यों का रचयिता है, उनके खाने-पीने की आवश्यकताओं को स्वाभाविक रूप से पूरा किया है। इन अनुकंपाओं की अनदेखी करके खाने-पीने की अवैध वस्तुओं की ओर उन्मुख होना, ईश्वरीय अनुकंपाओं के प्रति कृतघ्नता है।

    आइये अब सूरए मोमिनून की 21वीं और 22वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَإِنَّ لَكُمْ فِي الْأَنْعَامِ لَعِبْرَةً نُسْقِيكُمْ مِمَّا فِي بُطُونِهَا وَلَكُمْ فِيهَا مَنَافِعُ كَثِيرَةٌ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ (21) وَعَلَيْهَا وَعَلَى الْفُلْكِ تُحْمَلُونَ (22)
    और निश्चय ही तुम्हारे लिए चौपायों में (भी) एक पाठ है। उनके पेटों में जो(दूध) है उसमें से हम तुम्हें पिलाते हैं और उनमें तुम्हारे लिए बहुत से लाभ हैं और तुम उन (के मांस) में से खाते भी हो। (23:21) और उन पर और नौकाओं पर तुम सवार होते हो। (23:22)

    ईश्वरीय अनुकंपाओं के वर्णन का क्रम जारी रखते हुए ये आयतें मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति में चौपायों की भूमिका की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि भेड़, बकरी व गाए जैसे चौपायों के पेट के भीतर पाए जाने वाले रक्त और गंदगियों के बीच से ईश्वर मनुष्य को शुद्ध और अच्छा दूध उपलब्ध कराता है जिसमें न ख़ून का रंग होता है और न ही किसी प्रकार की दुर्गंध। यह ऐसा स्वादिष्ट पेय है जो स्वयं भी पिया जाता है और इससे दही, मक्खन, मलाई, पनीर और इसी प्रकार की अन्य महत्वपूर्ण खाद्य वस्तुएं भी प्राप्त होती हैं।

    इनके ऊन और खाल से विभिन्न प्रकार के वस्त्र बनते हैं, इनके मांस से नाना प्रकार के व्यंजन तैयार होते हैं और इनकी पीठ को सवारी के लिए प्रयोग किया जाता है। यहां तक कि भेड़, बकरी और गाए के शरीर का कोई भाग भी व्यर्थ और लाभहीन नहीं होता और किसी न किसी प्रकार मानव जीवन में प्रयोग होता है।

    यदि छोटी बड़ी नौकाएं समुद्र और नदियों में यात्रियों व उनके सामानों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए प्रयोग होती हैं तो घोड़े और ऊँट, धरती पर मनुष्य की सवारी बनते हैं और आज के विकसित संसार में भी विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों और कठिन पर्वतीय मार्गों पर उनका महत्व यथावत बाक़ी है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि पशुओं के अस्तित्व को व्यर्थ नहीं समझना चाहिए। यदि हम पशुओं और मानव जीवन में उनकी भूमिका के बारे में ध्यान से सोचें तो हमें ईश्वर की पहचान के बहुत से पाठ मिल जाएंगे।

    सामान या यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए यात्रा, धरती पर मनुष्य की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक है और ईश्वर ने जल और थल दोनों में उसके साधन उपलब्ध कराए हैं।
    आइये अब सूरए मोमिनून की 23वीं और 24वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَى قَوْمِهِ فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُمْ مِنْ إِلَهٍ غَيْرُهُ أَفَلَا تَتَّقُونَ (23) فَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ قَوْمِهِ مَا هَذَا إِلَّا بَشَرٌ مِثْلُكُمْ يُرِيدُ أَنْ يَتَفَضَّلَ عَلَيْكُمْ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَأَنْزَلَ مَلَائِكَةً مَا سَمِعْنَا بِهَذَا فِي آَبَائِنَا الْأَوَّلِينَ (24)
    और हमने नूह को उनकी जाति की ओर भेजा तो उन्होंने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! ईश्वरकी उपासना करो कि उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई और पूज्य नहीं है तो क्या तुम उससे नहीं डरते? (23:23) तोउनकी जाति के सरदारों ने जो काफ़िर थे, कहाः यह तो बस तुम्हीं जैसा एक मनुष्य है जो तुम पर श्रेष्ठता प्राप्त करना चाहता है। और यदि ईश्वर चाहता तो कुछ फ़रिश्ते भेज देता। यह बात तो हमने अपने बाप-दादा से सुनी ही नहीं (कि मनुष्य को पैग़म्बर बना कर भेजा गया हो)। (23:24)

    सृष्टि की व्यवस्था में ईश्वर की शक्ति व महानता के चिन्हों का वर्णन करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत में मनुष्य के मार्गदर्शन के संबंध में ईश्वर की कृपा की ओर संकेत करता है और हज़रत नूह अलैहिस्सलाम द्वारा अपनी जाति के लोगों को ईमान लाने के प्रथम निमंत्रण की ओर संकेत करता है। उन्होंने अपनी जाति के लोगों को मूर्ति पूजा छोड़ने और एकेश्वरवाद की आस्था अपनाने का निमंत्रण दिया किंतु धनवान और सशक्त लोगों ने, जो उनके निमंत्रण को अपनी स्थिति के डांवाडोल होने का कारण समझ रहे थे, झूठे प्रचार द्वारा उन्हें एक ऐसा सत्ता लोलुप व्यक्ति दर्शाने का प्रयास किया जो लोगों को अपने अधीन बनाना चाहता है। उन्होंने कहा कि नूह, समाज के कल्याण और मार्गदर्शन के इच्छुक नहीं हैं।

    उन्होंने कहा कि यदि ईश्वर लोगों का मार्गदर्शन करना चाहता तो वह फ़रिश्तों को भेजता जो हर प्रकार के भौतिक व सांसारिक मामलों से दूर हैं और लोगों तक ईश्वर की बातें पहुंचाते हैं।
    जबकि ईश्वर की परंपरा फ़रिश्तों नहीं अपितु मनुष्यों द्वारा मानव जाति के मार्गदर्शन पर आधारित है क्योंकि मार्गदर्शन केवल मौखिक प्रचार नहीं है बल्कि मार्गदर्शक को अपने कर्म और व्यवहार द्वारा भी समाज के लिए आदर्श होना चाहिए ताकि लोग उसकी बात को स्वीकार कर सकें। फ़रिश्ते चूंकि मानव जाति के नहीं हैं इस लिए वे मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकते।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बर लोगों को मूर्ति पूजा छोड़ कर ईश्वर की उपासना करने का निमंत्रण देते थे, निश्चित रूप से वे लोगों को अपनी ओर नहीं बल्कि ईश्वर की ओर बुलाते थे।

    पैग़म्बरों के विरोधी, वे धनवान, सत्ता प्रेमी और शक्तिशाली लोग थे जो लोगों पर अपना वर्चस्व बाक़ी रखना चाहते थे।

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