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    सूरए मोमिनून, आयतें 47-51, (कार्यक्रम 614)

    सूरए मोमिनून, आयतें 47-51, (कार्यक्रम 614)
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    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-595 (हसन अब्बास)
    आइये पहले सूरए मोमिनून की 47वीं, 48वीं और 49वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    فَقَالُوا أَنُؤْمِنُ لِبَشَرَيْنِ مِثْلِنَا وَقَوْمُهُمَا لَنَا عَابِدُونَ (47) فَكَذَّبُوهُمَا فَكَانُوا مِنَ الْمُهْلَكِينَ (48) وَلَقَدْ آَتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ (49)
    तो (फ़िरऔन के दरबारियों ने) कहा, क्या हम अपने ही जैसे दो मनुष्यों पर ईमान ले आएं जबकि उनकी जाति हमारी ग़ुलाम भी है? (23:47) तो उन्होंने उन दोनों को झुठला दिया और तबाह होने वालों में से हो गए। (23:48) और हमने मूसा को आसमानी किताब प्रदान की ताकि उन लोगों (अर्थात बनी इस्राईल) का मार्गदर्शन हो सके। (23:49)

    इससे पहले हमने कहा कि ईश्वर ने हज़रत मूसा और उनके भाई हज़रत हारून अलैहिमस्सलाम को फ़िरऔन तथा उसके दरबारियों के पास भेजा ताकि वे उन्हें सत्य के मार्ग की ओर बुला सकें किंतु उन लोगों ने इन ईश्वरीय पैग़म्बरों की बात नहीं मानी और घमंड से काम लिया। ये आयतें उनकी अहंकार की भावना की ओर संकेत करती हैं कि वे कहते थे कि मूसा व हारून भी हमारी ही भांति दो मनुष्य हैं, इसके अतिरिक्त उनका संबंध बनी इस्राईल से है कि जिसके लोग हमारे दास हैं अतः न तो मूसा व हारून को भी हम पर श्रेष्ठता प्राप्त है और न ही उनकी जाति हमसे श्रेष्ठ है। फिर उन्हें किस प्रकार इस बात की आशा है कि हम, जो अपनी जाति के सबसे प्रतिष्ठित लोग हैं, उनकी बात स्वीकार कर लें और उनका आज्ञापालन करने लगें।

    रोचक बात यह है कि फ़िरऔन व उसके दरबारी ईश्वरीय पैग़म्बरों पर वर्चस्ववाद का आरोप लगा रहे थे जबकि स्वयं वे लोगों को अपना दास समझते थे और अत्यंत भयावह ढंग से जनता के कमज़ोर वर्गों पर अपना वर्चस्व थोप रहे थे। अंततः उनके इसी घमंड और उद्दंडता के कारण वे तबाह हो गए तथा फ़िरऔन और उसकी पूरी सेना नील नदी में डूब गई और बनी इस्राईल की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हो गया।

    आगे चल कर आयतें ईश्वर की ओर से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के पास तौरैत नामक आसमानी किताब भेजे जाने की ओर संकेत करती हैं जिन्हें ईश्वर ने बनी इस्राईल जाति के मार्गदर्शन के लिए भेजा था ताकि वे फ़िरऔन व उसके लोगों के ग़लत कर्मों से दूर हो जाएं और सीधे मार्ग पर चलने लगें।
    इन आयतों से हमने सीखा कि फ़िरऔन की व्यवस्था में तर्क का कोई मूल्य नहीं है। इसमें लोगों की बातों के मूल्य को आंकने की कसौटी उनकी सामाजिक स्थिति होती है।
    राष्ट्रों पर वर्चस्व जमाने वाले साम्राज्यवादी और अत्याचारी अंततः एक दिन ईश्वर की इच्छा से तबाह व बर्बाद हो कर रहते हैं।

    आइये अब सूरए मोमिनून की 50वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَجَعَلْنَا ابْنَ مَرْيَمَ وَأُمَّهُ آَيَةً وَآَوَيْنَاهُمَا إِلَى رَبْوَةٍ ذَاتِ قَرَارٍ وَمَعِينٍ (50)
    और हमने मरयम के पुत्र और उसकी माँ को एक (बड़ी) निशानी बनाया और उन दोनों को एक सुरक्षित, ऊँचे और जल समृद्ध स्थान में शरण दी। (23:50)

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के पश्चात, ईश्वर ने हज़रत ईसा मसीह को बनी इस्राईल का पैग़म्बर बना कर भेजा कि जिनका अस्तित्व ही एक महान चमत्कार समझा जाता है क्योंकि उनकी माता हज़रत मरयम कि जो पवित्रता और सतीत्व में आदर्श थीं, ईश्वर की इच्छा से बिना विवाह के ही गर्भवती हो गईं और फिर हज़रत ईसा ने जन्म लिया।
    यह पुत्र ईश्वरीय निशानियों में समझा जाता था क्योंकि हज़रत मरयम सलामुल्लाह अलैहा, किसी भी पुरुष से संपर्क के बिना ही ईश्वर की इच्छा से गर्भवती हुई थीं और हज़रत ईसा ने बिना पिता के जन्म लिया था।

    इस आयत से हमने सीखा कि हज़रत ईसा मसीह, ईश्वर के नहीं अपितु हज़रत मरयम के पुत्र हैं, वे ईश्वर नहीं बल्कि ईश्वर की निशानी हैं।
    ईश्वर ने हज़रत ईसा व उनकी माता को शत्रुओं से बचाए रखा तथा उन्हें एक सुरक्षित, शांत एवं विभूतिपूर्ण स्थान में ठहराया।
    आइये अब सूरए मोमिनून की 51वीं आयत की तिलावत सुनें।

    يَا أَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ (51)
    हे (मेरे) पैग़म्बरो! पवित्र वस्तुओं में से खाओ और अच्छे कर्म करो कि निश्चय ही जो कुछ तुम करते हो उसे मैं जानता हूँ। (23:51)

    सूरए मोमिनून की पचास आयतों की समाप्ति पर कि जिनमें ईश्वरीय पैग़म्बरों के संक्षिप्त वृत्तांतों का उल्लेख किया गया, इस आयत में कहा गया है कि विरोधियों की बातों के विपरीत, जो यह कहा करते थे कि क्यों पैग़म्बर मनुष्यों की भांति हैं? ईश्वर ने पैग़म्बरों को मनुष्यों में से ही बनाया था और उन्हें भी अन्य लोगों की भांति खाने-पीने की आवश्यकता होती है। इसी के साथ वे दो बातों में अन्य लोगों से भिन्न होते हैं। प्रथम तो यह कि वे खाने-पीने की वर्जित वस्तुओं से, जो मनुष्य में पाश्विकता की आत्मा जागृत करती है, बहुत अधिक दूर रहते हैं और दूसरे यह कि वे खाने-पीने से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को केवल भले कार्यों में प्रयोग करते हैं।

    पैग़म्बर खान-पान को परिपूर्णता का साधन मानते हैं और इसी लिए वे केवल पवित्र व हलाल वस्तुओं को प्रयोग करते हैं जबकि जिन लोगों का लक्ष्य केवल खाना ही होता है वे किसी भी रूप में इस सिद्धांत का पालन नहीं करते बल्कि वे हर उस चीज़ की प्राप्ति का प्रयास करते हैं जिससे उनकी पाश्विक इच्छाएं पूरी हो जाएं चाहे वह वैध व पवित्र वस्तु हो या अवैध।

    क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में भी कुलू अर्था खाओ शब्द के साथ ही कुछ अन्य आदेशों का भी उल्लेख किया गया है जिससे पता चलता है कि खाना-पीना लक्ष्य नहीं है बल्कि केवल मनुष्य की प्रगति व परिपूर्णता का साधन है। उदाहरण स्वरूप कहा गया है कि खाओ और कृतज्ञ रहो, खाओ और दरिद्रों को भी खिलाओ, खाओ किंतु अपव्यय न करो।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के पैग़म्बर भौतिक जीवन के इन्हीं साधनों के साथ उच्चतम आध्यात्मिक दर्जों तक पहुंचे हैं।

    ईश्वर के प्रिय बंदे, संसार से कटे हुए नहीं थे बल्कि वे भौतिक व प्राकृतिक स्रोतों से लाभान्वित होते थे और उनका जीवन साधारण मनुष्यों जैसा ही था।
    भले कर्म के सामर्थ्य के लिए, हलाल आहार आवश्यक है। हराम खाना, मनुष्य को भले कर्मों से रोकता है।

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