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    सूरए मोमिनून, आयतें 57-62, (कार्यक्रम 616)

    सूरए मोमिनून, आयतें 57-62, (कार्यक्रम 616)
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    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-597
    आइये पहले सूरए मोमिनून की 57वीं, 58वीं और 59वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    إِنَّ الَّذِينَ هُمْ مِنْ خَشْيَةِ رَبِّهِمْ مُشْفِقُونَ (57) وَالَّذِينَ هُمْ بِآَيَاتِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ (58) وَالَّذِينَ هُمْ بِرَبِّهِمْ لَا يُشْرِكُونَ (59)
    निश्चय ही जो लोग अपने पालनहार के भय से काँपते रहते हैं। (23:57) और जो लोग अपने पालनहार की आयतों पर ईमान लाते हैं। (23:58) और जो लोग किसी को अपने पालनहार का समकक्ष नहीं ठहराते। (23:59)

    इससे पहले लोगों के उस गुट की स्थिति का वर्णन किया गया जो धन, संतान और भौतिक ऐश्वर्य को भलाई समझता था और इन चीज़ों की प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहता था किंतु ये आयतें ईमान वालों की विशेषताओं का वर्णन करती हैं कि जिनके निकट भलाई का अर्थ लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करना और उनके लिए आराम उपलब्ध कराना है।
    सच्चे ईमान वालों की पहली विशेषता ईश्वर की महानता के कारण उससे भय है कि जो उनके पूरे अस्तित्व को अपने घेरे में लिए रहता है और इसी भय के कारण वे ईश्वरीय सीमाओं को कभी नहीं लांघते। ईश्वर की सच्ची पहचान के कारण उससे भय और लज्जा इस बात का कारण बनती है कि ईमान वाला व्यक्ति किसी भी मनुष्य और किसी भी वस्तु को उसका समकक्ष नहीं ठहराता और केवल उसके आदेशों का पालन करता है।

    ईश्वर से भय का अर्थ ख़तरनाक वस्तुओं या लोगों से भौतिक भय नहीं है बल्कि महान लोगों के मुक़ाबले में हर प्रकार के अनुचित व्यवहार का डर है और एक दम स्पष्ट सी बात है कि इस पूरे ब्रह्मांड में सृष्टि के रचयिता व पालनहार से महान कोई नहीं है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि वह भय जिसके कारण मनुष्य अपने पालनहार के आदेशों के विरोध से बचता है और सही मार्ग पर चलता है, एक सकारात्मक भय है और मनुष्य की प्रगति व परिपूर्णता का कारण बनता है।

    वह ईमान मूल्यवान है जो शुद्ध व संपूर्ण हो। ऐसे ईमान का कोई लाभ नहीं कि मनुष्य उपासना में तो ईश्वर का दास हो किंतु व्यवसाय, व्यापार, राजनीति व जीवन के अन्य महत्वपूर्ण मामलों में ग़ैर ईश्वरीय विचारों व दृष्टिकोणों का पालन करे।
    आइये अब सूरए मोमिनून की 60वीं और 61वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَالَّذِينَ يُؤْتُونَ مَا آَتَوْا وَقُلُوبُهُمْ وَجِلَةٌ أَنَّهُمْ إِلَى رَبِّهِمْ رَاجِعُونَ (60) أُولَئِكَ يُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَهُمْ لَهَا سَابِقُونَ (61)
    और जो लोग (ईश्वर के मार्ग में उतना) देते हैं जितना वे दे सकते हैं और (इसके बावजूद) उनके दिल काँप रहे होते हैं कि (वे जानते हैं कि) निश्चित रूप से वे अपने पालनहार की ओर पलटने वाले हैं। (23:60) यही लोग भलाइयों (को अंजाम देने) में जल्दी करते हैं और यही उसमें अग्रसर रहने वाले हैं। (23:61)

    ये आयतें ईमान वालों की कुछ व्यवहारिक विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि वे भले कर्म करने में तेज़ी दिखाते हैं और एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। वे जो कुछ ईश्वर के मार्ग में देते हैं उसे अपना दायित्व मानते हैं और उन्हें सदैव इस बात की चिंता रहती है कि कहीं ऐसा न हो कि उनके कर्म में निष्ठा की कमी रह गई हो और ईश्वर उसे स्वीकार न करे। वे कभी भी अपने भले कर्मों पर घमंड नहीं करते और कभी भी लोगों पर उपकार नहीं जताते।

    इन आयतों से हमने सीखा कि संसार प्रेमी लोग धन व संपत्ति एकत्रित करने के लिए एक दूसरे से होड़ करते हैं किंतु ईमान वाले भले कर्म करने और लोगों तक भलाई पहुंचाने में एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं।
    सांसारिक मामलों में तेज़ी और होड़ ख़तरनाक है किंतु प्रलय के लिए यही काम आवश्यक और सराहनीय है।
    आइये अब सूरए मोमिनून की 62वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَلَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا وَلَدَيْنَا كِتَابٌ يَنْطِقُ بِالْحَقِّ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ (62)
    और हमकिसी पर भी उसकी क्षमता और सामर्थ्य से बढ़कर दायित्व (का बोझ) नहीं डालते और हमारे पास एक किताब है जो (लोगों के कर्मों के बारे में) सच्ची बात कहती है और उन पर अत्याचार नहीं किया जाएगा। (23:62)

    पिछली आयतों में भले कामों में तेज़ी और होड़ को ईमान वालों की एक स्पष्ट विशेषता बताया गया था। यह आयत कहती है कि ईश्वर को अपने सभी बंदों से एक समान अपेक्षा नहीं है क्योंकि उसने उन्हें भिन्न-भिन्न स्वभाव का पैदा किया है। हर व्यक्ति अपनी बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमता के अनुसार ही उत्तरदायी होता है, उससे अधिक का नहीं। वह जो कुछ समझता है, उसे स्वीकार करे तथा व्यवहारिक चरण में भी अपनी शारीरिक शक्ति एवं आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार कर्म करे।

    निश्चित रूप से समाज में लोगों की क्षमताएं, संभावनाएं तथा परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं। इन्हीं अंतरों के कारण ईश्वर ने सभी लोगों के लिए एक समान दायित्व नहीं रखे हैं। ईश्वर ने अपने बंदों के लिए जो भी दायित्व निर्धारित किया है वह न्याय के आधार पर है। प्रलय में भी लोगों के कर्मों का हिसाब-किताब उनकी क्षमताओं व संभावनाओं के आधार पर किया जाएगा। इस आधार पर ईश्वर की दृष्टि में धनवान व दरिद्र एक समान नहीं हैं जिस प्रकार से कि ज्ञानी का दायित्व, अज्ञानी से कहीं अधिक है।

    इस आयत से हमने सीखा कि धार्मिक कर्तव्यों तथा प्रलय में दिए जाने वाले दंड एवं पारितोषिक के बारे में ईश्वर का मानदंड, लोगों की बौद्धिक क्षमता और शारीरिक व आर्थिक सामर्थ्य है।
    ईश्वर के लिए कर्म करने पर कभी पश्चाताप या पराजय का सामना नहीं करना पड़ता क्योंकि वह कभी भी मनुष्य की क्षमता से अधिक उस पर दायित्व नहीं डालता और साथ ही परिणाम तक पहुंचने को, बंदे को पारितोषिक देने की शर्त नहीं ठहराता।

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