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    सूरए मोमिनून, आयतें 63-69, (कार्यक्रम 617)

    सूरए मोमिनून, आयतें 63-69, (कार्यक्रम 617)
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    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-598
    आइये पहले सूरए मोमिनून की 63वीं आयत की तिलावत सुनें।

    بَلْ قُلُوبُهُمْ فِي غَمْرَةٍ مِنْ هَذَا وَلَهُمْ أَعْمَالٌ مِنْ دُونِ ذَلِكَ هُمْ لَهَا عَامِلُونَ (63)
    बल्किउनके हृदय इस (सत्य) की ओर से निश्चेतनामें (पड़े हुए) हैं और इसके अतिरिक्त भी उनके (बहुत से बुरे) कर्म हैं जिन पर वे कार्यबद्ध हैं। (23:63)

    इससे पहले ईमान वालों व काफ़िरों की कुछ विशेषताओं का उल्लेख किया गया। यह आयत काफ़िरों की कुछ अन्य विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहती है कि सांसरिक मायामोह और भौतिकवाद ने उन्हें इस प्रकार अपनी चपेट में ले रखा है कि वे ईश्वर व प्रलय की ओर से निश्चेत हो गए हैं। न तो वे ईश्वर की उपासना करते हैं और न ही परलोक के बारे में कुछ सोचते हैं।
    स्वाभाविक है कि इस प्रकार के लोगों का व्यवहार, ईमान वालों के चरित्र से भिन्न होता है और उन्हें बुरे व अप्रिय कार्यों पर लज्जा नहीं आती। बल्कि कभी कभी तो वे अपने बुरे कर्मों पर गर्व करते हैं और उन्हें प्रगति व सभ्यता का चिन्ह मानते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि सत्य को पहचानने से निश्चेतना, विचार व व्यवहार में मनुष्य की पथभ्रष्टता का कारण बनती है।
    बुरे कर्मों पर आग्रह मनुष्य की प्रवृत्ति को बदल देता है और उसे उन्हीं अनुचित कर्मों का रसिया बना देता है जो वह करता रहा है।
    आइये अब सूरए मोमिनून की 64वीं और 65वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    حَتَّى إِذَا أَخَذْنَا مُتْرَفِيهِمْ بِالْعَذَابِ إِذَا هُمْ يَجْأَرُونَ (64) لَا تَجْأَرُوا الْيَوْمَ إِنَّكُمْ مِنَّا لَا تُنْصَرُونَ (65)
    यहाँ तक कि जब हम उनके संपन्न लोगों को दंड में ग्रस्त करेंगे तो उस समय वे चीख़ पड़ेंगे। (23:64) (उनसे कहा जाएगा) चिल्लाओ नहीं कि निश्चित रूप से आज तुम्हें हमारी ओर से कोई सहायता मिलने वाली नहीं है। (23:65)

    काफ़िरों की अज्ञानता व निश्चेतना उस समय तक जारी रहेगी जब तक वे ईश्वरीय दंड को न देख लें किंतु दंड आने के बाद, कि जो सभी को अपनी चपेट में ले लेगा, वे लोग जो ऐश्वर्य और संपन्नता में रहे होंगे, अपने धन और ऐश्वर्य के साधनों के खोने के कारण विलाप करने लगेंगे किंतु इसका कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि वापसी का कोई मार्ग नहीं होगा। किसी भी वस्तु या व्यक्ति में ईश्वरीय दंड के मुक़ाबले में खड़ा होने की क्षमता नहीं होगी और ईश्वर की ओर से भी दंड में कोई कमी नहीं की जाएगी।

    इन आयतों से हमने सीखा कि संसार और उसके ऐश्वर्य का मोह, उससे मन छुड़ाने को अधिक कठिन बना देता है।
    ईश्वर का दंड, उसके न्याय के आधार पर है अतः अपराधियों को इस बात की प्रतीक्षा में नहीं रहना चाहिए कि उन्हें ईश्वर की ओर से सहायता प्राप्त होगी।
    आइये अब सूरए मोमिनून की 66वीं और 67वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    قَدْ كَانَتْ آَيَاتِي تُتْلَى عَلَيْكُمْ فَكُنْتُمْ عَلَى أَعْقَابِكُمْ تَنْكِصُونَ (66) مُسْتَكْبِرِينَ بِهِ سَامِرًا تَهْجُرُونَ (67)
    निश्चय ही अतीत में तुम्हें मेरी आयतें सुनाई जाती थीं तो तुम उलटे पांव वापस चले जाते थे। (23:66) उसके मुक़ाबले में तुम घमंड करते थे और रात की बैठकों में अनुचित बातें किया करते थे। (23:67)

    ये आयतें काफ़िरों के कुफ़्र के कारण का उल्लेख बयान करते हुए कहती हैं कि वे अज्ञानता के चलते नहीं बल्कि ज्ञान के साथ और जानते बूझते काफ़िर हुए हैं क्योंकि जब ईश्वरीय पैग़म्बर उनके समक्ष ईश्वर की किताब की तिलावत करते थे तो वे अपने घमंड और अहंकार के चलते उनकी ओर से मुंह मोड़ लेते थे। वे अपनी निजी बैठकों में भी पैग़म्बर तथा उनकी बातों को बुरा भला कहते थे।
    स्वाभाविक है कि इस प्रकार के घमंडी एवं अहंकारी लोगों का अंजाम ईश्वरीय दंड के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। वस्तुतः वे लोग वही काटते हैं जो वे पहले बो चुके होते हैं।
    इन आयतों से हमने सीखा कि घमंड की भावना के चलते मनुष्य सत्य सुनने तक से भी इन्कार कर देता है, उसे स्वीकार करने और उस पर क्रियान्वयन की तो बात ही अलग है।
    जिन लोगों के पास पैग़म्बरों के निमंत्रण के मुक़ाबले में कोई स्पष्ट तर्क नहीं होता वे उन्हें बुरा भला कहने लगते हैं।

    आइये अब सूरए मोमिनून की 68वीं और 69वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    أَفَلَمْ يَدَّبَّرُوا الْقَوْلَ أَمْ جَاءَهُمْ مَا لَمْ يَأْتِ آَبَاءَهُمُ الْأَوَّلِينَ (68) أَمْ لَمْ يَعْرِفُوا رَسُولَهُمْ فَهُمْ لَهُ مُنْكِرُونَ (69)
    तो क्या उन्होंने इस कथन पर विचार नहीं किया या उनके पास वह चीज़ आ गई जो उनके पूर्वजों के पास नहीं आई थी? (23:68) या उन्होंने अपने पैग़म्बर को नहीं पहचाना और इस लिए उसका इन्कार कर रहे हैं? (23:69)

    पिछली आयतों में कुफ़्र एवं अहंकार के कारणों का उल्लेख करने के बाद क़ुरआने मजीद इन आयतों में कहता है कि वास्तविकता यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के विरोधियों ने इस किताब में कि जो ईश्वरीय कथन है, मंथन नहीं किया है अन्यथा वे समझ जाते कि यह किताब भी पिछले पैग़म्बरों की किताबों की भांति ही है और उनमें जो बातें थीं वैसी ही बातें इसमें भी हैं। वे तौरैत व इन्जील की शिक्षाओं से अवगत हैं और जानते हैं कि उनमें भी एकेश्वरवाद और भले कर्मों का निमंत्रण दिया गया है और पैग़म्बरे इस्लाम ने कोई नई बात प्रस्तुत नहीं की है।

    इसके अतिरिक्त पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने लोगों के बीच अपनी पूरी आयु बिताई है और सभी उनके भले चरित्र के साक्षी हैं बल्कि लोगों ने ही उन्हें अमीन अर्थात अमानतदार जैसे उपनाम दिए हैं तो फिर उनके बारे में इतना कुछ जानने के बावजूद वे किस प्रकार उनके निमंत्रण को झुठला रहे हैं और उन्हें झूठा बता रहे हैं?
    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर काफ़िरों की इस बात के लिए निंदा करता है कि वे क्यों क़ुरआन की आयतों के बारे में सोच-विचार नहीं करते तो उन ईमान वालों का क्या हाल होगा जो क़ुरआन में मंथन नहीं करते?

    सभी ईश्वरीय पैग़म्बरों के निमंत्रण का आधार एक ही है अतः एक पैग़म्बर के अनुसरण पर आग्रह और उसके बाद वाले पैग़म्बर का इन्कार तर्कहीन कार्य है।

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