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    सूरए मोमिनून, आयतें 70-74, (कार्यक्रम 618)

    सूरए मोमिनून, आयतें 70-74, (कार्यक्रम 618)
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    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-599
    आइये पहले सूरए मोमिनून की 70वीं आयत की तिलावत सुनें।

    أَمْ يَقُولُونَ بِهِ جِنَّةٌ بَلْ جَاءَهُمْ بِالْحَقِّ وَأَكْثَرُهُمْ لِلْحَقِّ كَارِهُونَ (70)
    या वे कहते हैं कि उन्हें उन्माद है। (ऐसा नहीं है) बल्कि वे उनके पास सत्य लेकर आए हैं किंतु उनमें से अधिकांश सत्य (की स्वीकृति) को पसंद नहीं करते हैं। (23:70)

    इससे पहले पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के साथ विरोधियों के अनुचित व्यवहार का वर्णन किया गया। यह आयत उनके द्वारा पैग़म्बर के संबंध में कही जाने वाली एक अनुचित बात की ओर संकेत करते हुए कहती है कि चूंकि काफ़िर सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं इस लिए वे ईश्वर द्वारा पैग़म्बर के पास भेजी जाने वाली आयतों को ईश्वरीय कथन नहीं मानते बल्कि कहते हैं कि वे उन्माद का शिकार हो गए हैं और इसी कारण इस प्रकार की बातें कर रहे हैं या फिर कहते हैं कि उनका संबंध जिन्नों से है और वे उन्हीं के प्रभाव में इस प्रकार की बात करते हैं।

    ईश्वर विरोधियों की भ्रांति फैलाने वाली इस प्रकार की बातों के उत्तर में कहता है कि समस्या उन्हीं की ओर से है कि वे सत्य को स्वीकार करना नहीं चाहते अन्यथा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की बातों की सत्यता पूर्ण रूप से स्पष्ट है और उनमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है।
    इस आयत से हमने सीखा कि धर्म के शत्रुओं की एक चाल यह रही है कि बड़ी धार्मिक हस्तियों की छवि को धूमिल बना दिया जाए।

    धार्मिक नेताओं का यह दायित्व यह है कि वे सत्य बात लोगों के समक्ष प्रस्तुत करें चाहे अधिकांश लोग उन बातों को स्वीकार न करें और उन्हें सुन कर अप्रसन्न ही क्यों न हो जाएं।
    आइये अब सूरए मोमिनून की 71वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَلَوِ اتَّبَعَ الْحَقُّ أَهْوَاءَهُمْ لَفَسَدَتِ السَّمَاوَاتُ وَالْأَرْضُ وَمَنْ فِيهِنَّ بَلْ أَتَيْنَاهُمْ بِذِكْرِهِمْ فَهُمْ عَنْ ذِكْرِهِمْ مُعْرِضُونَ (71)
    और यदि सत्य, उनकी इच्छाओं के अनुसार चलता तो समस्त आकाश और धरती और जो कुछ भी उनमें है, तबाह हो जाता। ऐसा नहीं है बल्कि हमने उन्हें (क़ुरआन के रूप में) याद दिलाने वाला साधन प्रदान किया है किंतु वे तो अपनी याद (के साधन) से ही मुंह फेर रहे हैं। (23:71)

    यह आयत कहती है कि काफ़िर इस लिए क़ुरआने मजीद का विरोध करते हैं क्योंकि यह उनकी आंतरिक एवं अनुचित इच्छाओं से मेल नहीं खाता और यदि यह तै होता कि होता कि सृष्टि के नियम व क़ानून मनुष्य की इच्छाओं के अनुसार हों तो फिर पूरे संसार में अराजकता फैल जाती और फिर संसार के संचालन के लिए कोई सही मानदंड न रह जाता।
    आगे चल कर आयत कहती है कि क़ुरआने मजीद की आयतें मनुष्य को निश्चेतना की नींद से जगाने और उसकी मुक्ति व कल्याण का साधन हैं किंतु आंतरिक इच्छाओं का पालन इस बात का कारण बनता है कि मनुष्य इन ईश्वरीय आयतों की ओर से मुंह मोड़ ले।

    इस आयत से हमने सीखा कि बहुत से लोग चाहते हैं कि धर्म की शिक्षाएं उनकी इच्छाओं के अनुसार हों जबकि धर्म, लोगों की आंतरिक इच्छाओं नहीं अपितु सत्य व वास्तविकता का अनुसरण करता है।
    सृष्टि की व्यवस्था सत्य व न्याय पर आधारित है किंतु लोगों को आशा होती है कि संसार का संचालन उनकी इच्छाओं के अनुसार हो।
    आइये अब सूरए मोमिनून की 72वीं आयत की तिलावत सुनें।

    أَمْ تَسْأَلُهُمْ خَرْجًا فَخَرَاجُ رَبِّكَ خَيْرٌ وَهُوَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ (72)
    (हे पैग़म्बर!) क्या आप (उनसे अपने निमंत्रण का) बदला मांग रहे हैं, (कदापि नहीं क्योंकि आप जानते हैं कि) आपके पालनहार का पारितोषिक ही उत्तम है और वह सर्वोत्तम रोज़ीद दाता है। (23:72)

    पिछली आयत के क्रम को जारी रखते हुए यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करती है और कहती है कि जो विरोधी, सत्य को स्वीकार करने से इन्कार करते हैं तो क्या उनके इन्कार का कारण यह है कि आपने धर्म के प्रचार और उन्हें एकेश्वरवाद का निमंत्रण देने के बदले में उनसे कोई बदला मांगा है? इसके बाद आयत इस बहाने को भी रद्द करते हुए कहती है कि स्पष्ट है कि ईश्वरीय पैग़म्बर अपना पारितोषिक ईश्वर से प्राप्त करते हैं और उन्हें लोगों से कोई अपेक्षा नहीं होती।

    इस आयत से हमने सीखा कि धर्म के प्रचार के बदले में लोगों से पैसा कोई ख़र्च नहीं मांगना चाहिए, यदि वे अपनी इच्छा से कुछ दे दें तो यह अलग बात है।
    सभी लोगों की रोज़ी ईश्वर के हाथ में है। उसने सत्य का संदेश पहुंचाने वालों और धर्म का प्रचार करने वालों की रोज़ी को सुनिश्चित बनाया है।
    आइये अब सूरए मोमिनून की 73वीं और 74वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَإِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ (73) وَإِنَّ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآَخِرَةِ عَنِ الصِّرَاطِ لَنَاكِبُونَ (74) وَلَوْ رَحِمْنَاهُمْ وَكَشَفْنَا مَا بِهِمْ مِنْ ضُرٍّ لَلَجُّوا فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ (75)
    और निश्चिय ही आप उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुला रहे हैं। (23:73) किंतु जो लोग प्रलय पर ईमान नहीं रखते वे इस मार्ग से विचलित हो गए हैं। (23:74)

    इन आयतों में ईश्वर अपने पैग़म्बर से कहता है कि विरोधियों की ग़लत व अनुचित कथनी व करनी आपको अपने दायित्व के पालन की ओर से निराश न कर दे। इसी प्रकार उनके द्वारा सत्य का इन्कार भी आपको अपने मार्ग की सत्यता में संदेह में ग्रस्त न करे। जान लीजिए कि आपका मार्ग सच्चा है और आप, लोगों को सही मार्ग की ओर बुला रहे हैं। समस्या यह है कि काफ़िर और प्रलय का इन्कार करने वाले, बुद्धि व सही प्रवृत्ति के मार्ग से विचलित हो गए हैं और ईश्वर के सीधे मार्ग पर वापस नहीं आएंगे।

    हदीसों के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके वंश के इमामों का चरित्र ही जीवन का सीधा मार्ग है। जो भी इस मार्ग से विचलित होता है वह सत्य के मार्ग से हट जाता है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बरों ने जो मार्ग दिखाया है वह मोक्ष व कल्याण तक पहुंचने का सबसे निकट व विश्स्त मार्ग है क्योंकि सीधी रेखा, दो बिंदुओं के बीच की सबसे छोटी रेखा होती है जबकि अन्य रेखाएं, टेढ़ी-मेढ़ी और ऊंच-नीच वाली होती हैं और कभी भी मनुष्य को लक्ष्य तक नहीं पहुंचातीं।

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