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    सूरए मोमिनून, आयतें 75-80, (कार्यक्रम 619)

    सूरए मोमिनून, आयतें 75-80, (कार्यक्रम 619)
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    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-600
    आइये पहले सूरए मोमिनून की 75वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَلَوْ رَحِمْنَاهُمْ وَكَشَفْنَا مَا بِهِمْ مِنْ ضُرٍّ لَلَجُّوا فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ (75)
    और यदि हम इन पर दया करें और जिस पीड़ा में वे (इस समय) ग्रस्त हैं उसे दूर कर दें तो ये अपनी उद्दंडता में बिल्कुल ही बहक जाएंगे। (23:75)

    इससे पहले पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के विरोधियों के कुछ बहानों और उनके उत्तरों का उल्लेख किया गया था। यह आयत कहती है कि यदि ईश्वर उन्हें अपनी दया व कृपा का पात्र बनाए और उनकी समस्याओं का निदान कर दे तब भी वे ईश्वर पर ध्यान देने और अपनी पिछली ग़लतियों का प्रायश्चित करने के बजाए अपनी पिछली ग़लत शैली पर ही आग्रह करते रहेंगे और उद्दंडता में बाक़ी रहेंगे।

    जो व्यक्ति सो रहा है उसे आवाज़ देकर जगाया जा सकता है किंतु जो व्यक्ति सोता हुआ बन गया हो उसे हिलाने पर भी वह नहीं जागता। जो व्यक्ति पथभ्रष्टता में है वह सत्य की आवाज़ सुन कर सही मार्ग पर आ सकता है किंतु जो पथभ्रष्टता में रहने पर आग्रह करता हो उसका मार्गदर्शन नहीं हो सकता। इस प्रकार का व्यक्ति मानो सत्य की बात को सुनता ही नहीं है।

    इस आयत से हमने सीखा कि पापी और निश्चेतना में ग्रस्त लोग, ईश्वर द्वारा उन्हें प्रदान किए गए अवसरों से सही लाभ उठाने के बजाए उनका दुरुपयोग करते हैं।
    उद्दंडता का परिणाम, भटकाव के रूप में ही सामने आता है।
    आइये अब सूरए मोमिनून की 76वीं और 77वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ أَخَذْنَاهُمْ بِالْعَذَابِ فَمَا اسْتَكَانُوا لِرَبِّهِمْ وَمَا يَتَضَرَّعُونَ (76) حَتَّى إِذَا فَتَحْنَا عَلَيْهِمْ بَابًا ذَا عَذَابٍ شَدِيدٍ إِذَا هُمْ فِيهِ مُبْلِسُونَ (77)
    और निश्चित रूप से हमने उन्हें यातना में ग्रस्त कर दिया फिर भी न तो वे अपने पालनहार के आगे झुके और न ही कभी उसके समक्ष गिड़गिड़ाए। (23:76) यहाँ तक कि जब हम (मृत्यु के पश्चात) उन पर अत्यंत कड़ी यातना का द्वार खोल देंगे तो वे सहसा ही उसमें निराश होकर रह जाएंगे। (23:77)

    यह ईश्वर की परंपरा है कि यदि निश्चेत लोग ईश्वरीय कृपाओं व अनुकंपाओं से न जागें तो वह उन्हें उनके पापों के कारण इसी संसार में दंडित करता है और कड़ी यातनाओं में ग्रस्त करता है। इसके बावजूद अनुभवों से पता चलता है कि हठधर्मी लोग फिर भी नहीं जागते और अपने पालनहार के समक्ष सिर नहीं झुकाते। मनुष्य स्वाभाविक रूप से कटु घटनाओं में टूटे हुए दिल के साथ अपने पालनहार की ओर उन्मुख होता है, अपने पिछले पापों से तौबा करता है और रोते एवं गिड़गिड़ाते हुए ईश्वर से कल्याण व मुक्ति की प्रार्थना करता है किंतु अहं एवं घमंड की भावना, मनुष्य को इस सीमा तक बढ़ा देती है कि वह कठिन परिस्थितियों में भी ईश्वर की छत्रछाया में जा कर उससे सहायता मांगने के लिए तैयार नहीं होता।

    इस प्रकार के लोगों में उद्दंतडता व अहंकार की भावना उनकी आयु के अंत तक जारी रहती है किंतु प्रलय में जब वे नरक का कड़ा दंड देखते हैं तो सहसा ही उन्हें आभास हो जाता है कि वे ख़ाली हाथ आए हैं और उनके पास अपनी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है किंतु तब तक देर हो चुकी होती है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि उद्दंडी व हठधर्मी काफ़िर न तो ईश्वर की दया व कृपा से मार्गदर्शित होते हैं और न ही ईश्वरीय दंड उन्हें निश्चेतना की निंद्रा से जगाता है।
    ईश्वर की ओर से दिए जाने वाले सांसारिक दंड, एक प्रकार से प्रशिक्षण के लिए चेतावनी हैं ताकि मनुष्य जाग जाए, और यदि इसका प्रभाव नहीं होता तो फिर प्रलय का दंड भुगतना पड़ता है।

    आइये अब सूरए मोमिनून की 78वीं, 79वीं और 80वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَهُوَ الَّذِي أَنْشَأَ لَكُمُ السَّمْعَ وَالْأَبْصَارَ وَالْأَفْئِدَةَ قَلِيلًا مَا تَشْكُرُونَ (78) وَهُوَ الَّذِي ذَرَأَكُمْ فِي الْأَرْضِ وَإِلَيْهِ تُحْشَرُونَ (79) وَهُوَ الَّذِي يُحْيِي وَيُمِيتُ وَلَهُ اخْتِلَافُ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ أَفَلَا تَعْقِلُونَ (80)
    और वही है जिसने तुम्हारे लिए कान, आँखें और दिल बनाए (किंतु) तुम लोग बहुत कम कृतज्ञता प्रकट करते हो। (23:78) और वही है जिसने तुम्हें धरती में फैलाया और उसी के पास तुम एकत्रित किए जाओगे। (23:79) औरवही है जो जीवन प्रदान करता और मृत्यु देता है और रात व दिन की आवाजाही उसी के अधिकार में है। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते? (23:80)

    ये आयतें ईश्वर की विभिन्न अनुकंपाओं का उल्लेख करके मनुष्य के भीतर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता की भावना को उभारती हैं। ये ऐसी अनुकंपाओं हैं जो स्वयं मनुष्य के अस्तित्व में भी और उसके आस-पास भी मौजूद हैं और जिनका इन्कार नहीं किया जा सकता। मनुष्य के शरीर के अंगों में पहचानने और समझने के साधनों अर्थात आंखों, कानों और हृदय को विशेष स्थान प्राप्त है। अतः पहली आयत में उनकी ओर संकेत किया गया है और बाद की आयतों में धरती में मनुष्य की सृष्टि, इस संसार में हज़ारों रात और दिन के अवसरों से लाभ उठाने की संभावना तथा मृत्यु के आने के बाद आयु की समाप्ति की ओर संकेत किया गया है। आयतें कहती हैं कि सभी मनुष्यों की वापसी सृष्टि के रचयिता ईश्वर ही की ओर है।

    उल्लेखनीय है कि इन आयतों में ज़बान की अनुकंपा की ओर संकेत नहीं किया गया है जबकि वह ईश्वर की बड़ी अनुकंपाओं में से एक है। शायद इसका कारण यह हो कि यदि मनुष्य श्रवण शक्ति से वंचित हो और बधिर के रूप में संसार में जन्म ले तो चूंकि वह कुछ सुन नहीं सकता इस लिए वह बोल नहीं पाता। यही कारण है कि जन्मजात बधिर लोग, गूंगे भी होते हैं जबकि शारीरिक रूप से उनकी ज़बान पूर्ण रूप से स्वस्थ और त्रुटिहीन होती है।

    बड़े खेद की बात यह है कि इतनी अधिक ईश्वरीय अनुकंपाओं के बावजूद अधिकांश लोग, ईश्वर के प्रति कृतज्ञ नहीं होते और केवल कुछ ही लोग इन अनुकंपाओं पर कृतज्ञता प्रकट करते हैं। वास्तविक कृतज्ञता, केवल ज़बान से ईश्वर का आभार प्रकट करना नहीं बल्कि अनुकंपाओं का सही प्रयोग है। यही कारण है कि इन आयतों के अंत में कड़े स्वर में कहा गया है कि क्या हमने मनुष्य को पहचान के साधन प्रदान नहीं किए हैं? तो फिर वह सृष्टि की वास्तविकताओं को समझने के लिए उनसे लाभ क्यों नहीं उठाता और अपने अस्तित्व तथा संसार के बारे में चिंतन क्यों नहीं करता?

    इन आयतों से हमने सीखा कि आंख और कान मनुष्यों के साथ पशुओं में भी होते हैं और लौकिक वस्तुओं के लिए प्रयोग होते हैं किंतु बुद्धि केवल मनुष्यों में होती है अतः वह लौकिक वस्तुओं के साथ ही अलौकिक वस्तुओं को भी समझ सकता है।
    मृत्यु, मुनष्य के जीवन का अंत नहीं है बल्कि वह एक उच्च लोक की ओर खुलने वाली खिड़की है और उसी लोक में मनुष्य की सृष्टि का वास्तविक उद्देश्य, व्यवहारिक होगा।

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