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    सूरए मोमिनून, आयतें 81-90, (कार्यक्रम 620)

    सूरए मोमिनून, आयतें 81-90, (कार्यक्रम 620)
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    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-601
    आइये पहले सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 81, 82 और 83 की तिलावत सुनें।

    بَلْ قَالُوا مِثْلَ مَا قَالَ الْأَوَّلُونَ (81) قَالُوا أَئِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَامًا أَئِنَّا لَمَبْعُوثُونَ (82) لَقَدْ وُعِدْنَا نَحْنُ وَآَبَاؤُنَا هَذَا مِنْ قَبْلُ إِنْ هَذَا إِلَّا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ (83)
    (काफ़िर सोचते) नहीं, बल्कि उन्होंने वही कहा जो उनसे पहले वाले कहते थे। (23:81) उन्होंने कहा कि क्या जब हम मर कर मिट्टी और हड्डी हो जाएँगे तो हमें पुनः (जीवित करके) उठाया जाएगा? (23:82) निःसंदेह हमसे और इससे पहले हमारे बाप-दादा से भी यही वादा किया जाता रहा है किंतु यह पिछलों की कहानियोँ के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
    (23:83)

    इससे पहले वाली आयतों में प्रलय में ईश्वर की ओर मनुष्यों की वापसी की ओर संकेत किया गया था। ये आयतें प्रलय में ईमान वालों की आस्थाओं के मुक़ाबले में काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों की प्रतिक्रिया का उल्लेख करती हैं। वे मृत्यु के बाद के लोक को अंधविश्वास और पुरानी कहानियां बताते हैं। पहले के पैग़म्बर भी परलोक के बारे में लोगों को सचेत करते थे किंतु अधिकांश लोग उनकी बातों को स्वीकार नहीं करते थे। काफ़िर, प्रलय को रद्द करने के लिए कोई तर्क प्रस्तुत नहीं करते बल्कि यह प्रश्न करते हैं कि किस प्रकार मृत्यु के पश्चात मानव शरीर के गल चुके अंग पुनः एकत्रित होंगे और मनुष्य फिर से जीवित हो उठेंगे?

    स्वाभाविक है कि यदि प्रलय और परलोक में मनुष्यों के पुनः जीवित होने के विषय को मनुष्य की शक्ति व उसके ज्ञान की कसौटी पर परखा जाए तो यह कार्य असंभव है किंतु ईश्वर के लिए, जो मनुष्य का रचयिता और उसके अस्तित्व की हर वस्तु से अवगत है, यह कार्य अत्यंत सरल है। यही कारण है कि पिछली आयतों के अंत में सभी को सृष्टि के बारे में चिंतन का निमंत्रण दिया गया था ताकि वे ईश्वर के ज्ञान और उसकी शक्ति पर अधिक ध्यान दें किंतु खेद की बात है कि बहुत सारे लोग, सृष्टि को समझने के लिए बुद्धि का सहारा नहीं लेते और अपने पूर्वजों का अंधा अनुसरण करते हैं और उन्हीं की बातों को दोहराया करते हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि काफ़िरों के पास प्रलय के इन्कार के लिए कोई तर्क नहीं होता वे पैग़म्बरों के तर्क के बारे में विचार व चिंतन के लिए भी तैयार नहीं होते।
    पैग़म्बरों के विरोधियों का एक आरोप, उनकी बातों को कहानी बताना है ताकि लोगों को उनकी ओर से विमुख कर सकें।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 84 से 87 की तिलावत सुनें।

    قُلْ لِمَنِ الْأَرْضُ وَمَنْ فِيهَا إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ (84) سَيَقُولُونَ لِلَّهِ قُلْ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ (85) قُلْ مَنْ رَبُّ السَّمَاوَاتِ السَّبْعِ وَرَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ (86) سَيَقُولُونَ لِلَّهِ قُلْ أَفَلَا تَتَّقُونَ (87)
    (हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि यदि तुम जानते हो तो बताओ कि यह धरती और जो भी इसमें है वह किसका है? (23:84) वे शीघ्र ही कह देंगे कि ईश्वर का! (तो पुनः) कह दीजिए कि फिर तुम्हें सूझ क्यों नहीं आती? (23:85) (फिर) कह दीजिए कि सातों आकाशों का पालनहार और महान अर्श का पालनहार कौन है? (23:86) वे शीघ्र ही कहेंगे, (वे भी) ईश्वर के ही हैं। कह दीजिए कि तो तुम (ईश्वर) का भय क्यों नहीं रखते? (23:87)

    ये आयतें ईश्वर का इन्कार करने वालों से कुछ प्रश्न पूछ कर उनकी बुद्धि और अंतरात्मा को फ़ैसला करने का निमंत्रण देती हैं। आयतें पूछती हैं कि किसने इतने ऊंचे आकाशों की रचना की है और कौन इस अनंत ब्रह्मांड का शासन चला रहा है? इन प्रश्नों के संबंध में अनेकेश्वरवादियों का उत्तर ईश्वर के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। यदि ऐसा है तो फिर वे क्यों ईश्वर की शक्ति में संदेह करते हैं और परलोक में मनुष्य के पुनः जीवित होने को असंभव समझते हैं? वास्तव में प्रलय का इन्कार करने वालों की समस्या, ईश्वर की पहचान से संबंधित होने से पूर्व उनकी आंतरिक इच्छाओं से संबंधित है। वे इस बात के इच्छुक हैं कि सामाजिक मामलों में पूरी निरंकुशता के साथ अपनी वासनाओं और आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति करें और यह बात प्रलय पर आस्था से विरोधाभास रखती है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि काफ़िरों और ईश्वर का इन्कार करने वालों से बहस में उन विषयों से अपनी बात को सिद्ध करने के लिए लाभ उठाना चाहिए जिन्हें वे स्वीकार करते हैं।
    सृष्टि की महानता और सृष्टि के रचयिता ईश्वर की पहचान का, मनुष्य के विचार और व्यहार पर प्रभाव पड़ना चाहिए और उसे ईश्वर से डरना चाहिए अन्यथा इसका कोई लाभ नहीं है।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 88, 89 और 90 की तिलावत सुनें।

    قُلْ مَنْ بِيَدِهِ مَلَكُوتُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ يُجِيرُ وَلَا يُجَارُ عَلَيْهِ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ (88) سَيَقُولُونَ لِلَّهِ قُلْ فَأَنَّى تُسْحَرُونَ (89) بَلْ أَتَيْنَاهُمْ بِالْحَقِّ وَإِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ (90)
    (हे पैग़म्बर उनसे पुनः) कह दीजिए कि यदि तुम जानते हो तो बताओ कि हर वस्तु का शासन किसके हाथ में है और जो सभी को शरण देता है और जिसकेमुक़ाबले में कोई शरण नहीं मिल सकती? (23:88) वे कहेंगे, ईश्वर के लिए। कह दीजिए कि फिर किस प्रकार तुम पर जादू चल जाता है (और तुम धोखा खा जाते हो)? (23:89) हां, हम उनके पास सत्य लेकर आए और निश्चय ही वे झूठे हैं। (23:90)

    ये आयतें, पिछली आयतों का क्रम जारी रखते हुए सृष्टि पर ईश्वर के संपूर्ण शासन और उसके मार्गदर्शन व समर्थन के प्रति सभी जीवों की आवश्यकता की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि हर स्वस्थ बुद्धि व अंतरात्मा इस बात को स्वीकार करती है कि सृष्टि की व्यवस्था का संचालन किसी एक अस्तित्व की युक्ति से होता है और उसकी इच्छा के बिना संसार में कोई काम नहीं होता। सभी जीव उसी की शरण में हैं जबकि वह किसी से शरण नहीं चाहता और कोई भी किसी को भी उसके कोप के मुक़ाबले में शरण नहीं दे सकता।

    चूंकि जादू-टोना, वास्तविकता को उलट कर दिखाने के लिए प्रयोग किया जाता है इस लिए क़ुरआन मजीद विरोधियों को संबोधित करते हुए कहता है कि क्या तुम पर जादू कर दिया गया है कि तुम सत्य को असत्य और असत्य को सत्य समझ रहे हो। यदि तुम इस बात को मानते हो कि यह संसार, ईश्वर के अधीन है तो फिर उसके बारे में इतना अधिक संदेह क्यों करते हो और सत्य को क्यों स्वीकार नहीं करते? हमने तो तुम्हें सत्य बता दिया है तो फिर तुम किस प्रकार इसके बावजूद उसका इन्कार करते हो?

    इन आयतों से हमने सीखा कि हमें केवल ईश्वर से शरण मांगनी चाहिए क्योंकि संसार में उसके अतिरिक्त कोई शरण नहीं है।
    जो कुछ ईश्वर की ओर से आया है वह सत्य है किंतु भौतिकता में डूब जाने के कारण, मनुष्य सत्य को असत्य समझता है और उसे स्वीकार नहीं करता।

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