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    सूरए मोमिनून, आयतें 91-98, (कार्यक्रम 621)

    सूरए मोमिनून, आयतें 91-98, (कार्यक्रम 621)
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    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-602 (हसन अब्बास)
    प्रिय श्रोताओ कार्यक्रम क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार की एक अन्य कड़ी लेकर आपकी सेवा में उपस्थित हैं, आशा है, पसंद करेंगे। आइये पहले सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 91 और 92 की तिलावत सुनें।

    مَا اتَّخَذَ اللَّهُ مِنْ وَلَدٍ وَمَا كَانَ مَعَهُ مِنْ إِلَهٍ إِذًا لَذَهَبَ كُلُّ إِلَهٍ بِمَا خَلَقَ وَلَعَلَا بَعْضُهُمْ عَلَى بَعْضٍ سُبْحَانَ اللَّهِ عَمَّا يَصِفُونَ (91) عَالِمِ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَتَعَالَى عَمَّا يُشْرِكُونَ (92)
    ईश्वरने अपना कोई बेटा नहीं बनाया और न ही उसके साथ कोई अन्य पूज्य है। यदि ऐसाहोता तो प्रत्येक पूज्य अपनी सृष्टि को लेकर अलग हो जाता और उनमें से प्रत्येक, दूसरे पर श्रेष्ठता जताता। पवित्र है ईश्वर उन बातों से जो वेबयान करते हैं। (23:91) वह छिपी और खुली बातों का ज्ञानी है। तो जो वे किसी को उसका समकक्ष ठहराते हैं, वह उससे कहीं उच्च है। (23:92)

    इससे पहले वाली आयतों में सृष्टि पर ईश्वर के एकछत्र स्वामित्व की बात कही गई थी। ये आयतें ईश्वर के बारे में कुछ अन्धविश्वासों की ओर संकेत करते हुए इन ग़लत आस्थाओं को रद्द करती हैं। पिछले धर्मों के अनुयाइयों में ईश्वर के लिए संतान होने की आस्था पाई जाती थी। ईसाई हज़रत ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र समझते हैं जबकि इतिहास में भी विभिन्न जातियों के बीच यह आस्था प्रचलित रही है कि कई ईश्वर हैं और उनमें से प्रत्येक सृष्टि के किसी मामले का संचालन करता है।

    ये आयतें इसके उत्तर में कहती हैं कि धरती, आकाश और संसार की सभी वस्तुओं पर एक ही व्यवस्था का राज है जिससे पता चलता है कि सृष्टि में जो क़ानून प्रचलित हैं उनकी युक्ति एक ही अस्तित्व की ओर से हुई है। यदि इस संसार के लिए कई ईश्वर होने की बात मान ली जाए तो स्वाभाविक रूप से सृष्टि के मामलों के संचालन में अंतर और विविधता पैदा हो जाएगी जिससे सभी मामले बिगड़ जाएंगे। इसके अतिरिक्त संभव है कि हर क्षण इनमें से कोई ईश्वर किसी भी कारण से दूसरे ईश्वरों के मामले में हस्तक्षेप करे और अपने अंतर्गत क्षेत्र के विस्तार का प्रयास करे।

    यहां तक कि यदि हम उन्हें ज्ञानी व तत्वदर्शी ईश्वर भी मान लें तब भी उनके अनेक होने का अर्थ ही यह है कि उनके बीच अंतर होगा क्योंकि यदि वे हर दृष्टि और हर आयाम से एक हों तो अनेक नहीं होंगे। स्वाभाविक है कि जहां कहीं भी अंतर हो, चाहे अनचाहे में ही वह इच्छा व व्यवहार पर प्रभाव डालेगा और संपूर्ण सृष्टि में अराजकता का कारण बन जाएगा।
    इन आयतों से हमने सीखा कि संतान या समकक्ष का होना, आवश्यकता व सीमितता का चिन्ह है जबकि ईश्वर आवश्यकता मुक्त है और उसके अस्तित्व के संबंध में किसी भी प्रकार की सीमा की कल्पना नहीं की जा सकता।

    ईश्वर को हर प्रकार की ग़लत आस्था व विचार से पवित्र समझना, क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं में से है।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 93, 94 और 95 की तिलावत सुनें।

    قُلْ رَبِّ إِمَّا تُرِيَنِّي مَا يُوعَدُونَ (93) رَبِّ فَلَا تَجْعَلْنِي فِي الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ (94) وَإِنَّا عَلَى أَنْ نُرِيَكَ مَا نَعِدُهُمْ لَقَادِرُونَ (95)
    (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि हे मेरे पालनहार! जिस (दंड) का वादा उनसे किया जा रहा है वह यदि तू मुझे दिखाए। (23:93) तो हे मेरे पालनहार! मुझे उन अत्याचारी लोगों में सम्मिलित न करना। (23:94) और (हे पैग़म्बर!) निश्चय ही हम इसमें सक्षम हैं कि उनसे जो वादा कर रहे हैं उसे आपको दिखा दें। (23:95)

    अनेकेश्वरवादियों के ग़लत विचारों को नकारने के पश्चात इन आयतों में उन्हें मिलने वाले कड़े दंड की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि पैग़म्बर भी इस बात से ईश्वर की शरण चाहते हैं कि अनेकेश्वरवादियों का साथ दें क्योंकि वे जानते हैं कि संसार में कोई भी ईश्वरीय कोप व दंड का मुक़ाबला करने की शक्ति नहीं रखता और प्रलय में तो ईश्वर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेगा ही।

    बद्र नामक युद्ध में मुसलमानों के हाथों अनेकेश्वरवादियों की पराजय, इसी ईश्वरीय कोप का एक उदाहरण था कि जब एक छोटे से किंतु ईमान वाले गुट ने एक बड़े किंतु ईमान रहित गुट को इस प्रकार पराजित कर दिया था कि वह इतिहास में एक पाठ बन कर रह गया।
    अलबत्ता ईश्वर की परंपरा, काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों को मोहलत देने की है ताकि एक ओर उनके पास कोई तर्क न रह जाए और दूसरी ओर उनके लिए तौबा व वापसी का मार्ग भी खुला रहे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि अत्याचारियों के बीच उपस्थिति और उनका साथ देने से, अत्याचार के परिणामों में ग्रस्त होने का ख़तरा रहता है।
    अत्याचारियों को मिलने वाले दंड को अपनी आंखों से न देख पाने के कारण हमें ईश्वर की शक्ति में संदेह नहीं करना चाहिए।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 96, 97 और 98 की तिलावत सुनें।

    ادْفَعْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ السَّيِّئَةَ نَحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَصِفُونَ (96) وَقُلْ رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ (97) وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَنْ يَحْضُرُونِ (98)
    (हे पैग़म्बर!) उनकी बुराई का सबसे अच्छे ढंग से उत्तर दीजिए (कि शायद वे सही मार्ग पर आ जाएं)। (आपके बारे में वे लोग) जो कुछ कहते हैं हम उससे भली भाँति अवगत हैं। (23:96) और कह दीजिए कि हे मेरे पालनहार! मैं शैतानों के उकसावों से तेरी शरण चाहता हूँ। (23:97) और हे मेरे पालनहार! मैं इससे भी तेरी शरण चाहता हूँ कि वे अर्थात शैतान मेरे पास आएँ। (23:98)

    ये आयतें अनेकेश्वरवादियों और काफ़िरों के व्यवहार के बारे में पैग़म्बर से कहती हैं कि वे अपनी ज़बान से आपके बारे में अनुचित बातें कहते हैं और आपको कवि, ज्योतिषी या उन्मादी बताते हैं। इसी प्रकार वे व्यवहारिक रूप से भी आपको यातनाएं देते हैं तथा आपके कार्यों में रुकवाटें डालते हैं किंतु आप उनके साथ संयम का व्यवहार करें और उन्हें बुरा-भला कहने या उनके साथ दुर्व्यवहार करने के स्थान पर अच्छी बातों एवं भले व्यवहार के माध्यम से उनके सही मार्ग पर आने की भूमि समतल करें।

    आयत पैग़म्बर से कहती है कि आप उनकी बुराइयों की अनदेखी कीजिए, उनकी ग़लत व तर्कहीन बातों के मुक़ाबले में तर्कसंग व स्पष्ट बातें प्रस्तुत कीजिए, उनके तुरंत ईमान लाने की आशा न रखिए क्योंकि ईश्वर हर बात से अवगत है और उनके कार्यों की बुराई तथा आपके धैर्य व संयम को देख रहा है। शैतानी उकसावों की ओर से सचेत रहिए और उनके साथ उनके जैसा व्यवहार न कीजिए। अल्बत्ता जब तक वे ईमान नहीं ले आते तब तक उन्हें न तो अपने साथ रखिए और न ही उन्हें कोई पद व स्थान प्रदान कीजिए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि विरोधियों को निमंत्रण देने की सर्वोत्तम शैली, उनकी ग़लत बातों और बुरे व्यवहार के मुक़ाबले में तर्कसंगत बात और अच्छा आचरण है।
    जब हर प्रकार की बुराई से सुरक्षित ईश्वरीय पैग़म्बर, शैतान के उकसावों से ईश्वर की शरण चाहते हैं तो हम जैसे साधारण व पापी लोगों को क्या करना चाहिए यह अत्यंत स्पष्ट है।

     

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