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    सूरए यूनुस, आयतें 1-4, (कार्यक्रम 325)

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    पिछले कार्यक्रम सूरए तौबा की आयतों की व्याख्या समाप्त हुई। अब हम क़ुरआने मजीद के दसवें सूरे अर्थात सूरए यूनुस की आयतों की व्याख्या करेंगे। यह सूरा मक्का नगर में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम पर उतरा है। हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम बनी इस्राईल के एक पैग़म्बर हैं जो हज़रत मूसा और हज़रत नूह अलैहमुस्सलाम के पश्चात आए थे। ये सूरा उन्हीं के नाम पर है। तो आइये पहले इस सूरए की पहली और दूसरी आयतों की तिलावत सुनते हैं।بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ الر تِلْكَ آَيَاتُ الْكِتَابِ الْحَكِيمِ (1) أَكَانَ لِلنَّاسِ عَجَبًا أَنْ أَوْحَيْنَا إِلَى رَجُلٍ مِنْهُمْ أَنْ أَنْذِرِ النَّاسَ وَبَشِّرِ الَّذِينَ آَمَنُوا أَنَّ لَهُمْ قَدَمَ صِدْقٍ عِنْدَ رَبِّهِمْ قَالَ الْكَافِرُونَ إِنَّ هَذَا لَسَاحِرٌ مُبِينٌ (2)ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील व दयावान है। अलिफ़, लाम, रा, ये तत्वदर्शी पुस्तक की आयतें हैं। (10:1) क्या लोगों के लिए यह अचरज की बात है कि हमने उन्हीं लोगों में से एक पुरुष की ओर अपना विशेष संदेश वहि भेजा कि लोगों को (ईश्वीय दंड से) डराओ और ईमान वालों को शुभ सूचना दे दो कि उनके पालनहार के निकट उनके लिए उत्तम स्थान है। काफ़िरों ने कहा कि ये तो खुला हुआ जादूगर है। (10:2)जैसा कि हमने सूरए बक़रा के आरंभ में कहा था, क़ुरआने मजीद के 114 सूरों में से 29 सूरों का आरंभ हुरूफ़े मुक़त्तेआत या ऐसे अक्षरों से हुआ है जो ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर के बीच का रहस्य हैं और इनकी कोई निश्चित व्याख्या नहीं की जा सकती किन्तु चूंकि इन अक्षरों के पश्चात सदैव ही क़ुरआन की महानता की बात की गई है अतः कुछ व्याख्याकार इन अक्षरों को क़ुरआन के विरोधियों के मुक़ाबले में ईश्वर का तर्क मानते हैं, इन अर्थों में कि ईश्वर ने इन्हीं साधारण अक्षरों के साथ क़ुरआने मजीद को उतारा है और यदि तुम में भी क्षमता हो तो ऐसी ही पुस्तक ले आओ।क़ुरआने मजीद की एक विशेषता, ईश्वर ने यह बताई है कि वो तत्वदर्शी है क्योंकि इस पुस्तक में ऐसे आदेश वर्णित हैं जिनका आधार अत्यंत सुदृढ़ है और इसकी बातें तत्वदर्शिता पर आधारित हैं।क़ुरआने मजीद की महान स्थिति और स्थान का वर्णन करने के पश्चात ईश्वर, दूसरी आयत में अपने पैग़म्बर के स्थान की ओर संकेत करते हुए कहता है कि लोगों को अपेक्षा थी कि ईश्वर उनके मार्गदर्शन के लिए फ़रिशतों को भेजेगा। स्वभाविक है कि पैग़म्बरों को लोगों के सामने ही होना चाहिए ताकि उनका चरित्र लोगों के लिए आदर्श बन सके। इसके अतिरिक्त पैग़म्बर अपने लिए कुछ नहीं चाहते क्योंकि इस स्थिति में लोग उनसे दूर भागने लगेंगे। पैग़म्बरों का काम भले कर्म करने वालों को शुभ सूचना देना और बुरे कर्म करने वालो को सावधान करना है किन्तु उनके चमत्कारों के कारण कुछ लोग उन्हें जादूगर कहते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद एक ठोस और अनंतकालीन पुस्तक है और समय बीतने से इसके मूल्य और स्थान में कोई कमी नहीं होती।पैग़म्बर का लक्ष्य मनुष्यों को सम्मान प्रदान करना तथा उनकी प्रतिष्ठा में वृद्धि करना है।आइये अब सूरए यूनुस की तीसरी आयत की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ رَبَّكُمُ اللَّهُ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ يُدَبِّرُ الْأَمْرَ مَا مِنْ شَفِيعٍ إِلَّا مِنْ بَعْدِ إِذْنِهِ ذَلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ فَاعْبُدُوهُ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ (3)निश्चित रूप से तुम्हारा पालनहार वही ईश्वर है जिसने छह दिनों में आकाशों और धरती की सृष्टि की फिर उसने अर्श अर्थात आकाशों के सिंहासन पर अपना शासन स्थापित किया। वही ब्रह्मांण के समस्त कार्यों की युक्ति करता है, उसके अतिरिक्त कोई सिफ़ारिश करने वाला नहीं है, सिवाय इसके कि वही इसकी आज्ञा दे। वही ईश्वर तुम्हारा पालनहार है अतः उसी की उपासना करो। क्या तुम्हें होश नहीं आता? (10:3)ईश्वर की एक परंपरा सृष्टि की क्रमशः रचना है, इसी कारण ईश्वर ने जो एक क्षण में समस्त सृष्टि की रचना करने में सक्षम है, आकाशों और धरती की छह विभिन्न चरणों में रचना की। प्रकृति की समस्त वस्तुओं की प्रगति भी आरंभ से लेकर परिपूर्णता तक, क्रमशः होती है। मां के पेट में बच्चा व महीनों तक धीरे धीरे अपनी प्रगति के चरण पूरे करता है और फिर इस संसार में आने के लिए तैयार होता है जबकि ईश्वर इन सभी चरणों को एक क्षण में ही पूरा कर देने में सक्षम है।चूंकि अनेकेश्वरवादी ईश्वर को सृष्टिकर्ता तो मानते हैं किन्तु इस संसार को चलाने में उसके लिए समकक्ष ठहराते हैं, अतः आगे चलकर आयत कहती है कि सृष्टि का संचालन ईश्वर के हाथ में है और सारे काम उसके ही आदेश से होते हैं और कोई भी वस्तु संसार के संचालन में माध्यम नहीं बन सकती सिवाय इसके कि ईश्वर इसकी अनुमति दे जैसा कि ईश्वर की इच्छा और आदेश से फ़रिशते विभिन्न कामों का संचालन करते हैं या ईश्वर के प्रिय बंदों को उसके आदेश से सृष्टि में हस्तक्षेप की अनुमति होती है।इस आयत से हमने सीखा कि संसार की रचना पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अंतर्गत हुई है ये कोई संयोग नहीं है।सृष्टि का एक निश्चित लक्ष्य और क़ानून है क्योंकि इसका रचयिता और संचालक एक व अनन्य है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या चार की तिलावत सुनते हैं।إِلَيْهِ مَرْجِعُكُمْ جَمِيعًا وَعْدَ اللَّهِ حَقًّا إِنَّهُ يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ لِيَجْزِيَ الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ بِالْقِسْطِ وَالَّذِينَ كَفَرُوا لَهُمْ شَرَابٌ مِنْ حَمِيمٍ وَعَذَابٌ أَلِيمٌ بِمَا كَانُوا يَكْفُرُونَ (4)उसकी ओर तुम सबकी वापसी है, ये ईश्वर का पक्का वादा है। वही सृष्टि का आरंभ करता है और फिर उसे लौटाता है ताकि ईमान लाने और भलेकर्म करने वालों को न्यायपूर्ण बदला दे और जिन लोगों ने उसका इन्कार किया है उनके लिए जलाने वाला गर्म पेय और उनके कुफ़्र के कारण अत्यंत पीड़ादायक दंड है। (10:4)पिछली आयत में आकाशों और धरती की रचना में ईश्वर की शक्ति व क्षमता की ओर संकेत किया गया था। ये आयत प्रलय में सृष्टि की पुनः रचना की ओर संकेत करती है और हर प्रकार के संदेह को समाप्त करने हेतु कहती है। ये ईश्वर का पक्का वादा है कि वो भले कर्म करने वालों को पारितोषिक और काफ़िरों को दंड देगा, अलबत्ता पूर्णतः न्याय के आधार पर कि जो ईश्वर की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है।स्वभाविक है कि ईश्वर का इन्कार या कुफ़्र, मनुष्य के समक्ष हर प्रकार की बुराई व पाप का द्वार खोल देता है और वो दिन प्रतिदिन बुराई की दलदल में फंसता जाता है। ये कार्य प्रलय में जलाने वाले खाद्य व पेय पदार्थों के रूप में सामने आएगा।इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय में ईश्वर का पूर्ण न्याय सामने आएगा क्योंकि संसार में कर्मों के पूर्ण पारितोषिक या दंड की क्षमता नहीं है।जिस प्रकार से कि संसार में संपूर्ण सृष्टि की रचना मनुष्य के लिए की गई है उसी प्रकार प्रलय में भी सृष्टि की पुनः रचना मनुष्यों को पारितोषिक देने या दंडित करने के लिए होगी।