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    सूरए यूनुस, आयतें 101-106, (कार्यक्रम 344)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 101 की तिलावत सुनते हैं।قُلِ انْظُرُوا مَاذَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا تُغْنِي الْآَيَاتُ وَالنُّذُرُ عَنْ قَوْمٍ لَا يُؤْمِنُونَ (101)(हे पैग़म्बर उनसे) कह दीजिए कि जो कुछ आकाशों और धरती में है उसे (ध्यान से) देखो किन्तु यह निशानियां और डरावा ईमान न लाने वाली जाति के लिए लाभदायक नहीं है। (10:101)पिछली आयतों में कहा गया है कि कुफ़्र या ईश्वर के इन्कार का कारण, ईश्वरीय निशानियों के बारे में चिंतन न करना है। यह आयत सही सोच विचार, चिंतन तथा गहरी दृष्टि को सही व गहरे ईमान की भूमिका बताती है। दूसरी ओर पिछली आयतों के आधार पर ईमान विवशतापूर्वक नहीं बल्कि अपने चयन और इच्छा के साथ होना चाहिए, इसी कारण यह आयत सोच विचार तथा चिंतन पर आग्रह करती है ताकि हर व्यक्ति अपनी समझ के माध्यम से ईमान के मार्ग को स्वीकार करे और उस पर कटिबद्ध रहे।स्पष्ट है कि आकाशों और धरती तथा सृष्टि के अनेक आश्चर्यों के बारे में अध्ययन, मनुष्य को अनन्य ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होने के लिए विवश कर देता है। अलबत्ता कुछ लोग ईश्वर की महानता की इतनी अधिक निशानियां देखने के बाद भी ईमान लाने के लिए तैयार नहीं होते और उन्हें संदेह की दृष्टि से देखते हैं या फिर उनका पूर्ण रूप से इन्कार ही कर देते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि सृष्टि के बारे में अध्ययन और चिंतन, ईश्वर को पहचानने का सबसे साधारण मार्ग है।केवल निशानियों को देखना और सत्य की बातें सुनना पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें स्वीकार करने के लिए मनुष्य का संकल्प एवं निर्णय भी आवश्यक है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 102 की तिलावत सुनते हैं।فَهَلْ يَنْتَظِرُونَ إِلَّا مِثْلَ أَيَّامِ الَّذِينَ خَلَوْا مِنْ قَبْلِهِمْ قُلْ فَانْتَظِرُوا إِنِّي مَعَكُمْ مِنَ الْمُنْتَظِرِينَ (102)(ईश्वरीय आयतों के प्रति उद्दंडता से काम लेने वालों को) क्या अपने पूर्वजों के बुरे अंत के अतिरिक्त किसी और बात की प्रतीक्षा है? (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि प्रतीक्षा करो कि मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करने वालों में हूं। (10:102)पिछली आयतों में ईश्वर ने अपना इन्कार करने वालों को धरती और आकाशों में ईश्वरीय निशानियों के बारे में चिंतन मनन का निमंत्रण दिया था, इन आयतों में वह कहता है कि जो लोग ईश्वरीय आयतों के बारे में सोच विचार करने के लिए तैयार नहीं होते उन्हें अत्यंत कड़े और पीड़ादायक अंत की प्रतीक्षा में रहना चाहिए क्योंकि ईश्वर की परंपरा यह है कि मानव समाजों का भविष्य बहुसंख्यकों के भविष्य पर निर्भर होता है, इस अर्थ में कि यदि एक समाज के अधिकांश लोग भले होते हैं तो वह समाज सुधार और भलाई की ओर अग्रसर होता है, चाहे उसमें बुरे लोग भी क्यों न हों, इसी प्रकार यदि किसी समाज के अधिकांश लोग भ्रष्ट हों, तो वह समाज भी बुराई और भ्रष्टता की ओर बढ़ने लगता है, चाहे उसमें भले लोग भी क्यों न हों।पिछले समाजों जैसे हज़रत नूह, लूत, और हूद अलैहिस्सलाम की जातियों का इतिहास ईश्वर की इस स्थाई परंपरा को दर्शाता है, इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को ईश्वर की ओर से यह आदेश मिलता है कि वे मक्के के अनेकेश्वरवादियों से कहें कि यदि उन्होंने भी ईश्वरीय मार्गदर्शन के समक्ष हठधर्मी दिखाई तो उनका भी वही परिणाम होगा जो पिछली जातियों का हुआ था।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय परंपरा स्थाई व अनंतकालीन है तथा सभी मनुष्य इसमें शामिल हैं।पिछले लोगों का इतिहास, आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा सामग्री है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 103 की तिलावत सुनते हैं।ثُمَّ نُنَجِّي رُسُلَنَا وَالَّذِينَ آَمَنُوا كَذَلِكَ حَقًّا عَلَيْنَا نُنْجِ الْمُؤْمِنِينَ (103)फिर (दंड आने के समय) हम अपने पैग़म्बरों और ईमान वालों को मुक्ति दे देते हैं क्योंकि ईमान वालों को मुक्ति दिलाना हमारे लिए आवश्यक है। (10:103)पिछली आयत में इस बात का उल्लेख करने के पश्चात कि अनेकेश्वरवादियों को इसी संसार में ईश्वरीय दंड का सामना करना पड़ता है, यह आयत कहती है कि अलबत्ता ईश्वर का न्याय इस बात की अनुमति नहीं देता कि भले और बुरे तथा पापी और निर्दोष दोनों को एक समान दंडित किया जाए बल्कि दंड की पात्र हर जाति के लोगों में से केवल पापी और पापों के प्रति लापरवाह रहने वाले लोगों को ही दंडित किया जाता है और उस जाति के ईमान वाले लोगों को ईश्वर किसी न किसी मार्ग से बचा लेता है। यह ईश्वर का अटल वचन एवं परंपरा है कि वह ईमान वालों को पापियों की आग में नहीं जलाता।इस आयत से हमने सीखा कि वास्तविक ईमान वाले संसार में भी ईश्वर के कोप व दंड से सुरक्षित रहते हैं चाहे वे किसी भ्रष्ट समाज में ही क्यों न हों।भविष्य वास्तविक ईमान वालों के हाथों में है क्योंकि पापी तबाह होने वाले हैं और ईमान वालों को मुक्ति प्राप्त होगी।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 104 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنْ كُنْتُمْ فِي شَكٍّ مِنْ دِينِي فَلَا أَعْبُدُ الَّذِينَ تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلَكِنْ أَعْبُدُ اللَّهَ الَّذِي يَتَوَفَّاكُمْ وَأُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ (104)(हे पैग़म्बर) कह दीजिए कि हे लोगो यदि तुम्हें मेरे धर्म के बारे में संदेह है तो जान लो कि मैं उन्हें नहीं पूजता जिनकी पूजा तुम ईश्वर के स्थान पर करते हो, बल्कि मैं उस ईश्वर की उपासना करता हूं जिसके हाथ में तुम्हारी मृत्यु है, और मुझे आदेश दिया गया है कि मैं ईमान वालों में से रहूं। (10:104)पिछली आयतों में अनेकेश्वरवादियों और उनके परिणाम के वर्णन के पश्चात इस इस आयत में ईश्वर अपने पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहता है कि यदि वे यह सोचते हैं कि आपको अपने मार्ग और धर्म के संबंध में शंका है और वे आप से सांठ गांठ की आशा रख सकते हैं तो उनसे दृढ़ता पूर्वक कह दीजिए कि मैं कदापि ईश्वर के अतिरिक्त किसी और की उपासना नहीं करता, और जिन्हें तुम पूजते हो, उन्हें मैं ईश्वर ही नहीं मानता। मैं तो उस ईश्वर की उपासना करता हूं जिसके हाथ में मेरी और तुम्हारी मृत्यु है और तुम कदापि उससे नहीं बच सकते और जिनकी तुम पूजा करते हो वे भी तुम्हें मौत से नहीं बचा सकते।इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों का संदेह, चाहे उनकी संख्या कितनी ही क्यों न हो, हमारे मन में संदेह उत्पन्न होने का कारण नहीं बनना चाहिए, बल्कि हमें सत्य के मार्ग पर सदैव ही सुदृढ़ रहना चाहिए।उपासना के योग्य वह है जिसके हाथ में हमारा जीवन व मृत्यु है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 105 और 106 की तिलावत सुनते हैं।وَأَنْ أَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفًا وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُشْرِكِينَ (105) وَلَا تَدْعُ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنْفَعُكَ وَلَا يَضُرُّكَ فَإِنْ فَعَلْتَ فَإِنَّكَ إِذًا مِنَ الظَّالِمِينَ (106)और ऐसे धर्म की ओर उन्मुख हो कि जो हर प्रकार के अनेकेश्वरवाद से रिक्त हो और अनेकेश्वरवादियों में से न हो जाना। (10:105) और ईश्वर के अतिरिक्त ऐसी वस्तुओं को न पुकारो जो न तो तुम्हें कोई लाभ पहुंचा सकती हैं और न ही हानि, और यदि तुम ने ऐसा किया तो तुम अत्याचारियों में से हो जाओगे। (10:106)ईश्वर ने लोगों विशेषकर अनेकेश्वरवादियों को जो संदेश देने का पैग़म्बर को आदेश दिया है, उसके अंतर्गत वे अपनी बात जारी रखते हुए कहते हैं कि पूर्णतः स्पष्ट, सीधे और हर प्रकार की पथभ्रष्टता से रिक्त धर्म की ओर उन्मुख होना और उस पर कटिबद्ध रहना चाहिए, जबकि अनेकेश्वरवाद की ऐसी आस्था नहीं है और उसमें अंधविश्वास और पथभ्रष्टता की अनेक बातें होती हैं और ऐसी वस्तुओं की पूजा की जाती है जो न तो मनुष्य को लाभ पहुंचा सकती हैं और न ही हानि, इसी कारण वे उपासना के योग्य नहीं हैं और जो कोई उनकी छाया में जाएगा वह अपने आप पर भी और ईश्वरीय धर्म पर भी अत्याचार करेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि वह धर्म स्वीकार्य है जो मनुष्य की पारदर्शी और स्वस्थ प्रवृत्ति के अनुकूल और उससे समन्वित हो।बुद्धिमान व्यक्ति या तो लाभ की प्राप्ति के लिए काम करता है या फिर हानि को दूर करने के लिए, और ईश्वर के अतिरिक्त जिन वस्तुओं की उपासना की जाती है वे न तो लाभ पहुंचा सकती हैं और न ही हानि, इस आधार पर अनेकेश्वरवाद एक प्रकार की मूर्खता है।