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    सूरए यूनुस, आयतें 107-109, (कार्यक्रम 345)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 107 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ يَمْسَسْكَ اللَّهُ بِضُرٍّ فَلَا كَاشِفَ لَهُ إِلَّا هُوَ وَإِنْ يُرِدْكَ بِخَيْرٍ فَلَا رَادَّ لِفَضْلِهِ يُصِيبُ بِهِ مَنْ يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَهُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ (107)और यदि ईश्वर (परीक्षा लेने या पाप पर दंडित करने के लिए) तुम्हें कोई हानि पहुंचाए तो उसके अतिरिक्त कोई भी उसे समाप्त नहीं कर सकता और यदि वह तुम्हारे लिए कोई भलाई चाहे तो भी कोई उसकी कृपा में बाधा नहीं डाल सकता, उसे वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, प्रदान करता है और अत्यंत क्षमाशील व दयावान है। (10:107)पिछले कार्यक्रम की अंतिम आयतों में ईश्वर ने अपने पैग़म्बर से कहा था कि वे अनेकेश्वरवादियों के मुक़ाबले में सुदृढ़ रहें और स्पष्ट रूप से एकेश्वरवाद की अपनी आस्था की घोषणा करें तथा उन्हें आकर्षित करने के लिए उनसे सांठ गांठ न करें।यह आयत आगे कहती है कि जान लो कि तुम्हारा सुख दुख, लाभ हानि सब कुछ ईश्वर के हाथ में है और उसके अतिरिक्त कोई भी तुम्हें भलाई नहीं पहुंचा सकता और न ही उसे छीन सकता है, इसी प्रकार उसकी अनुमति के बिना कोई भी किसी को क्षति नहीं पहुंचा सकता और यदि ईश्वर किसी को दंडित करना चाहे तो कोई भी उसमें बाधा नहीं डाल सकता।इस आयत से हमने सीखा कि अनेकेश्वरवादियों और काफ़िरों को जान लेना चाहिए कि ईमान से भागकर वे ईश्वर के इरादे की सीमा से बाहर नहीं निकल सकते और ईश्वर उनके बारे में जो कुछ चाहेगा वह हो कर रहेगा।मनुष्य को जो भी भलाई प्राप्त होती है वह उसके अधिकार के चलते नहीं बल्कि ईश्वर की कृपा के कारण होती है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 108 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ يَا أَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاءَكُمُ الْحَقُّ مِنْ رَبِّكُمْ فَمَنِ اهْتَدَى فَإِنَّمَا يَهْتَدِي لِنَفْسِهِ وَمَنْ ضَلَّ فَإِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيْهَا وَمَا أَنَا عَلَيْكُمْ بِوَكِيلٍ (108)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि हे लोगों! तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम तक सत्य पहुंच चुका है तो जो कोई मार्गदर्शन प्राप्त करेगा वह अपने लाभ के लिए ही मार्गदर्शन प्राप्त करेगा और जो कोई पथभ्रष्ट होगा वह अपने अहित में ही पथभ्रष्ट होगा, और तुम्हारा संरक्षक नहीं हूं (कि तुम्हें ज़बरदस्ती सत्य के मार्ग पर ले आऊं)। (10:108)सूरए यूनुस के अंत में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम सभी लोगों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि मेरा दायित्व ईश्वरीय संदेश को तुम तक पहुंचाना, उसका प्रचार करना तथा उसकी ओर निमंत्रण देना है और उसे स्वीकार करने हेतु तुम्हें विवश करने का मुझे अधिकार नहीं है। तुम में से जो कोई भी चाहे अपने चयन से, उसे स्वीकार करके मार्गदर्शन प्राप्त करे अथवा उसका इन्कार करके पथभ्रष्ट हो जाए।किन्तु यह जान लोग कि तुम्हारे ईमान लाने या कुफ़्र का चयन करने से मुझे या ईश्वर को कोई लाभ नहीं होगा बल्कि इसका लाभ या हानि स्वयं तुम्हारे लिए है क्योंकि ईश्वर को तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं है और मैंने भी अपने दायित्व का पालन कर दिया है और तुम्हारे ईमान लाने या न लाने के संबंध में मेरा कोई दायित्व नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने लोगों के सामने कोई तर्क नहीं छोड़ा और सत्य का मार्ग उन्हें दिखा दिया है, उस मार्ग पर चलना या न चलना लोगों के अपने हाथ में है।धर्मगुरूओं और धर्म के प्रचारकों का दायित्व अपनी बातें मानने और उन पर कर्मबद्ध होने के लिए लोगों को विवश करना नहीं बल्कि उनका मार्ग दर्शन करना और उन्हें उपदेश देना हैआइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 109 की तिलावत सुनते हैं।وَاتَّبِعْ مَا يُوحَى إِلَيْكَ وَاصْبِرْ حَتَّى يَحْكُمَ اللَّهُ وَهُوَ خَيْرُ الْحَاكِمِينَ (109)और (हे पैग़म्बर!) जो कुछ आपके पास ईश्वर के विशेष संदेश वहि द्वारा आता है, उसका अनुसरण करें और उस पर सुदृढ़ रहें यहां तक कि ईश्वर फ़ैसला करे कि वह सबसे उत्तम फ़ैसला करने वाला है। (10:109)इस सूरे की अंतिम आयत एक बार फिर ईश्वरीय मार्ग पर सुदृढ़ रहने और ईश्वरीय संदेश के समक्ष नतमस्तक रहने पर बल देती है और सबसे पहले चरण में पैग़म्बर और उनके पश्चात अन्य ईमान वालों और उनके साथियों को, असत्य पर विजय तक धैर्य, संयम और प्रतिरोध से काम लेने का निमंत्रण देती है।स्वाभाविक है कि असत्य पर चलने वाले और अत्याचारी, सच्चे ईमान वालों के मार्ग में अत्यधिक बाधाएं उत्पन्न करते हैं जिनके समक्ष डटे रहना चाहिए, धैर्य व संयम से काम लेना चाहिए और कठिनाइयों से नहीं घबराना चाहिए। प्रत्येक दशा में ईश्वर सभी को देखता है और वह प्रलय के दिन न्याय के आधार पर उनके बीच निर्णय और फ़ैसला करेगा। इसके अतिरिक्त इसी संसार में भी अत्याचारियों के मुक़ाबले में प्रतिरोध, उनकी पराजय और सत्य की विजय का कारण बनता है।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों को यह अधिकार प्राप्त है कि वे ईमान लाएं या काफ़िर हो जाएं किन्तु उनका कुफ़्र हमारे मन में संदेह उत्पन्न होने का कारण न बने, बल्कि हमें अपने मार्ग पर अधिक दृढ़ता से डटे रहना चाहिए और ईश्वरीय आदेशों का पालन करते रहना चाहिए।हमें अपने दायित्वों का निर्वाह करना चाहिए और भविष्य की चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि भविष्य ईश्वर के हाथ में है और वह सबसे उत्तम निर्णय व फ़ैसला करने वाला है।