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    सूरए यूनुस, आयतें 11-14, (कार्यक्रम 327)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 11 की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ يُعَجِّلُ اللَّهُ لِلنَّاسِ الشَّرَّ اسْتِعْجَالَهُمْ بِالْخَيْرِ لَقُضِيَ إِلَيْهِمْ أَجَلُهُمْ فَنَذَرُ الَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَاءَنَا فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ (11)और यदि ईश्वर (इस संसार में बुरे) लोगों को दंडित करने में जल्दी करता, जैसा कि वे भलाई (और सांसारिक माल) की प्राप्ति के लिए जल्दी करते हैं जो उनकी आयु समाप्त हो चुकी होती, तो प्रलय में हमारी भेंट की आशा न रखने वालों को हम उनकी दशा पर छोड़ देते हैं ताकि वे अपनी उद्दंडता में चकराते रहें। (10:11)लोगों के संबंध में ईश्वर की एक परंपरा उन्हें अवसर देने की है ताकि हर व्यक्ति अपनी इच्छा और अधिकार के साथ अपने मार्ग का चयन करे और उसके अनुसार कर्म करे। अलबत्ता स्वाभाविक है कि बहुत से लोग ईश्वर द्वारा दिए गए इस अवसर से अनुचित लाभ उठाते हैं और उसका प्रयोग पाप करने के लिए करते हैं किन्तु ईश्वर लोगों के संबंध में अपनी दया से काम लेता है और उन्हें अधिक अवसर देता है कि वे अतीत के पापों की क्षतिपूर्ति करते हुए तौबा व प्रायश्चित करें, अतः जो लोग अत्याचार एवं पाप पर आग्रह करते हैं स्वाभाविक रूप से ईश्वर उन्हें उनकी स्थिति पर छोड़ देता है ताकि उनकी आयु अपने अंत को पहुंच जाए और परलोक में उन्हें दुष्कर्मों का दंड मिल सके।इस आयत से हमने सीखा कि इस संसार में काफ़िरों और अत्याचारियों का दंडित न होना उनकी सत्यता या ईश्वर की अक्षमता की निशानी नहीं है बल्कि ईश्वर की ओर से मिलने वाले अवसर को दर्शाता है।जो लोग ईश्वर को छोड़कर अपने आप में व्यस्त रहते हैं वे लक्ष्यहीनता में ग्रस्त हो जाते हैं।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 12 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا مَسَّ الْإِنْسَانَ الضُّرُّ دَعَانَا لِجَنْبِهِ أَوْ قَاعِدًا أَوْ قَائِمًا فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُ ضُرَّهُ مَرَّ كَأَنْ لَمْ يَدْعُنَا إِلَى ضُرٍّ مَسَّهُ كَذَلِكَ زُيِّنَ لِلْمُسْرِفِينَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (12)और जब मनुष्य को कोई क्षति पहुंचती है तो वह उठते, बैठते और करवटें बदलते हमें पुकारता है फिर जब हम उससे क्षति को दूर कर देते हैं वह इस प्रकार गुज़र जाता है जैसे उसने हमें किसी समस्या में पुकारा ही न हो, निश्चित रूप से अपव्यय करने वालों के समक्ष उनके कर्म इसी प्रकार सजा दिए जाते हैं। (10:12)संसार में ऐश्वर्य व आराम इस बात का कारण बनता है कि मनुष्य ईश्वर की ओर से निश्चेत होकर संसार में मायामोह में ग्रस्त हो जाए किन्तु कठिनाइयां एवं समस्याएं मनुष्य को निश्चेतना की निंद्रा से जगा कर उसे यह समझाती हैं कि मनुष्य एक कमज़ोर व अक्षम अस्तित्व है, यही कारण है कि कठिनाइयों के समय वह ईश्वर को पुकारता है, चाहे वह रोग में ग्रस्त होकर बिस्तर पर पड़ा हो, बैठा हुआ हो या समस्या के समाधान के लिए उठ गया हो।और काश ऐसा होता है कि कठिनाई समाप्त होने के पश्चात वह ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहता और कम से कम कुछ दिन तो उसे पुकारता, किन्तु खेद के साथ कहना पड़ता है कि प्रायः लोग इस प्रकार अपनी राह लग जाते हैं और ईश्वर को पुनः इस प्रकार भुला देते हैं मानो उन्हें कोई समस्या ही न रही हो और ईश्वर ने उनकी समस्या का निवारण न किया हो।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर पर ईमान मनुष्य की आत्मा की गहराइयों में पहुंच जाता है और कटु घटनाएं, ईश्वर की खोज में रहने वाली मानव प्रवृत्ति के जागृत होने का कारण बनती हैं।संकटों और कठिनाइयों के समय ईश्वर के समक्ष गिड़गिड़ाने और प्रार्थना करने की ईश्वरीय धर्मों में सिफ़ारिश की गई है।कृतघ्नता और निश्चेतना, सत्य के मार्ग से मनुष्य के भटकने का मार्ग प्रशस्त करती हैं और मनुष्य ऐसे स्थान पर पहुंच जाता है कि असत्य उसे सुन्दर दिखाई पड़ने लगता है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 13 और 14 की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ أَهْلَكْنَا الْقُرُونَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَمَّا ظَلَمُوا وَجَاءَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ وَمَا كَانُوا لِيُؤْمِنُوا كَذَلِكَ نَجْزِي الْقَوْمَ الْمُجْرِمِينَ (13) ثُمَّ جَعَلْنَاكُمْ خَلَائِفَ فِي الْأَرْضِ مِنْ بَعْدِهِمْ لِنَنْظُرَ كَيْفَ تَعْمَلُونَ (14)और निश्चित रूप से हम ने तुम से पहली वाली जातियों का विनाश कर दिया जब उन्होंने अत्याचार किया और यद्यपि पैग़म्बर उन के लिए स्पष्ट निशानियां ले कर आए किन्तु वे ईमान न लाए। इस प्रकार हम अपराधियों को दंडित करते हैं। (10:13) फिर हमने तुम को उन के पश्चात धरती पर उन का उत्तराधिकारी बना दिया ताकि देखें कि तुम किस प्रकार कर्म करते हो। (10:14)यद्यपि ईश्वर पापी लोगों को अवसर देता है और इस संसार में उनका विनाश नहीं करता किन्तु ऐसे समाजों और समुदायों के साथ उसका व्यवहार भिन्न होता है जिन के अधिकांश लोग अत्याचारी होते हैं, ऐसे समुदायों और समाजों को ईश्वर तबाह कर देता है। अलबत्ता इस प्रकार के अत्याचारों का मुख्य कारण, कुफ़्र व अधर्म है जिसके चलते मनुष्य पैग़म्बरों के बताए हुए मार्ग को छोड़कर पापों और अपराधों की ओर उन्मुख हो जाता है अतः पिछले लोगों की उत्तराधिकारी बनने वाली जातियों को उनके इतिहास से पाठ सीखना चाहिए और जान लेना चाहिए कि यदि वे भी पिछले लोगों के मार्ग पर चले तो उन ही जैसा अंत उनकी भी प्रतीक्षा कर रहा है।इन आयतों से हमने सीखा कि जिन लोगों के सुधार और ईमान की आशा नहीं होती उन के लिए अत्याचार, पतन और तबाही का मार्ग प्रशस्त करता है।लोगों का भविष्य स्वयं उन्हीं के हाथ में होता है और उनके अच्छे बुरे कर्म ही उनका भविष्य निर्धारित करते हैं।यदि हमें शक्ति और शासन प्राप्त हो जाए तो हमें जान लेना चाहिए कि ईश्वर हमारी भी परीक्षा लेगा और सभी लोग उसकी दृष्टि में एक समान हैं।