islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए यूनुस, आयतें 15-18, (कार्यक्रम 328)

    सूरए यूनुस, आयतें 15-18, (कार्यक्रम 328)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए यूनुस की आयत संख्या 15 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا تُتْلَى عَلَيْهِمْ آَيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ قَالَ الَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَاءَنَا ائْتِ بِقُرْآَنٍ غَيْرِ هَذَا أَوْ بَدِّلْهُ قُلْ مَا يَكُونُ لِي أَنْ أُبَدِّلَهُ مِنْ تِلْقَاءِ نَفْسِي إِنْ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَى إِلَيَّ إِنِّي أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّي عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ (15)और जब उन के समक्ष हमारी आयतों की तिलावत की जाती है तो जिन लोगों को हमारी भेंट की आशा नही है वे कहते हैं कि इसके अतिरिक्त कोई दूसरा क़ुरआन लाइये या (फिर) इसी को बदल दीजिए। तो (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि मुझे अपनी ओर से इस में परिवर्तन का कोई अधिकार नहीं है, मैं तो केवल उस बात का अनुसरण करता हूं जिस का मुझे वहि द्वारा आदेश दिया गया हो। मैं अपने पालनहार की अवज्ञा करूं तो मुझे एक महान दिन के दंड का भय है। (10:15)अनेकेश्वरवादी कि जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के निमंत्रण के संबोधक थे, अपनी पथभ्रष्टता और अंधविश्वास को छोड़ने के स्थान पर उनसे कहते है कि वे उनकी अनुचित मांगों पर ध्यान दें और ऐसी आयतों को क़ुरआने मजीद से निकाल दें जिनमें मूर्तिपूजा को नकारा गया है या फिर एक ऐसी किताब लाएं जिसमें इस प्रकार की बातें न हों ताकि वे पैग़म्बर पर ईमान ले आएं।जबकि पैग़म्बरों का लक्ष्य लोगों का मार्गदर्शन है न कि उन्हें अपने पास एकत्रित करना। पैग़म्बर अपने अनुसरणकर्ताओं की संख्या में वृद्धि के लिए उनकी तर्कहीन इच्छाओं एवं अनुचित मांगों की इच्छाओं पर ध्यान नहीं देते।इस आयत से हमने सीखा कि किसी को भी यहां तक पैग़म्बरों को भी ईश्वरीय किताबों की आयतों में फेर बदल या परिवर्तन का अधिकार नहीं है और वे ईश्वरीय आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करते हैं।ईश्वरीय कथन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, उसमें फेर बदल और सिद्धांत छोड़ने के मूल्य पर अनुसरणकर्ताओं की संख्या में वृद्धि का कोई महत्त्व नहीं है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 16 और 17 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ لَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا تَلَوْتُهُ عَلَيْكُمْ وَلَا أَدْرَاكُمْ بِهِ فَقَدْ لَبِثْتُ فِيكُمْ عُمُرًا مِنْ قَبْلِهِ أَفَلَا تَعْقِلُونَ (16) فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِآَيَاتِهِ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْمُجْرِمُونَ (17)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि यदि ईश्वर चाहता तो मैं इस क़ुरआन की तुम्हारे समक्ष तिलावत न करता और न तुम्हें इससे अवगत कराता। मैंने इससे पूर्व तुम्हारे बीच आयु बिताई है, क्या तुम चिंतन नहीं करते? (10:16) तो उससे बड़ा अत्याचारी कौन होगा जो ईश्वर पर लांछन लगाए या उसकी आयतों को झूठा बताए? निश्चित रूप से अपराधियों को कल्याण प्राप्त नहीं होगा। (10:17)पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से क़ुरआने मजीद में फेर बदल की मांग करने वालों के उत्तर में ये आयतें कहती हैं। पैग़म्बर तुम्हारे बीच चालीस वर्षों से जीवन व्यतीत कर रहे हैं, यदि यह क़ुरआन उनके विचारों का परिणाम होता तो इस अवधि में इस प्रकार की अन्य बातें भी उनकी ज़बान पर आतीं।इसके अतिरिक्त उन्होंने किसी गुरू से शिक्षा भी प्राप्त नहीं की है कि क़ुरआन को उनकी पिछली शिक्षाओं का परिणाम कहा जा सके। अतः जो लोग पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से क़ुरआने मजीद में परिवर्तन की मांग कर रहे हैं वस्तुतः वे क़ुरआने मजीद की आयतों को झुठलाते और ईश्वर पर आरोप लगाते हैं कि जो ईश्वर, पैग़म्बर और क़ुरआन के प्रति सबसे बड़ा अत्याचार है।इन आयतों से हमने सीखा कि आसमानी किताबें, ईश्वरीय संदेश हैं न कि पैग़म्बरों के विचारों या अन्य लोगों की शिक्षाओं का परिणाम।सबसे बड़ा अत्याचार सांस्कृतिक अत्याचार और धार्मिक व आस्था संबंधी वास्तविकताओं में फेर बदल करना है।आइये अब सूरए युनुस की 18वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَيَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنْفَعُهُمْ وَيَقُولُونَ هَؤُلَاءِ شُفَعَاؤُنَا عِنْدَ اللَّهِ قُلْ أَتُنَبِّئُونَ اللَّهَ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِي السَّمَاوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَى عَمَّا يُشْرِكُونَ (18)वे ईश्वर के स्थान पर ऐसी वस्तुओं की उपासना करते हैं जो न तो उन्हें क्षति पहुंचा सकती हैं और न ही लाभ और वे कहते हैं कि यही ईश्वर के निकट हमारी सिफ़ारिश करने वाले हैं। (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि क्या तुम ईश्वर को ऐसी बात की सूचना दे रहे हो जिसका उसे आकाशों और धरती में ज्ञान नहीं है? जो कुछ तुम उसके समकक्ष ठहराते हो, वह उससे कहीं पवित्र व उच्च है। (10:18)अनेकेश्वरवादी ऐसी मूर्तियों की उपासना करते थे जो न उन्हें क्षति पहुंचाती थीं कि उनके भय से उनकी उपासना की जाए और न उन्हें लाभ पहुंचाती थीं कि उसके कारण उनकी पूजा की जाए। इस आधार पर उनकी उपासना का कोई तर्क नहीं है।किन्तु मूर्तिपूजा करने वाले कहते थे कि हम इन्हें अपने और ईश्वर के बीच माध्यम मानकर इनकी पूजा करते हैं। उनका यह तर्क स्वीकार्य नहीं है क्योंकि ईश्वर ने उन्हें माध्यम नहीं बनाया है और न उनके इस कर्म से प्रसन्न है। अलबत्ता इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि पैग़म्बरों और ईश्वर के प्रिय बंदों को माध्यम बनाना और उनसे ईश्वर से सिफ़ारिश की इच्छा रखना, अनेकेश्वरवादियों के कर्म से पूर्णतः भिन्न है क्योंकि प्रथम तो वे निर्जीव पत्थर और लकड़ी नहीं हैं बल्कि वे मृत्यु के बाद का जीवन व्यतीत कर रहे हैं और दूसरे यह कि ईश्वर ने स्वयं उन्हें अपने और लोगों के बीच माध्यम बनाया है और लोगों से कहा है कि उनके माध्यम से ईश्वरीय मार्ग को पहचानें।इस आयत से हमने सीखा कि मूर्तियों की पूजा करने वाले मूर्तियों को अपने और ईश्वर के बीच माध्यम समझते हैं जबकि ईश्वर ने उन्हें माध्यम नहीं बनाया है।किसी भी व्यक्ति या वस्तु को ईश्वर का समकक्ष नहीं समझना चाहिए और जिनको ईश्वर ने सिफ़ारिश की अनुमति दी है उनके अतिरिक्त किसी से सिफ़ारिश की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।