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    सूरए यूनुस, आयतें 19-23, (कार्यक्रम 329)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 19 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا كَانَ النَّاسُ إِلَّا أُمَّةً وَاحِدَةً فَاخْتَلَفُوا وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِنْ رَبِّكَ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْ فِيمَا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ (19)(आरंभ में) सारे ही मनुष्य एक समुदाय थे फिर उनमें मतभेद उत्पन्न हो गया और यदि (लोगों को समय देने की) तुम्हारे पालनहार की परंपरा निर्धारित न होती तो इसी संसार में उनके मतभेदों का फ़ैसला कर दिया जाता। (10:19)ईश्वर ने सभी मनुष्यों की एकेश्वरवाद की पवित्र प्रवृत्ति पर सृष्टि की है इसी कारण आरंभ में सभी मनुष्य एक ही समुदाय थे किन्तु समय बीतने के साथ और शैतानी रुझहानों के चलते कुछ लोग अनेकेश्वरवाद की ओर उन्मुख हुए और समाज एकेश्वरवादी एवं अनेकेश्वरवादी जैसे दो गुटों में विभाजित हो गया।किन्तु ईश्वर चाहता है कि मनुष्य अपनी मर्ज़ी से अपने मार्ग का चयन करे अतः वह पथभ्रष्ट लोगों को अवसर देता है ताकि वे जो चाहें करें और यदि यह ईश्वरीय परंपरा न होती तो उन्हें इसी संसार में दंडित किया जाता तथा ईमान वालों और काफ़िरों के बीच का मतभेद समाप्त हो जाता।मनुष्य का वास्तविक मूल्य तभी है जब उसका व्यहवार उसकी अपनी इच्छा व चयन से हो अन्यथा विवशता के कारण लाया गया ईमान गर्व योग्य नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि आस्था एवं कर्म में अंतर और मतभेद मानव समाज की विशेषता है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 20 की तिलावत सुनते हैं।وَيَقُولُونَ لَوْلَا أُنْزِلَ عَلَيْهِ آَيَةٌ مِنْ رَبِّهِ فَقُلْ إِنَّمَا الْغَيْبُ لِلَّهِ فَانْتَظِرُوا إِنِّي مَعَكُمْ مِنَ الْمُنْتَظِرِينَ (20)और वे कहते हैं। उनके (अर्थात पैग़म्बर के) पालनहार की ओर से उन पर कोई आयत क्यों नहीं उतरती? तो कह दीजिए कि ईश्वर का गुप्त ज्ञान केवल उसी के पास है, तो तुम प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करने वालों में हूं। (10:20)अन्य ईश्वरीय पैग़म्बरों की भांति पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के पास भी कई चमत्कार थे किन्तु उनका मुख्य चमत्कार क़ुरआने मजीद था जिसका उत्तर देने की अनेकेश्वरवादियों में क्षमता नहीं थी। जो लोग ईमान नहीं लाना चाहते थे, वे प्रतिदिन कोई न कोई बहाना बनाते थे और पैग़म्बर से कहते थे कि वे नए नए चमत्कार प्रस्तुत करें।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम उत्तर में कहते हैं। चमत्कार मेरे नहीं बल्कि ईश्वर के हाथ में है और जब वह चाहेगा तभी चमत्कार होगा तथा जो कुछ तुम चाहते हो वह बहानेबाज़ी के अतिरिक्त कुछ नहीं है।इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि अनेकेश्वरवादियों की मांगें प्रायः अनुचित व तर्कहीन होती हैं जैसा कि कुछ ही आयतों पहले हमने पढ़ा कि उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से किसी दूसरे क़ुरआन की मांग की, या एक अन्य स्थान पर उन्होंने पैग़म्बर से कहा कि वे आकाश में उड़ान भरें या फिर सोने का महल बनाएं।इस आयत से हमने सीखा कि कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद का कारण तर्क व ईश्वरीय चमत्कार का आभाव नहीं बल्कि सत्य के मुक़ाबले में हठधर्मी और बहानेबाज़ी है।चमत्कार ईश्वर की इच्छा से होता है न कि लोगों की इच्छा और मांग से।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 21 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا أَذَقْنَا النَّاسَ رَحْمَةً مِنْ بَعْدِ ضَرَّاءَ مَسَّتْهُمْ إِذَا لَهُمْ مَكْرٌ فِي آَيَاتِنَا قُلِ اللَّهُ أَسْرَعُ مَكْرًا إِنَّ رُسُلَنَا يَكْتُبُونَ مَا تَمْكُرُونَ (21)और जब कभी हम लोगों को, उन तक पहुंचने वाली कठिनाइयों और कड़ाई के पश्चात अपनी दया का स्वाद चखाते हैं तो वे (कृतज्ञता के स्थान पर) तत्काल हमारी आयतों में चालें चलने लगते हैं, तो कह दीजिए कि ईश्वर युक्ति करने में सबसे तीव्र है। निश्चित रूप से हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) तुम्हार चालों को (निरंतर) लिखते रहते हैं। (10:21)इतिहास में वर्णित है कि एक बार मक्का नगर में भीषण सूखा पड़ा और ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के अस्तित्व की कृपा से वर्षा भेज कर मक्के के लोगों को मुक्ति दी किन्तु अनेकेश्वरवादियों ने कहा कि यह वर्षा मूर्तियों के कारण हुई है। उसी समय यह आयत आई जिसमें कहा गया है कि यदि तुम वास्तव में सत्य के खोजी होते तो यही वर्षा एक ईश्वरीय चमत्कार थी किन्तु अपनी हठधर्मी और द्वेष के कारण तुमने ईश्वरीय कृपा को निर्जीव मूर्तियों से संबंधित कर दिया।आगे चलकर आयत कहती है कि तुम्हें यह जान लेना चाहिए कि ईश्वर के भेजे हुए फ़रिश्ते मनुष्य के सभी कर्मों को लिखते रहते हैं और मिथ्याचारियों को प्रलय के दिन अपने इन कर्मों का उत्तर देना होगा, अलबत्ता इस संसार में भी ईश्वर उनकी चालों का उत्तर देता है और वे ईश्वरीय संकल्प पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते।इस आयत से हमने सीखा कि सभी मनुष्य ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभान्वित होते हैं किन्तु अधिकांश लोग कृतज्ञता के स्थान पर छल कपट और धोखे के विचार में रहते हैं।ईश्वरीय दंड मनुष्य के अपराध के अनुकूल होता है। छल कपट और चाल का दंड अधिक बड़े धोखे में फंसना है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 22 और 23 की तिलावत सुनते हैं।هُوَ الَّذِي يُسَيِّرُكُمْ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ حَتَّى إِذَا كُنْتُمْ فِي الْفُلْكِ وَجَرَيْنَ بِهِمْ بِرِيحٍ طَيِّبَةٍ وَفَرِحُوا بِهَا جَاءَتْهَا رِيحٌ عَاصِفٌ وَجَاءَهُمُ الْمَوْجُ مِنْ كُلِّ مَكَانٍ وَظَنُّوا أَنَّهُمْ أُحِيطَ بِهِمْ دَعَوُا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ لَئِنْ أَنْجَيْتَنَا مِنْ هَذِهِ لَنَكُونَنَّ مِنَ الشَّاكِرِينَ (22) فَلَمَّا أَنْجَاهُمْ إِذَا هُمْ يَبْغُونَ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّمَا بَغْيُكُمْ عَلَى أَنْفُسِكُمْ مَتَاعَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ثُمَّ إِلَيْنَا مَرْجِعُكُمْ فَنُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (23)वही ईश्वर है जो तुम्हें थल व समुद्र की सैर कराता है, यहां तक कि जब तुम नौका में थे और ठंडी एवं सुखद हवाएं उसे लिए जा रही थीं और सारे (यात्री) प्रसन्न थे तो (साहसा ही) एक तेज़ हवा चली और लहरों ने चारों ओर से उन्हें अपने घेरे में ले लिया और उन्होंने सोचा कि मृत्यु ने उन्हें घेर लिया है तो उन्होंने बड़ी ही निष्ठा के धर्म से ईश्वर को पुकारा (और कहा कि) यदि तू ने इस (संकट) से हमें मुक्ति दे दी तो निश्चित रूप से हम कृतज्ञों में से हो जाएंगे। (10:22) किन्तु जब ईश्वर ने उन्हें मुक्ति दे दी तो वे पुनः धरती पर उद्दंडता एवं अत्याचार करते हैं। हे लोगों! निश्चित रूप से तुम्हारी उद्दंडता तुम्हारे लिए ही हानिकारक है और सांसारिक लाभ (तो केवल कुछ ही दिनों का है) फिर तुम्हें लौटना तो हमारी ही ओर है तो हम तुम्हें तुम्हारे कर्मों से अवगत कराएंगे। (10:23)कार्यक्रम के आरंभ में हमने कहा कि ईश्वर ने एकेश्वरवाद की पवित्र प्रवृत्ति के साथ सभी लोगों की सृष्टि की है, ये आयतें कहती हैं कि संसार की चकाचौंध और मायामोह के कारण यह प्रवृत्ति दबने लगती है और मनुष्य इसकी ओर से निश्चेत होता चला जाता है किन्तु कठिन परिस्थितियों में जब मनुष्य हर ओर से निराश हो जाता है तो वह स्वभाविक प्रवृत्ति जागृत हो जाती है और ईश्वर से मनुष्य का नाता जोड़ देती है, इस प्रकार से कि वह बड़ी ही निष्ठा के साथ ईश्वर को पुकारता है और उसी से मुक्ति की आशा रखता है।किन्तु खेद के साथ कहना पड़ता है कि मनुष्य बड़ी जल्दी उद्दंडता में ग्रस्त हो जाता है और इस बात को भूल जाता है कि यह सांसारिक जीवन अपने समस्त मायामोह के साथ सीमित और बहुत ही छोटा है तथा सभी को ईश्वर की ओर लौटना है और एक ऐसे न्यायालय में पहुंचना है जिसमें उसके समस्त कर्मों का हिसाब लिया जाएगा।इन आयतों से हमने सीखा कि प्राकृतिक आपदाएं मनुष्य के घमंड एवं अहं को समाप्त करके ईश्वरीय प्रवृत्ति को जागृत करती हैं।सामयिक और अस्थाई ईमान का कोई मूल्य नहीं है। ईमान स्थाई और अनंतकालीन होना चाहिए, चाहे सुख में हो या दुख में अथवा आराम में हो या कठिनाई में।प्रायः मनुष्य ईश्वरीय कृपाओं के प्रति कृतघ्न रहता है और उसके आज्ञापालन के स्थान पर उद्दंडता करता है।