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    सूरए यूनुस, आयतें 24-27, (कार्यक्रम 330)

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    आइये सूरए यूनुस की आयत संख्या 24 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّمَا مَثَلُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا كَمَاءٍ أَنْزَلْنَاهُ مِنَ السَّمَاءِ فَاخْتَلَطَ بِهِ نَبَاتُ الْأَرْضِ مِمَّا يَأْكُلُ النَّاسُ وَالْأَنْعَامُ حَتَّى إِذَا أَخَذَتِ الْأَرْضُ زُخْرُفَهَا وَازَّيَّنَتْ وَظَنَّ أَهْلُهَا أَنَّهُمْ قَادِرُونَ عَلَيْهَا أَتَاهَا أَمْرُنَا لَيْلًا أَوْ نَهَارًا فَجَعَلْنَاهَا حَصِيدًا كَأَنْ لَمْ تَغْنَ بِالْأَمْسِ كَذَلِكَ نُفَصِّلُ الْآَيَاتِ لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ (24)निसंदेह सांसारिक जीवन की उपमा उस पानी की भांति है जिसे हमने आकाश से उतारा फिर उसके माध्यम से धरती की वनस्पतियां उगीं जिन्हें मनुष्य और चौपाए खाते हैं। यहां तक कि धरती ने अपने को अपनी हरियाली से सजा लिया और उस पर रहने वालों ने सोचा कि (अब हम ही) इस धरती के स्वामी हैं तो सहसा ही रात या दिन के समय हमारा आदेश आ गया तो हमने उसे बिल्कुल कटा हुआ खेत बना दिया मानो कल उसमें कुछ (उगा ही) न था। हम चिंतन करने वालों के लिए अपनी निशानियों का इसी प्रकार विस्तार से वर्णन करते हैं। (10:24)ईश्वर ने क़ुरआने मजीद में बहुत सी बातों के वर्णन के लिए संज्ञाओं एवं उपमाओं का सहारा लिया है जैसे इस आयत में संसार के नश्वर व अस्थायी होने को वर्षा के समय धरती की हरियाली की संज्ञा दी गई है जो अधिक ठंड, गर्मी अथवा आंधी के समय इस प्रकार विलुप्त हो जाती है जैसे उसका अस्तित्व ही न रहा हो।इस आयत से हमने सीखा कि प्रकृति का सौंदर्य, संसार से मनुष्य के लगाव का कारण नहीं बनना चाहिए क्योंकि यह सब नश्वर और अस्थायी है। संसार में मनुष्य की आयु, फूलों एवं हरियाली की भांति बहुत छोटी होती है। इस नश्वर संसार में स्वयं को अमर नहीं समझना चाहिए।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 25 की तिलावत सुनते हैं।وَاللَّهُ يَدْعُو إِلَى دَارِ السَّلَامِ وَيَهْدِي مَنْ يَشَاءُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ (25)और ईश्वर लोगों को मुक्ति व कल्याण के घर अर्थात स्वर्ग की ओर बुलाता है और जिसका चाहता है सीधे रास्ते की ओर मार्गदर्शन करता है। (10:25)संसार के अल्पकालीन जीवन के मुक़ाबले में प्रलय का अनंतकालीन जीवन है जिसकी ओर ईश्वर ने लोगों को बुलाया है और वास्तविक आराम और शांति के ठिकाने की ओर लोगों के मार्गदर्शन के लिए पैग़म्बरों को भेजा है। स्पष्ट है कि ऐसे ही लोग इस मार्ग पर आ पाते हैं जिन्हें ईश्वर इसके योग्य समझता है और उनके कर्म इस मार्ग से उनके हटने का कारण नहीं बनते।इस आयत से हमने सीखा कि संसार का आराम क्षणिक व अस्थायी है किन्तु परलोक का आराम स्थायी व अनंत है।वास्तविक आराम और शांति तक पहुंचने का एकमात्र मार्ग ईश्वर के सीधे मार्ग पर चलना है कि जिससे संसार में भी मनुष्य का मन शांत रहता है और परलोक में भी उसे स्वर्ग प्राप्त होता है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 26 की तिलावत सुनते हैं।لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا الْحُسْنَى وَزِيَادَةٌ وَلَا يَرْهَقُ وُجُوهَهُمْ قَتَرٌ وَلَا ذِلَّةٌ أُولَئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (26)भलाई करने वालों के लिए अधिक बड़ी भलाई होगी और उनके चेहरों पर अपमान की धूल नहीं बैठेगी। ऐसे ही लोग स्वर्ग में जाने वाले हैं जहां वे सदैव रहेंगे। (10:26)पिछली आयत में स्वर्ग की ओर संकेत करने के पश्चात यह आयत कहती है कि ईश्वर ने अनंतकालीन स्वर्ग को भलाई करने वालों के लिए बनाया है और उनका पारितोषिक उनके कर्मों से कहीं अधिक बेहतर होगा। जैसा कि क़ुरआने मजीद दूसरी आयतों में भी कहता है कि जो कोई भला कर्म करेगा उसे उससे दस गुना अधिक पारितोषिक मिलेगा, यहां तक कि ईश्वर के मार्ग में दान दक्षिणा के पारितोषिक को सात सौ गुना तक बताया गया है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर निमंत्रण भी देता है और मार्गदर्शन भी करता है, प्रेरित व प्रोत्साहित भी करता है और गंतव्य तक पहुंचने वालों को अधिक बेहतर पारितोषिक देता है, तो हम उसके निमंत्रण को स्वीकार क्यों न करें और दूसरों के मार्ग पर क्यों चलें?भले कर्म करने से अनुकंपाओं से भरे ईश्वर के स्वर्ग में अमर जीवन प्राप्त होता है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 27 की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ كَسَبُوا السَّيِّئَاتِ جَزَاءُ سَيِّئَةٍ بِمِثْلِهَا وَتَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌ مَا لَهُمْ مِنَ اللَّهِ مِنْ عَاصِمٍ كَأَنَّمَا أُغْشِيَتْ وُجُوهُهُمْ قِطَعًا مِنَ اللَّيْلِ مُظْلِمًا أُولَئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (27)और जिन लोगों ने बुराई कमाई तो उस बुराई का दंड उसी के समान है और बुराई की धूल उन्हें अपनी लपेट में ले लेगी तथा ईश्वर के कोप से बचने हेतु उनके पास कोई शरण नहीं होगी। मानो उनके चेहरों पर अंधेरी रात का कोई टुकड़ा डाल दिया गया हो। यही लोग नरक में जाने वाले हैं जहां वे सदैव रहेंगे। (10:27)भले कर्म करने वालों के मुक़ाबले में, जिनका भला अंत होता है, बुरे कर्म करने वालें हैं जो ईश्वरीय कोप व दंड में ग्रस्त होते हैं और उनके पास उससे बचने का कोई मार्ग नहीं होता। ईश्वरीय कोप इतना कड़ा होता है कि उनके चेहरे काले पड़ जाते हैं।अलबत्ता ईश्वर के न्याय के चलते उन्हें उनके पापों और अपराधों के अनुसार ही दंड मिलता है उससे अधिक नहीं, किंतु उसकी दया व कृपा के कारण भले कर्म करने वालों को सदैव ही उनके कर्मों से अधिक पारितोषिक मिलता है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने सारे मनुष्यों को स्वतंत्र पैदा किया है और वे अपनी इच्छा से अपने मार्ग का चयन करते हैं, कुछ लोग भले कर्म करने वालों में शामिल होते हैं और कुछ बुरे कर्म करने वालों के साथ हो जाते हैं।इस्लाम की प्रशैक्षणिक व्यवस्था में प्रोत्साहन और पारितोषिक को दंड से अधिक महत्त्व प्राप्त है।