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    सूरए यूनुस, आयतें 34-38, (कार्यक्रम 332)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 34 और 35 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ هَلْ مِنْ شُرَكَائِكُمْ مَنْ يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ قُلِ اللَّهُ يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ فَأَنَّى تُؤْفَكُونَ (34) قُلْ هَلْ مِنْ شُرَكَائِكُمْ مَنْ يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ قُلِ اللَّهُ يَهْدِي لِلْحَقِّ أَفَمَنْ يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ أَحَقُّ أَنْ يُتَّبَعَ أَمَّنْ لَا يَهِدِّي إِلَّا أَنْ يُهْدَى فَمَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ (35)(हे पैग़म्बर अनेकेश्वरवादियों से) कह दीजिए कि जिन्हें तुमने ईश्वर का समकक्ष बना रखा है, क्या उनके बीच कोई ऐसा है जो सृष्टि का आरंभ करता है फिर उसे लौटाता है तो तुम कहां चले जा रहे हो? (10:34) कह दीजिए कि जिन्हें तुमने ईश्वर का समकक्ष बना रखा है, क्या उनके बीच कोई ऐसा है जो सत्य की ओर मार्गदर्शन कर सके? कह दीजिए कि ईश्वर ही है जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करता है। तो जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करता है वह अनुसरण योग्य है या वह जो मार्गदर्शन प्राप्त किए बिना सही मार्ग पर आ ही नहीं सकता? तो तुम्हें क्या हो गया है? तुम कैसे फ़ैसले कर रहे हो? (10:35)पिछली आयतों में यह सिद्ध करने के पश्चात कि अनेकेश्वरवादियों द्वारा ईश्वर के समकक्ष ठहराई गई वस्तुएं कुछ भी करने में सक्षम नहीं है, इन आयतों में क़ुरआने मजीद कहता है कि यदि तुम सृष्टि पर दृष्टि डालो तो भली भांति समझ जाओगे कि अनन्य ईश्वर के अतिरिक्त किसी में भी संसार की रचना और उसे पुनः अस्तित्व प्रदान करने की क्षमता नहीं है तथा मूर्तियां एवं अन्य वस्तुएं स्वयं रचना हैं और उन्हें रचयिता की आवश्यकता है तो किस प्रकार वे सृष्टि की रचना कर सकते हैं?और यदि तुम मार्गदर्शन और कल्याण प्राप्त करना चाहते हो तो जान लो कि उनके पास अपना कोई मार्गदर्शन नहीं है कि वे तुम्हारे मार्गदर्शक बन सकें। और यदि उनमें मार्गदर्शन करने की क्षमता हो तो भी पहले उन्हें स्वयं सही मार्ग पर होना चाहिए ताकि वे तुम्हारा मार्गदर्शन कर सकें, जबकि ईश्वर सीधे मार्ग और सत्य के पथ की ओर तुम्हारा मार्गदर्शक है। अलबत्ता स्पष्ट है कि ईश्वरीय मार्गदर्शन उसके पैग़म्बरों और आसमानी किताबों से ही होता है कि जो ईश्वरीय कथन के अतिरिक्त कोई बात नहीं करते।इन आयतों से हमने सीखा कि विचार व आस्था संबंधी विरोधियों से वाद विवाद का उत्तम मार्ग प्रश्न व उत्तर की शैली है जिसे ईश्वर ने अपने पैग़म्बरों को सिखाया है।ईश्वर संसार का रचयिता है किन्तु वह अपनी रचनाओं को ऐसे नहीं छोड़ देता। वह ऐसा रचयिता है जिसने अपनी समस्त रचनाओं को परिपूर्णता का मार्ग दिखाया है और उन्हें इस मार्ग पर डाल दिया है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 36 की तिलावत सुनते हैं। وَمَا يَتَّبِعُ أَكْثَرُهُمْ إِلَّا ظَنًّا إِنَّ الظَّنَّ لَا يُغْنِي مِنَ الْحَقِّ شَيْئًا إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِمَا يَفْعَلُونَ (36)और उनमें से अधिकांश लोग केवल विचारों (और कल्पनाओं) का अनुसरण करते हैं। निश्चित रूप से विचार और कल्पनाएं मनुष्य को सत्य से आवश्यकता मुक्त नहीं करतीं। निसंदेह ईश्वर उनके कर्मों से भलि भांति अवगत है। (10:36)यह आयत अनेकेश्वरवादियों की वैचारिक पथभ्रष्टता के मूल कारण की ओर संकेत करते हुए कहती है कि निराधार एवं तर्कहीन विचार और कल्पनाएं इस बात का कारण बनी हैं कि वे सत्य को छोड़कर इस प्रकार की ग़लत व अनुचित अवधारणाओं की ओर उन्मुख हों जबकि वैचारिक और आस्था संबंधी समस्याओं में कल्पनाओं का कोई स्थान नहीं होता बल्कि जिस बात का महत्त्व होता है वह विश्वास है कि जो मनुष्य को सत्य तक पहुंचाता है।इसके अतिरिक्त यह कि अनेक आस्थाओं का स्रोत पूर्वजों का अंधा अनुसरण और सांप्रदायिक धर्मांधता है कि जिसका कोई वैचारिक व वैज्ञानिक मूल्य नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि नैतिक व आस्था संबंधी मामलों में बहुसंख्या सत्यता का प्रमाण नहीं है। हो सकता है कि अधिकांश लोग कर्म या विचार में पथभ्रष्टता का शिकार हों अतः यह उनके कर्म या विचार के सही होने का प्रमाण नहीं हो सकता।कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद का कोई वैज्ञानिक व तर्कसंगत आधार नही है तथा कल्पनाएं भी निराधार होती हैं।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 37 और 38 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا كَانَ هَذَا الْقُرْآَنُ أَنْ يُفْتَرَى مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلَكِنْ تَصْدِيقَ الَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ وَتَفْصِيلَ الْكِتَابِ لَا رَيْبَ فِيهِ مِنْ رَبِّ الْعَالَمِينَ (37) أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَاهُ قُلْ فَأْتُوا بِسُورَةٍ مِثْلِهِ وَادْعُوا مَنِ اسْتَطَعْتُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (38)ऐसा नहीं है कि यह क़ुरआन ईश्वर के अतिरिक्त किसी और की ओर से झूठ में गढ़ लिया गया हो बल्कि यह पिछली आसमानी किताबों की पुष्टि करने वाला और ईश्वरीय किताब का विस्तार से वर्णन करने वाला है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह ब्रह्मांड के पालनहार की ओर से है। (10:37) क्या वे कहते हैं कि इसे (पैग़म्बर ने) स्वयं ही गढ़ लिया है? कह दीजिए कि यदि तुम सच कहते हो तो भी इसकी भांति एक सूरा ले आओ और ईश्वर के अतिरिक्त जिसको चाहो अपनी सहायता के लिए बुला लो। (10:38)क़ुरआने मजीद ने अनेक बार अपने ईश्वरीय होने तथा उसके समान पुस्तक लाने में मनुष्यों और जिन्नों की अक्षमता पर बल दिया है बल्कि उसने विरोधियों को इस संबंध में चुनौती भी दी है, यहां तक कि उसने कहा है कि यदि तुम पूरे क़ुरआन और किसी सूरे की भांति पुस्तक और सूरा न ला सको तो उसकी एक आयत के समान ही एक आयत ले आओ।किन्तु इस्लाम व क़ुरआन के इतने अधिक विरोधियों के बावजूद पिछली चौदह शताब्दियों में क़ुरआने मजीद की यह चुनौती निरुत्तर रही है और ग़ैर मुस्लिम अरब विद्वान और साहित्यकार क़ुरआने मजीद की भांति एक आयत लाने में भी विफल रहे हैं।अलबत्ता क़ुरआने मजीद के ईश्वरीय चमत्कार होने के विभिन्न आयाम हैं जिनमें से कुछ की ओर हम संकेत कर रहे हैं। प्रथम यह कि क़ुरआने मजीद की मिठास और प्रभाव इस प्रकार का है कि यदि उसे हज़ार बार भी पढ़ा जाए तो भी पढ़ने वाला उबता नहीं है।दूसरे यह कि क़ुरआने मजीद की वाणी ऐसी संगीतमय और लयबद्ध है इसे किसी भी अन्य अरबी साहित्य के साथ रखा जाए तो इसकी अलग ही पहचान है और यह पूर्णतः भिन्न दिखाई पड़ता है।निजी, पारिवारिक, सामाजिक, क़ानूनी, राजनैतिक एवं नैतिक मामलों सहित सभी क्षेत्रों में क़ुरआने मजीद की व्यापकता इतनी अधिक है कि कोई भी मनुष्य उसकी ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकता।इन आयतों से हमने सीखा कि सभी पैग़म्बरों एवं आसमानी किताबों का एक ही लक्ष्य व उद्देश्य था।क़ुरआने मजीद आज भी चमत्कार है और चौदह शताब्दियों के दौरान उसमें फेर बदल न होने का यही प्रमाण है।