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    सूरए यूनुस, आयतें 39-44, (कार्यक्रम 333)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 39 और 40 की तिलावत सुनते हैं।بَلْ كَذَّبُوا بِمَا لَمْ يُحِيطُوا بِعِلْمِهِ وَلَمَّا يَأْتِهِمْ تَأْوِيلُهُ كَذَلِكَ كَذَّبَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الظَّالِمِينَ (39) وَمِنْهُمْ مَنْ يُؤْمِنُ بِهِ وَمِنْهُمْ مَنْ لَا يُؤْمِنُ بِهِ وَرَبُّكَ أَعْلَمُ بِالْمُفْسِدِينَ (40)बल्कि काफ़िरों ने उस बात को झुठला दिया है कि जिसका उन्हें ज्ञान नहीं था जबकि उसकी वास्तविकता अभी उनके लिए स्पष्ट नहीं हुई थी। उनसे पहले जो लोग थे उन्होंने भी इसी प्रकार झुठलाया था तो आप देखिए कि अत्याचारियों का कैसा परिणाम हुआ (10:39) और उनमें से कुछ ईमान लाते हैं और कुछ ईमान नहीं लाते और तुम्हारा पालनहार बिगाड़ उत्पन्न करने वालों को भलि भांति जानता है। (10:40)पिछले कार्यक्रमों में हमने बताया था कि काफ़िर व अनेकेश्वरवादी बिना तर्क के केवल निराधार कल्पनाओं के आधार पर क़ुरआने मजीद को पैग़म्बरे इस्लाम का कथन बताते थे और उसके ईश्वरीय कथन होने को झुठलाते थे। यह आयतें कहती हैं कि वे अपने पूर्वजों की बातों की पुनरावृत्ति करते हैं क्योंकि पिछले पैग़म्बरों पर भी इसी प्रकार के आरोप लगाए जाते थे जबकि उनके इस आरोप का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है अतः वे स्वयं पर भी अत्याचार करते हैं और आसमानी किताबों पर भी और ईश्वरीय पैग़म्बरों पर भी अत्याचार करते हैं।अलबत्ता इस बीच कुछ लोग वास्तविकता को समझ कर उसे स्वीकार भी कर लेते हैं। ईश्वर यही चाहता है कि लोग अपनी इच्छा से मार्ग का चयन करें ताकि जो चाहे ईमान लाए और जो चाहे काफ़िर हो जाए।इन आयतों से हमने सीखा कि कुफ़्र और इन्कार का मुख्य कारण वास्तविकता की पहचान का आभाव है। जो लोग सत्य को पहचानना चाहते हैं निश्चित रूप से वे पैग़म्बरों की सत्यता को समझ जाते हैं और उन पर ईमान ले आते हैं।पैग़म्बरों की शिक्षाओं से दूरी और कुफ़्र के कारण ही अत्याचार और भष्टाचार अस्तित्व में आता है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 41 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ كَذَّبُوكَ فَقُلْ لِي عَمَلِي وَلَكُمْ عَمَلُكُمْ أَنْتُمْ بَرِيئُونَ مِمَّا أَعْمَلُ وَأَنَا بَرِيءٌ مِمَّا تَعْمَلُونَ (41)(हे पैग़म्बर!) यदि उन्होंने आपको झुठलाया तो उनसे कह दीजिए कि मेरा कर्म मेरे लिए और तुम्हारा कर्म तुम्हारे लिए है। जो कुछ मैं करता हूं तुम उससे विरक्त हो और जो कुछ तुम करते हो उससे मैं विरक्त हूं। (10:41)यह आयत काफ़िरों व विरोधियों के साथ अपनाई जाने वाली शैली का वर्णन करते हुए कहती है कि उनके मुक़ाबले में तुम्हारा दायित्व नसीहत व मार्गदर्शन है न कि ज़ोर जब़रदस्ती और न ही सांठ गांठ। यदि वे तुम्हारे निमंत्रण के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं और तुम्हें झुठला देते हैं तो फिर उनके प्रति तुम्हारा कोई दायित्व नहीं है क्योंकि ईमान, आस्था और इच्छा के आधार पर होना चाहिए और इन लोगों ने सत्य को समझने का प्रयास ही नहीं किया और यदि सत्य को समझ गए हैं तो उसे स्वीकार नहीं करना चाहा है।अलबत्ता कुछ लोग विरोधियों को आकृष्ट करने के लिए सांठ गांठ और समर्पण का मार्ग अपनाते हैं और यह सोचते हैं कि कुछ सिद्धांतों को छोड़कर वे उन्हें अपनी ओर आकृष्ट कर लेंगे जबकि हमें यह अधिकार नहीं है कि अपनी संख्या में वृद्धि के लिए अपने सिद्धांतों को छोड़ दें, अतः इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से कहा गया कि वे काफ़िरों से कह दें कि अब जबकि तुम मेरी बात स्वीकार नहीं करते तो मैं तुम्हारे कर्मों से विरक्त हूं और मेरे कर्मों के संबंध में तुम्हारा भी कोई दायित्व नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि समाज के धार्मिक नेताओं को कुछ लोगों के विरोध से मुक़ाबले के लिए स्वयं को तैयार करना चाहिए और यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि सभी लोग उनके निमंत्रण पर सकरात्मक उत्तर देंगे।इस्लाम, तर्क व नैतिकता का धर्म है और अपनी नीतियों का स्पष्ट रूप से उल्लेख करता है। इस्लाम ज़ोर ज़बरदस्ती या सांठगांठ का धर्म नहीं है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 42,43 और 44 की तिलावत सुनते हैं।وَمِنْهُمْ مَنْ يَسْتَمِعُونَ إِلَيْكَ أَفَأَنْتَ تُسْمِعُ الصُّمَّ وَلَوْ كَانُوا لَا يَعْقِلُونَ (42) وَمِنْهُمْ مَنْ يَنْظُرُ إِلَيْكَ أَفَأَنْتَ تَهْدِي الْعُمْيَ وَلَوْ كَانُوا لَا يُبْصِرُونَ (43) إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ النَّاسَ شَيْئًا وَلَكِنَّ النَّاسَ أَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ (44)हे पैग़म्बर! जब आप क़ुरआने मजीद की तिलावत करते हैं) तो उनमें से कुछ लोग (विदित रूप से) आपकी बात सुनते हैं क्या आप अपनी बात बहरों को सुनवा सकते हैं चाहे वे समझने वाले न हों? (10:42) और उनमें से कुछ लोग आपको देखते हैं, तो क्या आप अंधों को मार्ग दिखा सकते हैं चाहे उन्हें सुझाई न दे रहा हो? (10:43) निश्चित रूप से ईश्वर लोगों पर अत्याचार नहीं करता बल्कि लोग स्वयं ही अपने पर अत्याचार करते हैं। (10:44)पिछली आयतों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के प्रति उनके विरोधियों के व्यवहार की शैली का वर्णन करने के पश्चात ये आयतें कहती हैं कि उनमें से कुछ पैग़म्बर की बैठकों में उपस्थिति भी होते हैं और उन्हें देखते भी हैं और उनकी बातों को सुनते भी हैं किन्तु इससे उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि ये बातें उनके हृदय तक नहीं पहुंचतीं। मानो वे बहरे हों और उन्हें सुनाई नहीं पड़ता या अंधे हों और उन्हें सुझाई नहीं देता। स्वाभाविक रूप से इस प्रकार के लोग सत्य को नहीं समझते बल्कि वस्तुतः समझना ही नहीं चाहते।मूल रूप से पशुओं पर मनुष्य की श्रेष्ठता उसकी चिंतन शक्ति के कारण है अन्यथा पशु भी देखते और सुनते हैं बल्कि बहुत से पशुओं में देखने और सुनने की शक्ति मनुष्यों से अधिक होती है। मनुष्य को अपनी देखी व सुनी हुई बातों पर चिंतन मनन करना चाहिए तथा सत्य को असत्य से अलग करके उसी के अनुसार कर्म करना चाहिए।अंतिम आयत कहती है कि ईश्वर ने सभी मनुष्य को आंख, कान व बुद्धि प्रदान की है जो वास्तविकता तक नहीं पहुंचना चाहते वे स्वयं पर अत्याचार करते हैं और अपने आप को तबाही में डालते हैं। ईश्वर ने किसी पर भी अत्याचार नहीं किया और न ही वह यह चाहता है कि कोई पथभ्रष्टता की खाई में गिरे।इन आयतों से हमने सीखा कि देखना व सुनना, सोचने व समझने की भूमिका है।जो लोग सत्य को नहीं देखते उन्हें प्रलय के दिन भी अंधा उठाया जाएगा और यह इस संसार में ईश्वरीय आयतों को न देखने और मन के अंधे होने का साक्षात रूप होगा।