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    सूरए यूनुस, आयतें 45-49, (कार्यक्रम 334)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 45 की तिलावत सुनते हैं।وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ كَأَنْ لَمْ يَلْبَثُوا إِلَّا سَاعَةً مِنَ النَّهَارِ يَتَعَارَفُونَ بَيْنَهُمْ قَدْ خَسِرَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِلِقَاءِ اللَّهِ وَمَا كَانُوا مُهْتَدِينَ (45)और जिस दिन ईश्वर उन्हें एकत्रित करेगा तो ऐसा जान पड़ेगा मानो वे (संसार में) दिन की एक घड़ी भर ठहरे थे। वे आपस में एक दूसरे को पहचान रहे होंगे। निश्चित रूप से जिन लोगों ने (प्रलय में) ईश्वर से मिलने को झुठलाया वे घाटे में रहे और वे मार्ग पाने वालों में न थे। (10:45)यद्यपि काफ़िर प्रलय को झुठलाते हैं और उनका इन्कार करते हैं किन्तु वे चाहें या न चाहें उन्हें उस दिन उपस्थित होना ही पड़ेगा जिस दिन सारे लोग एकत्रित होंगे। उस दिन प्रलय का वैभव ऐसा होगा कि वे संसार के जीवन तथा मृत्यु के पश्चात क़ब्र में बिताए गए समय को केवल एक घड़ी भर समझेंगे।प्रलय के दिन यद्यपि लोगों को मरे हुए एक लंबी अवधि बीत चुकी होगी किन्तु उन्हें ऐसा प्रतीत होगा कि वे सो रहे थे और अभी अभी जागे हैं, अतः वे एक दूसरे को भलिभांति पहचान रहे होंगे और भूले नहीं होंगे।इन परिस्थितियों में स्वाभाविक है कि प्रलय का इन्कार करने वाले, प्रलय में उपस्थित होकर कर अपने घाटे में रहने का आभास करेंगे और समझ जाएंगे कि वे इस मैदान में ख़ाली हाथ आए हैं और उनके पास वापसी का भी कोई मार्ग नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि सांसारिक आयु इतनी कम है कि प्रलय में मनुष्य इस अल्पायु से भी लाभ न उठाने के कारण घाटे का आभास करेगा।वास्तविक घाटा यह है कि मनुष्य संसार के अस्थायी आनंदों को अनंत सफलताओं एवं कल्याण पर श्रेष्ठता दे।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 46 की तिलावत सुनते हैं।وَإِمَّا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ الَّذِي نَعِدُهُمْ أَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَإِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ ثُمَّ اللَّهُ شَهِيدٌ عَلَى مَا يَفْعَلُونَ (46)(हे पैग़म्बर!) हमने जिन बातों को काफ़िरों से वादा किया है उन्हें आपको दिखा दें या उससे पहले ही आपको संसार से उठा लें तब भी इन्हें पलटकर हमारी ही ओर आना है फिर जो कुछ ये कर रहे हैं, ईश्वर उसका गवाह है। (10:46)यह आयत पैग़म्बर व अन्य ईमान वालों को सांत्वना देते हुए कहती है कि यदि काफ़िरों को इसी संसार में पूर्ण रूप से दंडित नहीं करता तो उसका कारण यह है कि मुख्य रूप से दंड व पारितोषिक प्रलय में दिया जाएगा जहां सभी को पहुंचना है और ईश्वर जो सभी कर्मों का गवाह है, मनुष्य को पूर्ण रूप से बदला देगा।किन्तु ऐसा नहीं है कि सभी दंड प्रलय में दिए जाएंगे बल्कि कुछ दंड इसी संसार में भी दिए जाते हैं जिन्हें लोग अपने जीवन में देखते हैं और कुछ दंड करने के पश्चात लोगों को दिए जाते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि काफ़िरों को दंड मिलने में विलंब से ईमान वालों को निराश व चिंतित नहीं होना चाहिए क्योंकि यह ईश्वर का दायित्व है और अपने वचन का अवश्य पालन करता है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 47 की तिलावत सुनते हैं।وَلِكُلِّ أُمَّةٍ رَسُولٌ فَإِذَا جَاءَ رَسُولُهُمْ قُضِيَ بَيْنَهُمْ بِالْقِسْطِ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ (47)और हर समुदाय के लिए एक पैग़म्बर हो तो जब उनका पैग़म्बर आ जाता है तो उनका फ़ैसला न्यायपूर्वक कर दिया जाता है और उन पर कोई अत्याचार नहीं होता। (10:47)ईश्वरीय पैग़म्बर दो प्रकार के रहे हैं, एक गुट के पास ईश्वरीय किताब भी थी और ईश्वरीय धर्म भी और दूसरे गुट का दायित्व उस धर्म को लोगों तक पहुंचाना था। क़ुरआने मजीद की आयतों से पता चलता है कि विभिन्न मानवीय समाजों में सदैव ऐसे लोग रहे हैं जिन्होंने पैग़म्बरों और आसमानी किताबों का प्रचार किया तथा लोगों को उनके अनुसरण का निमंत्रण दिया।लोगों के बीच पैग़म्बरों का सबसे महत्त्वपूर्ण दायित्व, न्याय स्थापित करना तथा अत्याचार से संघर्ष करना था। प्रलय में ईश्वर हर जाति को उसके पैग़म्बर के साथ उठाएगा तथा न्याय के साथ उनके बारे में फ़ैसला करेगा।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने किसी भी जाति व समुदाय को उसकी स्थिति पर नहीं छोड़ा है बल्कि पैग़म्बरों के कथन किसी न किसी प्रकार उन तक पहुंचाए हैं।समाज में वास्तविक न्याय की स्थापना पैग़म्बरों व आसमानी किताबों की शिक्षाओं की छाया में ही संभव है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 48 और 49 की तिलावत सुनते हैं।وَيَقُولُونَ مَتَى هَذَا الْوَعْدُ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (48) قُلْ لَا أَمْلِكُ لِنَفْسِي ضَرًّا وَلَا نَفْعًا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ لِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌ إِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ فَلَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ (49)(काफ़िर) कहते हैं कि यदि आप सच कहते हैं तो प्रलय का यह वादा कब पूरा होगा? (10:48) (हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि जब तक ईश्वर न चाहे मुझे स्वयं अपने बुरे और भले का अधिकार नहीं है, हर जाति के लिए एक निर्धारित समय है तो जब वह समय आ जाता है तो फिर न तो एक घड़ी का विलंब हो सकता है न ही एक घड़ी की जल्दी हो सकती है। (10:49)काफ़िर कि जो प्रलय की वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए तैयार न थे, विभिन्न बहानों से इस वास्तविकता को झुठलाना चाहते थे। अतः उन्होंने यह प्रश्न किया कि यदि प्रलय सत्य है और तुम सच कहते हो तो उसका समय कब आएगा? जबकि किसी बात के निश्चित होने के लिए उसका समय निर्धारित होना आवश्यक नहीं है।हम सब जानते हैं कि हमें एक दिन संसार से जाना है किन्तु किसी को भी अपनी मृत्यु के समय का ज्ञान नहीं है। पैग़म्बर भी ईश्वरीय संदेश के आधार पर लोगों को यह बताते हैं कि संसार की समाप्ति के पश्चात प्रलय आएगा किन्तु ईश्वर ने उन्हें भी यह नहीं बताया कि प्रलय कब आएगा कि वे लोगों को उसका समय बताएं।इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बर सत्य के आधार पर लोगों से बात करते हैं और इसी कारण वे लोगों से स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हमारी अपनी कोई शक्ति नहीं है और हमें अपने भले और बुरे का अधिकार नहीं है।लोगों की भांति समाज का भी अंत होता है, कभी उसका अंत तबाही और पतन के रूप में होता है तो कभी सम्मान एवं वैभव को खोने से उसकी मृत्यु होती है।