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    सूरए यूनुस, आयतें 5-10, (कार्यक्रम 326)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या पांच और छह ही तिलावत सुनते हैं।هُوَ الَّذِي جَعَلَ الشَّمْسَ ضِيَاءً وَالْقَمَرَ نُورًا وَقَدَّرَهُ مَنَازِلَ لِتَعْلَمُوا عَدَدَ السِّنِينَ وَالْحِسَابَ مَا خَلَقَ اللَّهُ ذَلِكَ إِلَّا بِالْحَقِّ يُفَصِّلُ الْآَيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ (5) إِنَّ فِي اخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَمَا خَلَقَ اللَّهُ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ لَآَيَاتٍ لِقَوْمٍ يَتَّقُونَ (6)वही है जिसने सूर्य और चंद्रमा को प्रकाशमान बनाया और चंद्रमा (के घटने बढ़ने) की मंज़िलें ठहराईं ताकि तुम (उसके माध्यम से) वर्षों की संख्या और हिसाब जान सको। ईश्वर ने इन सबकी, सत्य के साथ ही सृष्टि की है और वो जानने वालों के लिए अपनी निशानियों को स्पष्ट रूप से वर्णन करता है। (10:5) निश्चित रूप से रात और दिन के आने जाने में से और जिन वस्तुओं की ईश्वर ने आकाशों और धरती में रचना की है, उनमें ईश्वर से डरने वालों के लिए बड़ी निशानियां हैं। (10:6)पिछले कार्यक्रम में सृष्टि के आरंभ और प्रलय के संबंध में संकेत करने के पश्चात ये आयतें सृष्टि की रचना में ईश्वर की महानता की कुछ निशानियों का उल्लेख करते हुए सूर्य व चंद्रमा के महत्त्व पर प्रकाश डालती हैं। सूर्य के प्रकाश और ऊष्मा के कारण ही धरती पर रहने वालों का अस्तित्व है जबकि चंद्रमा का सुन्दर प्रकाश रात में लोगों का मार्गदर्शन करता है।इसके अतिरिक्त सूर्य के चारों ओर धरती की, और धरती के चारों ओर चंद्रमा की परिक्रमा ने एक प्राकृतिक कैलण्डर को अस्तित्व प्रदान कर दिया है कि चार ऋतुओं के पश्चात एक नया वर्ष आता है। दूसरी ओर चंद्रमा के विभिन्न चरणों से अर्थात अर्धचंद्र से लेकर पूर्ण चंद्रमा तक तथा पहली स्थिति पर उसकी वापसी तक चांद का एक महीना पूरा होता है। ये एक ऐसा प्राकृतिक कैलेण्डर है जो पूरे मानव इतिहास में सभी लोगों के लिए चाहे वो पढ़े लिखे हों या निरक्षर लाभदायक रहा है।आगे चलकर ये आयतें सृष्टि की इस व्यवस्था के सत्य, सही व तत्वदर्शितापूर्ण होने पर बल देते हुए कहती हैं, रात और दिन की इसी आवाजाही में कि जो बहुत साधारण प्रतीत होती है, सत्य की खोज में रहने वाले पवित्र हृदय के लोगों के लिए ईश्वर की शक्ति व तत्वदर्शिता की अनेक निशानियां हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि गिनती, संख्या और हिसाब की मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका है और क़ुरआने मजीद, सूर्य और चंद्रमा के आधार पर दिनों, महीनों और वर्षों की गिनती को इसका एक उदाहरण बताता है।प्रकृति पर, चाहे वो हमारी दृष्टि में महत्त्वहीन ही क्यों न हो, विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि प्रकृति ईश्वर के सौन्दर्य का दर्पण है।आइये अब सूरए यूनुस की सातवीं और आठवीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَاءَنَا وَرَضُوا بِالْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَاطْمَأَنُّوا بِهَا وَالَّذِينَ هُمْ عَنْ آَيَاتِنَا غَافِلُونَ (7) أُولَئِكَ مَأْوَاهُمُ النَّارُ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ (8)निश्चित रूप से जिन लोगों को (प्रलय में) हमारी भेंट की आशा नहीं है और (इस) संसार के जीवन पर (ही) प्रसन्न हो गए हैं और उसी पर संतुष्ट हैं और जो लोग हमारी निशानियों की ओर से निश्चेत हैं, (10:7) वे ऐसे लोग हैं जिनके कर्मों के आधार पर उनका ठिकाना नरक है। (10:8) पिछली आयतों में धरती और आकाशों में ईश्वर की निशानियों की ओर संकेत करने के पश्चात ये आयतें कहती हैं कि जो लोग इन निशानियों की ओर से निश्चेत हैं और इन्हें ईश्वर के अस्तित्व और उसकी शक्ति व तत्वदर्शिता का चिन्ह नहीं मानते वे मायामोह में ग्रस्त हैं और इस नश्वर एवं अल्पकालीन संसार पर संतुष्ट व प्रसन्न रहते हैं अतः वे परलोक के जीवन पर ध्यान नहीं देते और न इस बात की आशा करते हैं कि प्रलय में उन्हें ईश्वर से मिलना है। स्वभावाविक है कि इस प्रकार के लोग विभिन्न प्रकार की बुराइयों में ग्रस्त हो जाते और प्रलय में नरक में जाएंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय में निश्चेतना और संसार का मायामोह व्यक्ति एवं समाज की तबाही का मार्ग प्रशस्त करता है।नरक, स्वयं मनुष्यों के कर्मों का फल है कि जो प्रलय में आग के रूप में प्रकट होगा।आइये अब सूरए यूनुस की नवीं और दसवीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ يَهْدِيهِمْ رَبُّهُمْ بِإِيمَانِهِمْ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهِمُ الْأَنْهَارُ فِي جَنَّاتِ النَّعِيمِ (9) دَعْوَاهُمْ فِيهَا سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَتَحِيَّتُهُمْ فِيهَا سَلَامٌ وَآَخِرُ دَعْوَاهُمْ أَنِ الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ (10)निश्चित रूप से जिन लोगों ने ईमान लाने के पश्चात अच्छे कर्म किए उनका पालनहार उनके ईमान के माध्यम से उनका मार्गदर्शन करेगा। वे अनुकंपाओं से भरे ऐसे बाग़ों में होंगे जहां उनके पैरों के नीचे से नहरें बह रही होंगी। (10:9) स्वर्ग में उनका कथन यही होगा कि प्रभुवर तू पवित्र है और वहां उनका अभिवादन सलाम होगा और उनका अंतिम कथन ये होगा कि सारी प्रशंसाएं उस अल्लाह के लिए हैं जो पूरे ब्रह्मांड का पालनहार है। (10:10)नरकवासियों की मायामोह की स्थिति का वर्णन करने के पश्चात ये आयतें स्वर्ग में रहने वाले मोमिनों की स्थिति की ओर संकेत करती है और ईश्वरीय मार्गदर्शन को लोक परलोक में उनकी सबसे बड़ी पूंजी बताती है अलबत्ता ये मार्गदर्शन ईमान और भले कर्मों के कारण प्राप्त होता है।ईश्वरीय मार्गदर्शन ऐसा प्रकाश है जो ईश्वर ईमान वालों को प्रदान करता है ताकि वे कठिनाइयों के अंधकार के समय पथभ्रष्टता में न फंसे और सही मार्ग का चयन करके उस पर चल सकें। स्वाभाविक है कि जो संसार के बजाए ईश्वर पर भरोसा करता है ईश्वर भी उसे अकेला नहीं छोड़ता और प्रलय में उसे विभिन्न प्रकार की अनुकंपाएं प्रदान करता है।आगे चलकर आयत स्वर्ग वालों की प्रार्थना की ओर संकेत करते हुए ईश्वर के महिमागान को उनकी निशानी बताती है। स्वाभाविक है कि केवल ज़बान से ईश्वर का महिमागान पर्याप्त नहीं है बल्कि इस बात पर भी विश्वास होना चाहिए कि ईश्वर हर प्रकार की बुराई से पवित्र है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान वाले को सदैव ही ईश्वरीय मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।सलाम, स्वर्ग वालों का कथन है और स्वर्ग के पूरे वातावरण में इसी की गूंज होती है, ईश्वर की ओर से सलाम, फ़रिश्तों की ओर सलाम और एक दूसरे के लिए स्वर्ग वालों का सलाम।