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    सूरए यूनुस, आयतें 50-56, (कार्यक्रम 335)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 50 और 51 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِنْ أَتَاكُمْ عَذَابُهُ بَيَاتًا أَوْ نَهَارًا مَاذَا يَسْتَعْجِلُ مِنْهُ الْمُجْرِمُونَ (50) أَثُمَّ إِذَا مَا وَقَعَ آَمَنْتُمْ بِهِ آَلْآَنَ وَقَدْ كُنْتُمْ بِهِ تَسْتَعْجِلُونَ (51)हे पैग़म्बर! कह दीजिए कि यदि ईश्वर का दंड रात के समय या दिन में तुम्हारे पास आ जाए तो क्या तुम उससे बच सकते हो? तो पापी किस बात की जल्दी कर रहे हैं? (10:50) क्या जब दंड आ जाएगा तब तुम उस पर ईमान लाओगे कि तुमसे कहा जाए कि अब ईमान ला रहे हो? जबकि तुम पहले उसके आने के लिए जल्दबाज़ी कर रहे थे? (10:51)ये आयतें प्रलय का इन्कार करने वालों का उत्तर देती हैं कि जो कहते थे कि ईश्वरीय दंड कब आएगा? ईश्वर की ओर से पैग़म्बर उनसे कहते हैं कि तुम लोग जो दंड के जल्दी आने की मांग कर रहे हो तो यदि दंड रात या दिन में सहसा ही आ जाए तो क्या करोगे? क्या तुम्हारे पास उससे बचने का मार्ग या उसे रोकने की शक्ति है?और यदि तुम यह सोचते हो कि ईश्वरीय दंड के चिन्ह देखने के पश्चात तुम ईमान ले आओगे और वह ईमान तुम्हारे लिए लाभदायक होगा, तो तुम्हारा विचार ग़लत है क्योंकि ईश्वरीय दंड के आते ही तौबा व प्रायश्चित के द्वार बंद हो जाते हैं और उस समय ईमान लाने का कोई लाभ नहीं है।इन आयतों से हमने सीखा कि अपराधियों को मिलने वाले दंड के बारे में विश्वास ही नहीं बल्कि केवल संभावना भी इस बात के लिए पर्याप्त है कि वे अपने कार्यों में सावधानी बरतें।ख़तरे के समय ईमान लाने का कोई मूल्य नहीं है क्योंकि वह ईमान, भय के कारण होगा, विश्वास व इच्छा के आधार पर नहीं।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 52 की तिलावत सुनते हैं।ثُمَّ قِيلَ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا ذُوقُوا عَذَابَ الْخُلْدِ هَلْ تُجْزَوْنَ إِلَّا بِمَا كُنْتُمْ تَكْسِبُونَ (52)फिर अत्याचारियों से कहा जाएगा कि स्थायी दंड का स्वाद चखो। क्या तुम्हें अपने कर्मों के अतिरिक्त किसी अन्य चीज़ का बदला दिया जाएगा? (10:52)पिछली आयतों में संसार में ईश्वरीय दंड की बात की गई थी कि जो आकस्मिक रूप से पापियों और अपराधियों को मिलता है। इस आयत में प्रलय में अपराधियों को मिलने वाले दंड की बात की गई है कि चूंकि उन्होंने स्वयं पर और दूसरों पर अत्याचार किए हैं और अपराध करना नहीं छोड़ा था अतः वे स्थाई दंड में ग्रस्त होंगे।ईश्वरीय दंड का आधार, संसार में लोगों का कर्म है और वही कर्म प्रलय में अपराधियों के समक्ष साक्षात हो जाएंगे और उन्हें निरंतर यातना पहुंचाते रहेंगे।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी संस्कृति के अनुसार अत्याचार केवल दूसरों पर नहीं होता बल्कि पाप भी अत्याचार है क्योंकि पाप स्वयं पर भी अत्याचार है और पैग़म्बरों पर भी जिन्होंने मानव समाज के मार्गदर्शन के लिए बड़े दुख सहे हैं।ईश्वरीय दंड पूर्णरूप से न्याय संगत और मनुष्यों के कर्मों के अनुसार होते हैं।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 53 और 54 की तिलावत सुनते हैं।وَيَسْتَنْبِئُونَكَ أَحَقٌّ هُوَ قُلْ إِي وَرَبِّي إِنَّهُ لَحَقٌّ وَمَا أَنْتُمْ بِمُعْجِزِينَ (53) وَلَوْ أَنَّ لِكُلِّ نَفْسٍ ظَلَمَتْ مَا فِي الْأَرْضِ لَافْتَدَتْ بِهِ وَأَسَرُّوا النَّدَامَةَ لَمَّا رَأَوُا الْعَذَابَ وَقُضِيَ بَيْنَهُمْ بِالْقِسْطِ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ (54)हे पैग़म्बर! वे आपसे पूछते हैं कि क्या (दंड का वादा) सच्चा है? कह दीजिए कि हां, मेरे पालनहार की सौगंध कि वह बिल्कुल सच्चा है और तुम उसे रोक नहीं सकते। (10:53) और यदि हर व्यक्ति के पास जिसने अत्याचार किया है, वह सब कुछ हो जो धरती में है तो दंड से बचने के लिए वह उसे दे देता है। और जब वे दंड को देखेंगे तो अपने पछतावे को छिपाएंगे और उनके बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला कर दिया जाएगा और उन पर अत्याचार नहीं होगा। (10:54)लोक परलोक में अपराधियों को मिलने वाले दंड के बारे में पिछली आयतों में संकेत करने के पश्चात यह आयतें कहती हैं कि ईश्वरीय दंड के बारे में संदेह न करो कि ईश्वरीय वादा अटल व सच्चा है। पैग़म्बर जिनकी सारी बातें सच्ची हैं, ईश्वर की सौगंध खाकर कहते हैं कि ऐसा दिन अवश्य आएगा और उस दिन से बचने या वापसी का कोई मार्ग नहीं है।ईश्वरीय दंड इतना कड़ा होगा कि हर अपराधी अपनी समस्त सांसारिक संपत्ति देकर दंड से बचने के लिए तैयार होगा किन्तु इसका कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि पश्चाताप का समय बीत चुका होगा और प्रलय का न्यायालय, न्याय के आधार पर अपना फ़ैसला सुनाएगा और उसे लागू किया जाएगा।इन आयतों से हमने सीखा कि संदेह दूर करने के लिए कभी कभी पैग़म्बर को भी सौगंध खानी पड़ती है।ईश्वर के न्यायालय में लोगों की धन संपत्ति और शक्ति का कोई लाभ नहीं है, वहां केवल आस्था और कर्म निर्णायक है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 55 और 56 की तिलावत सुनते हैं।أَلَا إِنَّ لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ أَلَا إِنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ وَلَكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ (55) هُوَ يُحْيِي وَيُمِيتُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ (56)जान लो कि कुछ आकाशों और धरती में है वह सब ईश्वर का ही है जान लो कि ईश्वर का वादा सच्चा है किन्तु उनमें से अधिकांश नहीं समझते। (10:55) वही है जो जीवन प्रदान करता है और मृत्यु देता है और तुम सब उसी की ओर लौटाए जाओगे। (10:56)प्रलय के बारे में संदेह का सबसे बड़ा कारण, ईश्वर की शक्ति में संदेह है, अतः यह आयतें कहती हैं कि तुम यह क्यों सोचते हो कि ईश्वर मरे हुए लोगों को जीवित करने और उन्हें उनके कर्मों का बदला देने में सक्षम नहीं है? क्या तुम नहीं जानते कि पूरे संसार पर उसी का स्वामित्व है और वही संसार का रचयिता है तथा जीवन व मृत्यु उसी के हाथ में है तो फिर तुम क्यों प्रलय में संदेह करते हो?इन आयतों से हमने सीखा कि सभी वस्तुओं का वास्तविक स्वामित्व ईश्वर का है और मनुष्यों का स्वामित्व अस्थाई है अतः प्रलय में काफ़िरों की अपनी कोई वस्तु नहीं होगी जिसे वे अपनी मुक्ति के लिए प्रस्तुत कर सकें।संसार पर ईश्वर का स्वामित्व उसके वचनों की पूर्ति में उसकी क्षमता का प्रमाण है।