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    सूरए यूनुस, आयतें 57-61, (कार्यक्रम 336)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 57 और 58 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاءَتْكُمْ مَوْعِظَةٌ مِنْ رَبِّكُمْ وَشِفَاءٌ لِمَا فِي الصُّدُورِ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِلْمُؤْمِنِينَ (57) قُلْ بِفَضْلِ اللَّهِ وَبِرَحْمَتِهِ فَبِذَلِكَ فَلْيَفْرَحُوا هُوَ خَيْرٌ مِمَّا يَجْمَعُونَ (58)हे लोगों! निश्चित रूप से तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से उपदेश आ चुका है जो तुम्हारे हृदयों में जो कुछ रोग है उसके लिए उपचार है और ईमान वालों के लिए मार्गदर्शन और दया है। (10:57) हे पैग़म्बर ईमान वालों से कह दीजिए कि केवल ईश्वर की दया व कृपा पर ही प्रसन्न रहें कि यह उन सबसे उत्तम है जिन्हें वे एकत्रित कर रहे हैं। (10:58)मनुष्य के शरीर की भांति उसकी आत्मा भी विभिन्न रोगों में ग्रस्त होती है और उसे उपचार की आवश्यकता होती है। यदि घमंड, अहं, ईर्ष्या, कंजूसी और दिखावे जैसे रोगों का उपचार न किया जाए तो इनके परिणाम स्वरूप मनुष्य, कुफ़्र व मिथ्या में ग्रस्त हो जाता है जो उसे सही मार्ग से भटका देते हैं।किन्तु क़ुरआने मजीद अपने निरंतर उपदेशों द्वारा अनेक पापों की संभावना को समाप्त कर देता है। दूसरी ओर वह ईश्वरीय दंड का उल्लेख करके मनुष्य को अपने कर्मों के बुरे अंत से सचेत करता है ताकि उसकी आत्मा पवित्र हो जाए।स्वभाविक है कि पवित्र एवं स्वस्थ आत्माएं ही ईश्वरीय मार्गदर्शन एवं दया का पात्र बनती हैं अतः ईश्वर अपने पैग़म्बर से कहता है कि वे ईमान वालों से कह दें कि उनकी सबसे उत्तम पूंजी ईश्वर की पुस्तक पर ईमान और उसका अनुसरण है और उन्हें इस महान अनुकंपा पर प्रसन्न होना चाहिए न कि सांसारिक पदों और धन संपत्ति पर।इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद, रोगी हृदयों और आत्मिक बीमारियों का सबसे अच्छा उपचार है।आज की व्यक्तिगत व सामाजिक समस्याओं और रोगों का उपचार, अपूर्ण मानवीय मतों से नहीं बल्कि क़ुरआने मजीद से सीखना चाहिए।क़ुरआने मजीद संसार की समस्त संपत्ति से श्रेष्ठ है। वास्तविक दरिद्र वह है जो क़ुरआन की शिक्षाओं से वंचित रह जाए, चाहे उसके पास संसार का सारा ही धन क्यों न हो, और धनवान वह है जो क़ुरआन के अनुसार जीवन व्यतीत करे, चाहे विदित रूप से वह दरिद्र ही क्यों न हो।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 59 और 60 की आयतों की तिलावत सुनते हैं।قُلْ أَرَأَيْتُمْ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ لَكُمْ مِنْ رِزْقٍ فَجَعَلْتُمْ مِنْهُ حَرَامًا وَحَلَالًا قُلْ آَللَّهُ أَذِنَ لَكُمْ أَمْ عَلَى اللَّهِ تَفْتَرُونَ (59) وَمَا ظَنُّ الَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّ اللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلَكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَشْكُرُونَ (60)कह दीजिए कि क्या तुमने देखा कि ईश्वर ने तुम्हें जो रोज़ी दी है उसमें से कुछ को तुमने हराम और कुछ को हलाल ठहरा लिया है? कह दीजिए कि क्या ईश्वर ने तुम्हें इसकी अनुमति दी है कि तुम उस पर झूठा आरोप लगाओ? (10:59) और जो लोग ईश्वर पर झूठा आरोप लगाते हैं कि वे प्रलय के दंड के बारे में क्या सोचते हैं? निसंदेह ईश्वर सभी लोगों पर कृपा करने वाला है किन्तु अधिकांश लोग कृतज्ञता प्रकट नहीं करते। (10:60)पिछली आयतों में क़ुरआने मजीद के मार्गदर्शन और दया की बात की गई थी। ये आयतें कहती हैं कि जो कोई भी क़ुरआन मजीद से अलग होता है वह निराधार एवं बनावटी क़ानूनों तथा अंधविश्वास के जाल में फंस जाता है कि जो स्वयं ही जीवन में विभिन्न समस्याओं और कठिनाइयों का कारण है।जैसा कि क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में कहा गया है कि कुछ अनेकेश्वरवादी चौपायों और अपनी खेती में उगाए गए अनाज के एक भाग को स्वयं पर वर्जित कर लेते थे और उन्हें मूर्तियों पर चढ़ा देते थे, जबकि ये आयतें कहती हैं कि तुम्हारी रोज़ी ईश्वर की ओर से है और केवल उसी को अधिकार है कि किसी वस्तु को हलाल अर्थात वैध या हराम अर्थात वर्जित करे सिवाय इसके कि उसकी ओर से तुम्हें इसकी अनुमति दी गई हो जबकि ऐसा नहीं है और तुम्हें प्रलय में इस बड़े झूठ व आरोप का उत्तर देना होगा।आगे चलकर आयतें कहती हैं कि लोगों के प्रति ईश्वर की अनुकंपाएं उसकी दया व कृपा की निशानी है किन्तु लोग इन अनुकंपाओं के प्रति कृतज्ञ नहीं रहते और झूठे क़ानूनों द्वारा, अकारण ही स्वयं को इन अनुकंपाओं से वंचित कर लेते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर अनुकंपाओं का स्वामी है और उसी को हलाल या हराम के निर्धारण का अधिकार है, मनुष्य अपनी इच्छाओं के आधार पर जिस वस्तु को चाहे हराम या हलाल नहीं कर सकता।क़ानून बनाने का अधिकार केवल ईश्वर के पास है और उसके क़ानून के विरुद्ध किसी भी प्रकार के क़ानून का कोई महत्त्व नहीं है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 61 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا تَكُونُ فِي شَأْنٍ وَمَا تَتْلُو مِنْهُ مِنْ قُرْآَنٍ وَلَا تَعْمَلُونَ مِنْ عَمَلٍ إِلَّا كُنَّا عَلَيْكُمْ شُهُودًا إِذْ تُفِيضُونَ فِيهِ وَمَا يَعْزُبُ عَنْ رَبِّكَ مِنْ مِثْقَالِ ذَرَّةٍ فِي الْأَرْضِ وَلَا فِي السَّمَاءِ وَلَا أَصْغَرَ مِنْ ذَلِكَ وَلَا أَكْبَرَ إِلَّا فِي كِتَابٍ مُبِينٍ (61)हे पैग़म्बर! आप किसी स्थिति में रहें और क़ुरआन के किसी भाग की तिलावत करें और हे लोगों! तुम कोई भी कर्म करो, हम तुम्हारे गवाह होते हैं, जब भी कोई कर्म करते हो और तुम्हारे पालनहार से धरती और आकाश का कोई भी कण छिपा हुआ नहीं है और कोई भी वस्तु कण से बड़ी या छोटी ऐसी नहीं है कि जिसका हमने अपनी स्पष्ट किताब में वर्णन न कर दिया हो। (10:61)यह आयत ईश्वर के व्यापक ज्ञान की ओर संकेत करते हुए कहती है कि ईश्वर मनुष्य के हर कर्म और उसकी हर स्थिति का ज्ञान रखता है, इसी प्रकार संसार की ऐसी कोई भी छोटी बड़ी वस्तु नहीं है जिसका ईश्वर को ज्ञान न हो। ईश्वर ने इन सारी बातों को अपनी स्पष्ट किताब में वर्णित कर दिया है क्योंकि केवल ईश्वर ही नहीं बल्कि उसके फ़रिश्ते भी इन बातों को देखते हैं और मनुष्य के कर्म पत्र में लिखते रहते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर और फ़रिश्ते सारे कर्मों और विचारों को देखते हैं और उनसे कोई बात छिपी हुई नहीं है।ईश्वर की दृष्टि में धरती और आकाश तथा छोटे और बड़े का कोई अंतर नहीं है, उसे सभी लोगों और वस्तुओं का समान रूप से ज्ञान प्राप्त है।केवल साधारण मनुष्यों ही नहीं बल्कि पैग़म्बरों तक पर ईश्वर की दृष्टि रहती है और वह उनके कर्मों का भी निरीक्षण करता रहता है।पूरा संसार ईश्वर की दृष्टि में है यदि वह हमें समय देता है और दंडित करने में जल्दी नहीं करता तो यह हमारे कर्मों से उसकी अनभिज्ञता का प्रमाण नहीं बल्कि उसकी कृपा और तौबा व प्रायश्चित के लिए अवसर देने का चिन्ह है।