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    सूरए यूनुस, आयतें 62-67, (कार्यक्रम 337)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 62, 63 और 64 की तिलावत सुनते हैं।أَلَا إِنَّ أَوْلِيَاءَ اللَّهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ (62) الَّذِينَ آَمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ (63) لَهُمُ الْبُشْرَى فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآَخِرَةِ لَا تَبْدِيلَ لِكَلِمَاتِ اللَّهِ ذَلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ (64)जान लो कि ईश्वर के प्रिय बंदों को न तो कोई भय होता है और नही वे दुखी होते हैं। (10:62) जो लोग ईमान लाए और ईश्वर से डरते रहे, (10:63) उनके लिए सांसारिक जीवन और प्रलय में शुभ सूचना है और ईश्वर के कथनों व वचनों में कोई परिवर्तन नहीं है और यही बड़ी सफलता है। (10:64)पिछले कुछ कार्यक्रमों में अनेकेश्वरवादियों तथा काफ़िरों के बारे में चर्चा की गई थी, ये आयतें वास्तविक ईमान वालों की स्थिति पर प्रकाश डालती है ताकि उन दो गुटों से तुलना करके कल्याण और विफलता के मार्गों को पहचाना जा सके। आत्मा की शांति और दुखों व पीड़ाओं से दूरी वह सबसे बड़ी अनुकंपा है जो ईश्वर ने अपने प्रिय बंदों को प्रदान की है। वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने पाप और बुराई की रूकावटों को तोड़ कर स्वयं को पवित्रता और भलाई के सोते अर्थात ईश्वर के निकट कर लिया है और क़ुरआने मजीद के शब्दों में ईश्वर के प्रिय बंदों की श्रेणी में आ गए हैं। स्वाभाविक है कि इस प्रकार के लोग सदैव ही ईश्वरीय शुभ सूचनाओं को अपने हृदय व आत्मा के माध्यम से प्राप्त करते रहते हैं और कभी भी संदेह एवं शंका में ग्रस्त नहीं होते और न ही कभी अपने दायित्वों के पालन में आलस्य से काम लेते हैं।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम का कथन है कि ईश्वर के प्रिय बंदे जब मौन धारण करते हैं तो ईश्वर की याद में रहते हैं, जब किसी वस्तु पर दृष्टि डालते हैं तो पाठ सीखते हैं, जब बात करते हैं तो उसमें तत्वदर्शिता होती है और समाज में उनका अस्तित्व विभूति का कारण होता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि कभी किसी का अनादर न करो और न किसी को तुच्छ समझो क्योंकि ईश्वर ने अपने प्रिय बंदों को लोगों के बीच छिपा रखा है, हो सकता है कि वह उन्हीं में से हो और तुम्हें पता न हो।इन आयतों से हमने सीखा कि जो कोई केवल ईश्वर ही से डरता है उसे किसी से भय नहीं होता और वह किसी से भी नहीं डरता।ईश्वर से भय के बिना ईमान का कोई लाभ नहीं है और ईमान वाले व्यक्ति को सदैव पापों और बुराईयों से दूर रहना चाहिए।वे लोग कल्याण और सफलता तक पहुंचते हैं जिन्हें ईमान और ईश्वरीय भय की छाया में लोक परलोक दोनों प्राप्त हो।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 65 और 66 की तिलावत सुनिए।وَلَا يَحْزُنْكَ قَوْلُهُمْ إِنَّ الْعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ (65) أَلَا إِنَّ لِلَّهِ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَمَنْ فِي الْأَرْضِ وَمَا يَتَّبِعُ الَّذِينَ يَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ شُرَكَاءَ إِنْ يَتَّبِعُونَ إِلَّا الظَّنَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَخْرُصُونَ (66)विरोधियों की बातें आपको दुखी न करें क्योंकि समस्त सम्मान और शक्ति केवल ईश्वर के लिए है और वह सुनने वाला एवं जानकार है। (10:65) जान लो कि निश्चित रूप से आकाशों में रहने वाले हों या धरती में, सबके सब ईश्वर के लिए हैं। और जो लोग ईश्वर को छोड़कर दूसरे समकक्षों को पुकारते हैं वे उनका भी अनुसरण नहीं करते, वे तो केवल अपने निराधार विचारों का अनुसरण करते हैं और वे केवल अटकलों से काम लेते हैं। (10:66)मक्के के अनेकेश्वरवादी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम पर निराधार आरोप लगाते थे और कभी उन्हें कवि, जादूगर ज्योतिषी तो कभी पागल कह कर पुकारते थे और कहते थे कि ये बातें उन्हें दूसरे लोग सिखाते हैं, इसी प्रकार वे कभी उन्हें अपने ही समान एक मनुष्य बताते थे जिसे उनकी तुलना में कोई विशिष्टता प्राप्त नहीं है।ईश्वर इन निराधार बातों के बारे में अपने पैग़म्बर को सांत्वना देते हुए कहता है कि ईश्वर का संकल्प यह है कि तुम और तुम्हारे साथी सम्मानीय रहो और वे लोग ईश्वर की इच्छा के सामने कुछ नहीं कर सकते क्योंकि पूरा ब्रह्मांड उसके अधीन है और लोग ईश्वर के अतिरिक्त दूसरों की शरण में जाते हैं न तो वे और न ही उनके देवता ईश्वर की इच्छा के मुक़ाबले में कुछ कर सकते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि शत्रुओं का एक षड्यंत्र धार्मिक नेताओं की छवि बिगाड़ना है किन्तु ईश्वर ने वचन दिया है कि वे इसमें सफल नहीं हो सकेंगे।यह नहीं सोचना चाहिए कि जो लोग ईश्वर को छोड़कर दूसरों की शरण में जाते हैं और उनका तर्क सुदृढ़ है। हमें अपनी आस्था पर दृढ़ रहना चाहिए और इस पर विश्वास रखना चाहिए कि केवल ईश्वर ही सत्य है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 67 की तिलावत सुनते हैं।هُوَ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ اللَّيْلَ لِتَسْكُنُوا فِيهِ وَالنَّهَارَ مُبْصِرًا إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَاتٍ لِقَوْمٍ يَسْمَعُونَ (67)वही है जिसने तुम्हारे लिए रात बनाई ताकि तुम उसमें आराम पा सको और उसी ने दिन को प्रकाशमान बनाया, निसंदेह इसमें सुनने वालों के लिए निशानियां हैं। (10:67)पिछली आयत में संसार पर ईश्वर के संपूर्ण प्रभुत्व की बात की गई थी, यह आयत ईश्वर की तत्वदर्शितापूर्ण युक्तियों की ओर संकेत करते हुए रात और दिन की व्यवस्था को ईश्वर की शक्ति और प्रभुत्व का चिन्ह बताती है।क़ुरआने मजीद की विभिन्न आयतों में रात को मनुष्य के लिए आराम का कारण बताया गया है। स्पष्ट है कि शरीर का आराम, सोने और लेटने से संभव होता है किन्तु आत्मा का आराम, प्रार्थना और ईश्वर की उपासना से प्राप्त होता है।इस आयत से हमने सीखा कि संसार की वर्तमान व्यवस्था संयोग नहीं है बल्कि पहले से निर्धारित एक कार्यक्रम और लक्ष्य के आधार पर संसार का संचालन होता है।ईश्वरीय आयतों और धार्मिक नेताओं की बातें सुनने से मनुष्य, ईश्वर के ज्ञान, शक्ति और तत्वदर्शिता की निशानियों से अवगत होता है।