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    सूरए यूनुस, आयतें 68-73, (कार्यक्रम 338)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 68,69 और 70 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا اتَّخَذَ اللَّهُ وَلَدًا سُبْحَانَهُ هُوَ الْغَنِيُّ لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ إِنْ عِنْدَكُمْ مِنْ سُلْطَانٍ بِهَذَا أَتَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ (68) قُلْ إِنَّ الَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ لَا يُفْلِحُونَ (69) مَتَاعٌ فِي الدُّنْيَا ثُمَّ إِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ ثُمَّ نُذِيقُهُمُ الْعَذَابَ الشَّدِيدَ بِمَا كَانُوا يَكْفُرُونَ (70)अनेकेश्वरवादियों ने कहा कि ईश्वर ने अपना कोई पुत्र बनाया है, वह (इस प्रकार की बातों से) बहुत दूर है। वह आवश्यकता मुक्त है और जो कुछ आकाशों और धरती में है वह सब उसी का है, तुम्हारे पास अपने इस दावे का कोई तर्क नहीं है। क्या तुम ईश्वर पर वह आरोप लगाते हो जिसका तुम्हें ज्ञान भी नहीं है? (10:68) (हे पैग़म्बर उनसे कह) दीजिए कि जो लोग ईश्वर पर आरोप लगाते हैं वे कभी सफल नहीं हो सकेंगे (10:69) (क्योंकि) इस संसार में उनका लाभ बहुत थोड़ा है फिर उनकी वापसी हमारी ही ओर है फिर हम उन्हें उनके कुफ़्र के कारण कड़े दंड का स्वाद चखाएंगे। (10:70)पिछली जातियों यहां तक कि आज के कुछ लोगों में भी यह अंधविश्वास पाया जाता है कि वे ईश्वर के बच्चे होने की बात में आस्था रखते हैं। अनेकेश्वरवादी फ़रिश्तों को ईश्वर की बेटियां समझते थे। इतिहास में एक कालखंड में यहूदी हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम को ईश्वर का पुत्र मानते थे, इसी प्रकार ईसाई भी हज़रत ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र मानते हैं।यह ऐसी स्थिति में है कि प्रथम तो ईश्वर की कोई पत्नी नही है कि उसके कोई संतान हो, दूसरे यह कि उसे संतान की कोई आवश्यकता ही नहीं है और तीसरे यह कि जो रचना है वह ईश्वर की संतान नहीं हो सकता क्योंकि संतान अपने माता पिता की भांति होती है जबकि ईश्वर का कोई समकक्ष नहीं है।क़ुरआने मजीद इस प्रकार की निराधार बातों के बारे में कहता है कि जो लोग ऐसी बातें करते हैं उन्हें अपने दावों का उत्तर देना होगा और प्रलय के दिन ईश्वर के संबंध में अपनी इन्हीं झूठी बातों के कारण उन्हें दंडित होना पड़ेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर को एकांत से भय नहीं है कि वह उसे समाप्त करने के लिए संतान ग्रहण करे, उसे सहायता की आवश्यकता नहीं है कि सहायक रखे और उसे अपने वंश की रक्षा के लिए संतान की आवश्यकता नहीं है, वह तो आवश्यकता मुक्त है।यदि हम संसार की सीमित व अस्थाई सफलताओं की प्रलय के कड़े एवं स्थाई दंड से तुलना करें तो बहुत सी बातों और कर्मों से बचने लगेंगे।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 71 की तिलावत सुनते हैं।وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ نُوحٍ إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ يَا قَوْمِ إِنْ كَانَ كَبُرَ عَلَيْكُمْ مَقَامِي وَتَذْكِيرِي بِآَيَاتِ اللَّهِ فَعَلَى اللَّهِ تَوَكَّلْتُ فَأَجْمِعُوا أَمْرَكُمْ وَشُرَكَاءَكُمْ ثُمَّ لَا يَكُنْ أَمْرُكُمْ عَلَيْكُمْ غُمَّةً ثُمَّ اقْضُوا إِلَيَّ وَلَا تُنْظِرُونِ (71)(हे पैग़म्बर! इन लोगों को हज़रत नूह की घटना सुना दीजिए जब उन्होंने अपनी जाति से कहा। हे मेरी जाति वालो! यदि (तुम्हारे बीच) मेरा रहना और ईश्वरीय निशानियों को याद दिलाना तुम्हारे लिए कड़ा है तो मैंने ईश्वर पर भरोसा किया है (और किसी बात से भयभीत नहीं हूं) अतः तुम और तुम्हारे सहयोगी अपने विचारों को एकत्रित करो ताकि कोई बात तुमसे छिपी न रहे फिर मेरे बारे में अंतिम निर्णय करो और मुझे अवसर न दो। (10:71)हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ईश्वर के महान पैग़म्बरों में से हैं जिन्होंने वर्षों तक अपनी जाति के बीच रहकर लोगों को ईश्वर की ओर आने का निमंत्रण दिया किन्तु बहुत कम ही लोग उन पर ईमान लाए तथा अधिकांश लोग अपने कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद पर बाक़ी रहे।यह आयत कि जो मक्के में उतरी है, कड़ाई में जीवन व्यतीत कर रहे ईमान वालों को सांत्वना देती है कि वे ईश्वरीय सहायताओं पर ईमान रखें और यह जान लें कि ईश्वर उनका सहायक है। जैसा कि हज़रत नूह विरोधियों के षड्यंत्रों और धमकियों के समक्ष अकेले डटे रहे और उनकी शक्ति का परिहास करते हुए उन्होंने कहा था कि तुम सब एक हो जाओ और मेरे बारे में जो चाहो निर्णय करो किन्तु तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि मैंने अनन्य ईश्वर पर भरोसा किया है।इस आयत से हमने सीखा कि इतिहास सत्य के बाक़ी रहने और असत्य के मिट जाने का साक्षी है और अतीत का ज्ञान भविष्य के लिए मार्ग का दीपक है।अपने लक्ष्य पर ईमान, विरोधियों के समक्ष पैग़म्बरों के प्रतिरोध का सबसे बड़ा कारक रहा है यहां तक कि वे अपने लक्ष्य के मार्ग में शहादत तक से नहीं डरते थे।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 72 और 73 की तिलावत सुनते हैं।فَإِنْ تَوَلَّيْتُمْ فَمَا سَأَلْتُكُمْ مِنْ أَجْرٍ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَى اللَّهِ وَأُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ مِنَ الْمُسْلِمِينَ (72) فَكَذَّبُوهُ فَنَجَّيْنَاهُ وَمَنْ مَعَهُ فِي الْفُلْكِ وَجَعَلْنَاهُمْ خَلَائِفَ وَأَغْرَقْنَا الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُنْذَرِينَ (73)(हज़रत नूह ने अपनी जाति वालों से कहा!) तो यदि तुमने (ईश्वर के निमंत्रण की ओर) पीठ कर ली तो मैंने तुमसे बदला नहीं चाहा है, मेरे काम का बदला केवल ईश्वर देगा और मुझे आदेश दिया गया है कि मैं उसके आदेश के समक्ष नतमस्तक रहूं। (10:72) तो उन लोगों ने उन्हें झुठला दिया और हमने उन्हें और उनके साथ नौका में मौजूद लोगों को बचा लिया और उन्हें धरती में उत्तराधिकारी बना दिया और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया था उन सब को पानी में डुबा दिया तो देखो कि जिन लोगों को डराया गया था उनका परिणाम क्या हुआ? (10:73)ईश्वरीय पैग़म्बरों ने लोगों को ईश्वर की ओर बुलाने के मार्ग में न केवल अपनी जान को ख़तरे में डाला और कठिनाइयां सहन कीं बल्कि सांसारिक लाभों की भी अनदेखी की और लोगों से कोई आशा नहीं रखी, अतः वे बड़े स्पष्ट शब्दों में कहते थे कि यह मत सोचो कि यदि तुम हम पर ईमान नहीं लाते तो हमें कोई क्षति न होगी क्योंकि हमें तुम से किसी बदले और पारितोषिक की आशा नहीं है और हम वही करते हैं जिसका हमें आदेश दिया गया है।आगे चलकर आयतें विरोधियों के अंत की ओर संकेत करते हुए कहती हैं। ईश्वरीय दंड और भयानक तूफ़ान आने के साथ ही पानी ने हर स्थान को अपने घेरे में ले लिया और केवल वही लोग बच सके जो हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के साथ नौका में थे और वही लोग धरती के उत्तराधिकार बने तो उन लोगों का परिणाम इसके अतिरिक्त कुछ और नहीं होता जिन्हें ईश्वरीय दंड से डराया जाए किन्तु वे स्वीकार न करें।इन आयतों से हमने सीखा कि धर्म के प्रचार और लोगों को ईश्वर की ओर बुलाने में वही व्यक्ति सफल होता है जिसे लोगों से भौतिक आशाएं नहीं होतीं।ईश्वर पर ईमान और इस मार्ग में कटिबद्धता, काफ़िरों से मुक्ति और धरती में सत्य की सरकार की स्थापना का कारण बनती है।