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    सूरए यूनुस, आयतें 74-78, (कार्यक्रम 339)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 74 और 75 की तिलावत सुनते हैं।ثُمَّ بَعَثْنَا مِنْ بَعْدِهِ رُسُلًا إِلَى قَوْمِهِمْ فَجَاءُوهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَمَا كَانُوا لِيُؤْمِنُوا بِمَا كَذَّبُوا بِهِ مِنْ قَبْلُ كَذَلِكَ نَطْبَعُ عَلَى قُلُوبِ الْمُعْتَدِينَ (74) ثُمَّ بَعَثْنَا مِنْ بَعْدِهِمْ مُوسَى وَهَارُونَ إِلَى فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ بِآَيَاتِنَا فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا مُجْرِمِينَ (75)फिर हमने नूह के पश्चात अनेक पैग़म्बरों को उनकी जातियों की ओर भेजा और वे लोगों की ओर स्पष्ट चमत्कार लेकर आए किन्तु वे जिस बात को पहले झुठला चुके थे उस पर ईमान नहीं लाए। हम इसी प्रकार सीमा से आगे बढ़ जाने वालों के हृदयों पर ठप्पा लगा देते हैं। (10:74) फिर हमने मूसा और हारून को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों की ओर भेजा किन्तु उन्होंने अकड़ दिखाई (और पैग़म्बरों के निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया) और वे अपराधी लोग थे। (10:75)ये आयतें लोगों के मार्गदर्शन हेतु पैग़म्बरों के निरंतर भेजते रहने की ईश्वरीय परंपरा की ओर संकेत करते हुए कहती है। सभी पैग़म्बरों के पास अपनी पैग़म्बरी को सिद्ध करने के लिए ईश्वर की ओर से स्पष्ट चमत्कार थे और लोग उनकी सत्यता को समझते थे किन्तु उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि वे पापों और भ्रष्टाचारों की ओर उन्मुख थे और यह बात धर्म से मेल नहीं खाती थी।यद्यपि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के तूफ़ान के पश्चात पूरी धरती पानी में डूब गई थी और हज़रत नूह और उनके साथ नौका में सवार कुछ ईमान वालों के अतिरिक्त कोई भी जीवित नहीं बचा था किन्तु उनके पश्चात भी समय बीतने के साथ साथ काफ़िर और अनेकेश्वरवादी प्रकट हुए और ईश्वर ने लोगों के मार्गदर्शन के लिए हज़रत इब्राहीम, इस्माईल, हूद, सालेह, याक़ूब और यूसुफ़ अलैहिमुस्सलाम जैसे अनेक पैग़म्बर भेजे किन्तु लोग अपनी हठधर्मी के कारण अपना ग़लत मार्ग छोड़ने और ईमान लाने के लिए तैयार नहीं हुए।जैसा कि महान ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम अपने भाई हज़रत हारून के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास गए ताकि उसे एकेश्वरवाद का निमंत्रण दें किन्तु उन्होंने भी ईश्वरीय कथन के समक्ष अकड़ दिखाई और सत्य को स्वीकार नहीं किया।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर एक ओर तो लोगों के मार्गदर्शन के लिए पैग़म्बरों को भेजता है और दूसरी ओर मनुष्य को चयन का अधिकार देता है ताकि वह अपने मार्ग को चुन ले, वह धर्म के चयन में मनुष्य को विवश नहीं करता।अत्याचारी शक्तियों से संघर्ष, पैग़म्बरों की कार्यसूचि में सबसे आगे है। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ईश्वर की ओर बुलाने के अपने अभियान के आरंभ में फ़िरऔन के दरबार में गए और उसे ईश्वरीय धर्म का निमंत्रण दिया।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 76 और 77 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ مِنْ عِنْدِنَا قَالُوا إِنَّ هَذَا لَسِحْرٌ مُبِينٌ (76) قَالَ مُوسَى أَتَقُولُونَ لِلْحَقِّ لَمَّا جَاءَكُمْ أَسِحْرٌ هَذَا وَلَا يُفْلِحُ السَّاحِرُونَ (77)और जब हमारी ओर से उनके पास सत्य आ गया तो उन्होंने कहा कि यह तो निश्चित रूप से खुला हुआ जादू है। (10:76) मूसा ने उनके उत्तर में कहा कि क्या सत्य तुम्हारे पास आ गया है इसलिए तुम उसे जादू बता रहे हो? क्या यह जादू है? जबकि जादूगरों को मोक्ष व कल्याण प्राप्त नहीं होता। (10:77)पैग़म्बरों के विरोधियों विशेषकर कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद के सरदारों की एक शैली पैग़म्बरों और ईश्वर के प्रिय बंदों पर आरोप लगाने की रही है। क़ुरआने मजीद की आयतों के अनुसार उन्होंने लगभग सभी पैग़म्बरों पर जादूगर होने का आरोप लगाया ताकि इस माध्यम से वे पैग़म्बरों के चमत्कारों को भी एक प्रकार का धोखा व जादू बताएं और स्वयं उन्हें भी धूर्त एवं पाखंडी दर्शाएं।जब फ़िरऔन को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के स्पष्ट तर्क का सामना करना पड़ा तो उसने जादूगरों को एकत्रित करने का आदेश दिया ताकि उन्हें भी जादूगरों की पंक्ति में रखे, जबकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का तर्क यह था कि तुम लोगों ने आज तक मुझ से कोई जादू टोना नहीं देखा है तो अब जब मैं सत्य बात कह रहा हूं और उसकी पुष्टि के लिए चमत्कार प्रस्तुत कर रहा हूं तो क्यों मुझे जादूगर और मेरी बात को जादू कह रहे हो, इससे पता चलता है कि तुम वास्तविकता को स्वीकार ही नहीं करना चाहते।इन आयतों से हमने सीखा कि समाज के नेताओं को यह जान लेना चाहिए कि लोगों का एक गुट सदैव उनका विरोध करेगा, यहां तक कि उनकी बातों को असत्य दर्शाएगा।सत्य के इन्कार और इतिहास के पवित्र लोगों पर आरोप लगाने का कारण, लोगों के एक गुट की उद्दंडता और सत्य के विरोध की भावना है न कि पैग़म्बरों के तर्क की कमज़ोरी।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 78 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا أَجِئْتَنَا لِتَلْفِتَنَا عَمَّا وَجَدْنَا عَلَيْهِ آَبَاءَنَا وَتَكُونَ لَكُمَا الْكِبْرِيَاءُ فِي الْأَرْضِ وَمَا نَحْنُ لَكُمَا بِمُؤْمِنِينَ (78)उन्होंने कहा (हे मूसा) क्या तुम इस लिए आए हो कि हमें उस मार्ग से हटा दो जिस पर हमने अपने पूर्वजों को पाया है? और धरती की सत्ता और सरदारी तुम लोगों के लिए रहे? जान लो कि हम तुम दोनों पर ईमान लाने वाले नहीं हैं? (10:78)बहुत से लोग अपने पूर्वजों के आदर व सम्मान के कारण उनके रीति रिवाजों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते और सोचते हैं कि जो कुछ उनके पूर्वजों ने कहा है वही सत्य है और किसी को उसके विरुद्ध बोलने का अधिकार नहीं है। जबकि पूर्वजों का सम्मान अलग बात है और उनके विचारों और आस्थाओं का अंधा अनुसरण अलग बात है तथा अनुचित धर्मांधता और हठधर्मी और पूर्वजों के विचारों पर आग्रह सही काम नहीं है। पैग़म्बरों के विरोधी भी इस तर्क के साथ सत्य बात स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे कि उनके पूर्वज मूर्ति पूजा करते थे।इस आयत से हमने सीखा कि पूर्वजों का अंधा अनुसरण और उनकी अंधविश्वासपूर्ण आस्थाओं पर आग्रह, लोगों द्वारा पैग़म्बरों के मत के विरोध का मुख्य कारण है।अतीत के लोगों की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा अलग बात है और उनकी ग़लत आस्थाओं का अनुसरण अलग विषय है। आज मिस्र के फ़िरऔनों के मक़बरों की रक्षा की जाती है किन्तु लोग उनके अत्याचारपूर्ण व्यवहार और ग़लत विचारों को स्वीकार नहीं करते।