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    सूरए यूनुस, आयतें 79-86, (कार्यक्रम 340)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 79 और 80 की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ فِرْعَوْنُ ائْتُونِي بِكُلِّ سَاحِرٍ عَلِيمٍ (79) فَلَمَّا جَاءَ السَّحَرَةُ قَالَ لَهُمْ مُوسَى أَلْقُوا مَا أَنْتُمْ مُلْقُونَ (80)और फ़िरऔन ने कहा कि हर दक्ष जादूगर को मेरे पास लाओ (10:79) तो जब जादूगर आए तो मूसा ने उनसे कहा कि तुम (जादू के जो साधन भी) फेंक सकते हो फेंको। (10:80)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को ईश्वर की ओर से आदेश दिया गया कि वे अपनी पैग़म्बरी के आरंभ में ही फ़िरऔन के पास जाएं और उसे एकेश्वरवाद का निमंत्रण दें और बनी इस्राईल को फ़िरऔन और उसके लोगों के अत्याचार से छुटकारा दिलाएं।ये आयतें कहती हैं कि फ़िरऔन ने, जिसके पास हज़रत मूसा की तर्कसंगत बातों का सामना करने की क्षमता नहीं थी, हज़रत मूसा के चमत्कार को जादू बताया और मुक़ाबला करने के लिए जादूगरों को अपने पास बुलाया किन्तु हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जिन्हें अपनी बातों की सत्यता में कोई संदेह नहीं था, उन्हें प्रस्ताव दिया कि वे जो कुछ कर सकते हैं करें ताकि लोग देखें और निर्णय करें।इन आयतों से हमने सीखा कि दुष्ट अत्याचारी, अपने घृणित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए विद्वानों एवं विशेषज्ञों से अनुचित लाभ उठाते हैं।पैग़म्बरों को अपने मार्ग और ईश्वरीय सहायताओं पर विश्वास होता है अतः वे दृढ़ता पूर्वक बात करते हैं और विरोधियों को चुनौती देते हैं।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 81 और 82 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا أَلْقَوْا قَالَ مُوسَى مَا جِئْتُمْ بِهِ السِّحْرُ إِنَّ اللَّهَ سَيُبْطِلُهُ إِنَّ اللَّهَ لَا يُصْلِحُ عَمَلَ الْمُفْسِدِينَ (81) وَيُحِقُّ اللَّهُ الْحَقَّ بِكَلِمَاتِهِ وَلَوْ كَرِهَ الْمُجْرِمُونَ (82)तो जब जादूगरों ने (अपने जादू के साधन) फेंके तो मूसा ने कहा। जो कुछ तुम लाए थे वह जादू था और ईश्वर शीघ्र ही उसे ग़लत सिद्ध कर देगा। निसंदेह ईश्वर बुरे लोगों के कर्म को नहीं सुधारता (10:81) और ईश्वर अपने शब्दों को सिद्ध कर देता है चाहे अपराधियों को बुरा ही क्यों न लगे। (10:82)जैसा कि क़ुरआने मजीद के सूरए शोअरा में भी कहा गया है कि फ़िरऔन के जादूगरों ने अपनी रस्सियों और लाठियों को ज़मीन पर फेंका और कहा कि फ़िरऔन की सौगंध विजय हमारी ही होगी। स्पष्ट है कि उन्होंने इन रस्सियों और लाठियों की मूल वास्तविकता को परिवर्तित नहीं किया था बल्कि केवल एक प्रकार की नज़रबंदी की थी जिससे लोगों ने रस्सियों और लाठियों को सांप की भांति रेंगते हुए देखा।यही कारण था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने बड़ी दृढ़ता से घोषणा कि कि ईश्वर उनके जादू को ग़लत सिद्ध करके सत्य को स्पष्ट कर देगा और वह भी अपने शब्दों के माध्यम से जिनसे अपराधी चिढ़ते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि असत्य में अधिक चकाचौंध होती है किन्तु अंततः उसे जाना ही होता है और ईश्वर उसे बाक़ी रहने की अनुमति नहीं देता।सत्य के मोर्चे की विजय को रोकने के संबंध में साम्राज्यवादियों की इच्छा, ईश्वर के इरादे के समक्ष प्रभावहीन है और ईश्वर ने वचन दिया है कि वह सत्य का समर्थन एवं उसे सुदृढ़ करेगा।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 83 की तिलावत सुनते हैं।فَمَا آَمَنَ لِمُوسَى إِلَّا ذُرِّيَّةٌ مِنْ قَوْمِهِ عَلَى خَوْفٍ مِنْ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِمْ أَنْ يَفْتِنَهُمْ وَإِنَّ فِرْعَوْنَ لَعَالٍ فِي الْأَرْضِ وَإِنَّهُ لَمِنَ الْمُسْرِفِينَ (83)(निमंत्रण के आरंभ में) उनकी जाति की संतान के एक छोटे से गुट के अतिरिक्त कोई भी मूसा पर ईमान नहीं लाया और वह भी फ़िरऔन और उसके सरदारों के भय से कि कहीं वे उन्हें यातना न देने लगे और निसंदेह फ़िरऔन धरती में बड़ाई जताता था और वह अपनी सीमा से बढ़ जाने वाला भी था। (10:83)हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर की ओर निमंत्रण के पहले चरण में फ़िरऔन और उसके दरबार वालों को समझाया, दूसरे चरण मे जादूगरों से मुक़ाबला किया और तीसरे चरण मे बनी इस्राईल के समक्ष अपने अभियान का प्रचार किया। आरंभ में उनकी जाति के केवल कुछ युवा ही उन पर ईमान लाए। अलबत्ता उन्हें फ़िरऔन तथा उसके लोगों की ओर से अत्यधिक यातनाएं सहन करनी पड़ती थीं और ऐसा थी होता था कि उनमें से कुछ भारी यातनाओं और कुप्रचारों के दबाव के चलते पथभ्रष्ट हो जाते और सत्य का मार्ग छोड़कर अपने पिछले मत की ओर लौट जाते।इस आयत से हमने सीखा कि पहला गुट जो हज़रत मूसा पर ईमान लाया, युवाओं का था जिनके हृदय पवित्र और विचार दूषित न थे।फ़िरऔन के नेतृत्व वाली अत्याचारी शासन व्यवस्था में रहकर भी वातावरण से प्रभावित नहीं हुआ जा सकता और सत्य पर ईमान लाया जा सकता है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 84,85 और 86 की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ مُوسَى يَا قَوْمِ إِنْ كُنْتُمْ آَمَنْتُمْ بِاللَّهِ فَعَلَيْهِ تَوَكَّلُوا إِنْ كُنْتُمْ مُسْلِمِينَ (84) فَقَالُوا عَلَى اللَّهِ تَوَكَّلْنَا رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِلْقَوْمِ الظَّالِمِينَ (85) وَنَجِّنَا بِرَحْمَتِكَ مِنَ الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ (86)मूसा ने कहा कि हे मेरी जाति वालों यदि तुम ईश्वर पर ईमान लाए हो और उसके समक्ष नतमस्तक हो तो केवल उसी पर भरोसा करो। (10:84) तो उन्होंने कहा कि हमने ईश्वर पर भरोसा किया है। हे हमारे पालनहार हमें अत्याचारी गुट की परीक्षाओं और यातनाओं में ग्रस्त न कर (10:85) तथा अपनी दया से हमें काफ़िरों से मुक्ति दिला दे। (10:86)हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम, फ़िरऔन और उसके लोगों की भारी यातनाओं के समक्ष अपनी जाति के लोगों को ईश्वर पर भरोसा करने की सिफ़ारिश करते हैं और इसे ईमान और इस्लाम का अटूट अंग बताते हैं।जो लोग हज़रत मूसा पर ईमान लाए थे उन्होंने उनकी बातें सुनीं और कहा कि हम केवल ईश्वर पर भरोसा करते हैं और उसके अतिरिक्त हमारी कोई शरण नहीं है। हम उसी की शरण में आए हैं और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमें काफ़िरों और अत्याचारियों से मुक्ति दे।इन आयतों से हमने सीखा कि कठिनाइयों और दुखों में ईमान वाले व्यक्ति का एक मात्रा सहारा ईश्वर होता है कि जिस पर भरोसा करके और उसके आदेशों का पालन करके कठिनाइयों को पीछे छोड़ा जा सकता है।कठिनाइयों से बाहर निकलने का एक मार्ग, ईश्वर के समक्ष गिड़गिड़ाना और प्रार्थना करना है क्योंकि यदि प्रार्थना लाभदायक न होती तो ईश्वर हम से उसकी सिफ़ारिश न करता।