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    सूरए यूनुस, आयतें 87-92, (कार्यक्रम 341)

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    आइये पहले सूरए यूनुस की आयत संख्या 87 की तिलावत सुनते हैं।وَأَوْحَيْنَا إِلَى مُوسَى وَأَخِيهِ أَنْ تَبَوَّآَ لِقَوْمِكُمَا بِمِصْرَ بُيُوتًا وَاجْعَلُوا بُيُوتَكُمْ قِبْلَةً وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِنِينَ (87)और हमने मूसा और उनके भाई (हारून) के पास अपना विशेष संदेश भेजा कि मिस्र में अपनी जाति के लिए घर तैयार करो और अपने घरों को आमने सामने बनाओ और नमाज़ क़ायम करो और ईमान वालों को (विजय) की शुभ सूचना दे दो। (10:87)बनी इस्राईल को फ़िरऔन के चंगुल से मुक्त कराने के पश्चात ईश्वर की ओर से हज़रत मूसा को आदेश दिया गया कि वे उन लोगों को एक स्थान पर ले जाएं और उनकी सहायता से उनके लिए घर बनाएं। यह घर भी अलग अलग नहीं बल्कि आमने सामने बनाए जाएं ताकि वे सरलता से एकत्रित होकर सामाजिक निर्णय ले सकें और यदि फ़िरऔन उन्हें तबाह करने का प्रयास करे तो उसका मुक़ाबला कर सकें।अलबत्ता क़ुरआने मजीद के कुछ व्याख्याकारों का मानना है कि इस आयत में नमाज़ के आदेश के दृष्टिगत “क़िबलतन” शब्द का तात्पर्य घरों को क़िबले की दिशा में निर्मित करना है ताकि बनी इस्राईल के लोग अपने घरों में भी उपासना कर सकें किन्तु यह इस शब्द का पारिभाषिक अर्थ है और शब्दकोष में क़िब्ला का अर्थ आमने सामने है।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बर लोगों के प्रति सहानुभूति रखते थे और उनकी सहायता के लिए आवश्यक काम करते थे।भौतिक एवं विलासितापूर्ण मामलों पर ध्यान हमें नमाज़ और ईश्वर की उपासना से दूर न कर दे। इन्हीं कर्मों से ईश्वरीय अनुकंपाएं प्राप्त होती हैं।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 88 और 89 की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ مُوسَى رَبَّنَا إِنَّكَ آَتَيْتَ فِرْعَوْنَ وَمَلَأَهُ زِينَةً وَأَمْوَالًا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا رَبَّنَا لِيُضِلُّوا عَنْ سَبِيلِكَ رَبَّنَا اطْمِسْ عَلَى أَمْوَالِهِمْ وَاشْدُدْ عَلَى قُلُوبِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُوا حَتَّى يَرَوُا الْعَذَابَ الْأَلِيمَ (88) قَالَ قَدْ أُجِيبَتْ دَعْوَتُكُمَا فَاسْتَقِيمَا وَلَا تَتَّبِعَانِّ سَبِيلَ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ (89)और मूसा ने कहाः हे हमारे पालनहार तूने फ़िरऔन और उसके सरदारों को सांसारिक जीवन में अत्यधिक धन संपत्ति और शोभा के साधन दिए हैं, प्रभुवर वे लोगों को तेरे मार्ग से भटका रहे हैं, प्रभुवर उनके माल को नष्ट कर दे और उनके हृदयों को कड़ा कर दे ताकि वे कड़ा दंड पाने तक ईमान न लाएं। (10:88) (ईश्वर) ने कहा कि तुम दोनों की प्रार्थना स्वीकार हो गई तो तुम दोनों डटे रहो और अज्ञानी लोगों के मार्ग पर न चलो। (10:89)हज़रत मूसा ने फ़िरऔन से संघर्ष जारी रखने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की कि वह फ़िरऔन और उसके लोगों की असीमित धन संपत्ति को नष्ट कर दे और उन्हें इस बात की अनुमति न दे कि वे इससे अधिक उद्दंडता और अतिक्रमण करें और धन संपत्ति के कारण अपनी सत्ता का दुरुपयोग करें और धन संपत्ति को लोगों को पथभ्रष्ट करने हेतु प्रयोग करें।अलबत्ता हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का यह श्राप उस समय था जब उन्हें फ़िरऔन और उसके लोगों के ईमान लाने में तनिक भी आशा नहीं रह गई और उसके द्वारा सत्य को स्वीकार करने की कोई संभावना नहीं थी क्योंकि दंड को देखने के पश्चात ईमान का कोई मूल्य नहीं है और न ही उसका कोई लाभ होता है।ईश्वर ने हज़रत मूसा की इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उन्हें अपने मार्ग पर दृढ़तापूर्वक डटे रहने का निमंत्रण दिया, मानो प्रार्थना स्वीकार होने की शर्त, सही व सच्चे मार्ग पर ईमान वालों का डटे रहना है। इतिहास में वर्णित है कि हज़रत मूसा के श्राप के चालीस वर्षों के बाद फ़िरऔन अपनी सेना सहित नदी में डूब गया।इन आयतों से हमने सीखा कि धन संपत्ति ईश्वर की दया व कृपा का चिन्ह नहीं है क्योंकि ईश्वर इस संसार में काफ़िरों को भी धन संपत्ति प्रदान करता है।अपनी प्रार्थनाओं में अत्याचारियों की तबाही की दुआ करनी चाहिए, अलबत्ता अपने दायित्वों के निर्वाह के साथ।शत्रु के साथ संघर्ष में ईश्वरीय व धार्मिक नेताओं का अनुसरण करना चाहिए और अज्ञानता पूर्ण विचारों से बचना चाहिए।आइये अब सूरए यूनुस की 90,91 और 92 की तिलावत सुनते हैं।وَجَاوَزْنَا بِبَنِي إِسْرَائِيلَ الْبَحْرَ فَأَتْبَعَهُمْ فِرْعَوْنُ وَجُنُودُهُ بَغْيًا وَعَدْوًا حَتَّى إِذَا أَدْرَكَهُ الْغَرَقُ قَالَ آَمَنْتُ أَنَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا الَّذِي آَمَنَتْ بِهِ بَنُو إِسْرَائِيلَ وَأَنَا مِنَ الْمُسْلِمِينَ (90) آَلْآَنَ وَقَدْ عَصَيْتَ قَبْلُ وَكُنْتَ مِنَ الْمُفْسِدِينَ (91) فَالْيَوْمَ نُنَجِّيكَ بِبَدَنِكَ لِتَكُونَ لِمَنْ خَلْفَكَ آَيَةً وَإِنَّ كَثِيرًا مِنَ النَّاسِ عَنْ آَيَاتِنَا لَغَافِلُونَ (92)और हमने बनी इस्राईल को समुद्र पार करा दिया और फ़िरऔन तथा उसकी सेना ने अत्याचार और शत्रुता के इरादे से उनका पीछा किया यहां तक वह डूबने लगा और उसने कहा कि मैं ईमान लाया कि उसके सिवा कोई पूज्य नहीं है जिस पर बनी इस्राईल वाले ईमान लाए हैं और मैं नतमस्तक होने वालों में से हूं। (10:90) (उससे कहा गया) क्या अब? जबकि इससे पहले तूने अवज्ञा की थी कि और तू बिगाड़ फैलाने वालों में था। (10:91) तो आज हम तेरे शरीर को बचाएंगे ताकि तू अपने बाद वालों के लिए निशानी रहे। निसंदेह अधिकतर लोग हमारी निशानियों की ओर से निश्चेत हैं। (10:92)ये आयतें हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की प्रार्थना के स्वीकार होने की शैली का वर्णन करते हुए कहती हैं। जब फ़िरऔन की सेना ने तुम्हें तबाह करने के लिए तुम्हारा पीछा किया तो हमने नील नदी के पानी को तुम्हारे लिए फाड़ दिया और तुम्हें उसके पार पहुंचा दिया किन्तु फ़िरऔन और उसकी सेना को उसमें डुबा दिया और केवल फ़िरऔन के मृत शरीर को पानी से बाहर निकाल लिया ताकि आगामी पीढ़ियों के लिए पाठ रहे।रोचक बात यह है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की भविष्यवाणी पूरी हुई और जब फ़िरऔन ने जीवन के अंतिम क्षणों में मृत्यु को सामने देखा तो कहा कि प्रभुवर मैं ईमान लाया किन्तु उसे उत्तर मिला कि अब जब तू मृत्यु के निकट पहुंच गया है तो तौबा कर रहा है और सत्य को स्वीकार करने की बात कर रहा है।इन आयतों से हमने सीखा कि अत्याचारियों से संघर्ष में ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए कि जो जटिल परिस्थितियों में भी हमें अकेला नहीं छोड़ता। यदि हम ईश्वर के मार्ग पर अडिग रहें तो अत्याचारी शक्तियों के पास हथियार डालने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं होगा और उन्हें उनके किए का दंड अवश्य मिलेगा।पिछली जातियों के बीच ईश्वर की शक्ति की निशानियों की रक्षा करने का प्रयास करना चाहिए कि जो आगामी पीढ़ियों के लिए पाठ हैं।