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    सूरए यूनुस, आयतें 93-97, (कार्यक्रम 342)

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    आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 93 की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ بَوَّأْنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ مُبَوَّأَ صِدْقٍ وَرَزَقْنَاهُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِ فَمَا اخْتَلَفُوا حَتَّى جَاءَهُمُ الْعِلْمُ إِنَّ رَبَّكَ يَقْضِي بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ (93)निश्चित रूप से हमने बनी इस्राईल को उचित ठिकाना प्रदान किया और पवित्र वस्तुओं में से उन लोगों को रोज़ी दी किन्तु उन्होंने उनके पास ज्ञान आ जाने के पश्चात मतभेद किया। निसंदेह तुम्हारा पालनहार प्रलय के दिन उनके बीच उस बात का फ़ैसला कर देगा जिसके बारे में वे मतभेद करते थे। (10:93)इस आयत में ईश्वर उनकी अनुकंपाओं की ओर संकेत करते हुए जो उसने बनी इस्राईल को प्रदान की थीं, कहता है कि वर्षों तक भटकने के पश्चात हमने उन्हें तत्कालीन सीरिया का हरा भरा और उपजाऊ क्षेत्र प्रदान किया और उन्हें खाने पीने की उत्तम वस्तुएं दीं किन्तु उन्होंने कृतज्ञता प्रकट करने और ईश्वरीय आदेशों के पालन के स्थान पर आपस में मतभेद और विवाद आरंभ कर दिया तथा हर एक ने एक अलग मार्ग अपना लिया अतः प्रलय के दिन उन्हें अपने इस अप्रिय कर्म का उत्तर देना होगा।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों की शिक्षाओं का पालन करने से नैतिक प्रगति तो होती ही है, लोगों के भौतिक जीवन के आयामों पर भी ध्यान दिया जाता है तथा लोग स्वाधीनता, स्वतंत्रता, जीवन की आवश्यक संभावनाओं और पवित्र रोज़ी को प्राप्त कर लेते हैं।मतभेद और विवाद ईश्वरीय धर्म से लोगों की दूरी के कारण होता है और ईश्वरीय अनुकंपाओं को नष्ट कर देता है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 94 और 95 की तिलावत सुनते हैं।فَإِنْ كُنْتَ فِي شَكٍّ مِمَّا أَنْزَلْنَا إِلَيْكَ فَاسْأَلِ الَّذِينَ يَقْرَءُونَ الْكِتَابَ مِنْ قَبْلِكَ لَقَدْ جَاءَكَ الْحَقُّ مِنْ رَبِّكَ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُمْتَرِينَ (94) وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِ اللَّهِ فَتَكُونَ مِنَ الْخَاسِرِينَ (95)तो जो कुछ हमने तुम पर उतारा है यदि उसमें तुम्हें संदेह हो तो उनसे पूछो जो तुमसे पूर्व आसमानी किताबें पढ़ते थे, निसंदेह सत्य तुम्हारे पालनहार की ओर से आ चुका है तो संदेह करने वालों में शामिल न हो। (10:94) और उन लोगों में भी न होना कि जिन्होंने ईश्वरीय आयतों को झुठलाया (कि ऐसी स्थिति में) तुम घाटा उठाने वालों में हो जाओगे। (10:95)ये आयतें उन लोगों को संबोधित करते हुए जो पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की सत्यता में संदेह करते हैं, कहती हैं कि यदि तुम पिछली आसमानी किताबों को देखो तो तुम्हें उनके बारे में निशानियां और शुभ समाचार मिल जाएंगे। इसके अतिरिक्त बनी इस्राईल जैसी अनेक जातियों का वर्णन तुम्हें उन किताबों में मिल जाएगा जिनका उल्लेख क़ुरआने मजीद में हुआ है जिससे तुम्हें ज्ञान हो जाएगा कि यह किताब भी उसी ईश्वर की ओर से आई है और इसकी सत्यता को समझ जाओगे।स्पष्ट है कि यदि तुम्हारा संदेह समाप्त हो गया और तुम यह समझ गए कि क़ुरआने मजीद सत्य है तो फिर उसे झुठलाने से स्वयं तुम्हीं को क्षति होगी और तुम इस संसार में क़ुरआने मजीद के मार्गदर्शन से वंचित हो जाओगे।यद्यपि इस आयत के शब्दों से पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को संबोधित किया गया है किन्तु स्पष्ट है कि वास्तविक संबोधन उनसे नहीं है क्योंकि प्रथम तो यह कि इस बात का कोई अर्थ ही नहीं है कि पैग़म्बर आसमानी पुस्तक की सत्यता में संदेह करें और दूसरे यह कि यदि वे संदेह करें भी तो किस प्रकार अपनी बातों को झुठला सकते हैं कि ईश्वर उनसे कहे कि झुठलाने वालों में से न हो जाना? अतः आयत के संबोधन का पात्र अनेकेश्वरवादी और आसमानी पुस्तक रखने वाले हैं किन्तु क़ुरआने मजीद की अनेक आयतों की भांति पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित किया गया है किन्तु आयत का वास्तविक तात्पर्य आम लोग हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि संदेह एक स्वाभाविक बात है जो किसी के भी साथ हो सकती है, महत्त्वपूर्ण बात धर्मगुरूओं और विद्वानों से संपर्क करके संदेह के चरण से निकलना और विश्वास के चरण तक पहुंचना है।यदि मनुष्य संदेह में पड़ा रहे और उसे समाप्त करने का प्रयास न करे तो संभव है कि इसका परिणाम सत्य के इन्कार के रूप में सामने आएगा।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 96 और 97 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ حَقَّتْ عَلَيْهِمْ كَلِمَةُ رَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ (96) وَلَوْ جَاءَتْهُمْ كُلُّ آَيَةٍ حَتَّى يَرَوُا الْعَذَابَ الْأَلِيمَ (97)निश्चित रूप से जिन लोगों के विरुद्ध तुम्हारे पालनहार का आदेश (उनके आपराधों के कारण) व्यवहारिक हो चुका है, वे ईमान नहीं लाएंगे (10:96) और यदि उनके समक्ष हर प्रकार की ईश्वरीय निशानी या चमत्कार आ जाए (तब भी वे ईमान नहीं लाएंगे) यहां तक कि वे ईश्वर के अत्यंत पीड़ादायक दंड को देख लें। (10:97)धार्मिक वास्तविकताओं के संबंध में लोगों के तीन गुट हैं। एक गुट वास्तविकता को नहीं समझता और समझना भी नहीं चाहता। दूसरा गुट वास्तविकता को नहीं समझता किन्तु उसे समझने का प्रयास करता है जबकि तीसरा गुट ऐसे लोगों का है जो वास्तविकता को समझ गए हैं किन्तु उसे स्वीकार नहीं करना चाहते क्योंकि वह उनके सांसारिक एवं भौतिक हितों के अनुकूल नहीं है।ये आयतें तीसरे गुट के संबंध में हैं जिनके हृदय सत्य और वास्तविकता से द्वेष और हठधर्मी के कारण काले और पत्थर के हो गए हैं और उनके ईमान लाने की कोई आशा नहीं बची है। सैद्धांतिक रूप से यह लोग ईश्वरीय कोप का पात्र हैं और जब तक ईश्वरीय दंड को अपनी आंखों से न देख लें ईमान लाने के लिए तैयार नहीं होंगे।इन लोगों की समस्या बौद्धिक तर्क या ईश्वरीय चमत्कार का आभाव नहीं है क्योंकि इस प्रकार के जितने भी तर्क या चमत्कार इनके समक्ष प्रस्तुत किए जाएं ये स्वीकार नहीं करेंगे, इनकी वास्तविक समस्या सत्तालोलुपता और आंतरिक इच्छाएं हैं जो इन्हें समझने और स्वीकार करने की अनुमति नहीं देतीं। इस आधार पर यदि हम देखते हैं कि बहुत से लोग ईमान नहीं लाते तो हमें ईश्वरीय किताब और पैग़म्बरों की सत्यता में संदेह नहीं करना चाहिए बल्कि हमें यह समझना चाहिए कि एक गुट इतना भ्रष्ट हो चुका है कि उस पर किसी बात का प्रभाव नहीं होता और कोई भी सत्य बात उनमें परिवर्तन नहीं लाती। उस गेंद की भांति जिसे समुद्र में भी डाल दिया जाए तो उसके भीतर पानी की एक बूंद तक नहीं जाती। यह गेंद के बंद होने का चिन्ह है अन्यथा समुद्र मे पानी ही पानी है और सभी के अधिकार में है।इन आयतों से हमने सीखा कि सभी लोगों के ईमान लाने की आशा नहीं रखनी चाहिए और यह समझना चाहिए कि पाप और भ्रष्टाचार सत्य के इन्कार का कारण बनता है।उद्दंडी और अहंकारी लोग भी एक दिन वास्तविकता को समझ जाते हैं किन्तु क्या लाभ कि देर हो चुकी होती है उनका यह कर्म स्वीकार नहीं होता।