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    सूरए यूनुस, आयतें 98-100, (कार्यक्रम 343)

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    आइये पहले सूरए यूनुस की आयत संख्या 98 की तिलावत सुनते हैं।فَلَوْلَا كَانَتْ قَرْيَةٌ آَمَنَتْ فَنَفَعَهَا إِيمَانُهَا إِلَّا قَوْمَ يُونُسَ لَمَّا آَمَنُوا كَشَفْنَا عَنْهُمْ عَذَابَ الْخِزْيِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَمَتَّعْنَاهُمْ إِلَى حِينٍ (98)तो ऐसी कोई बस्ती क्यों नहीं है जो (सही समय पर) ईमान लाती कि उसका ईमान उसे लाभ पहुंचाता सिवाय यूनुस की जाति के (लोगों के जो अंतिम समय में ईमान लाए और) हमने सांसारिक जीवन से उनके लिए अपमान जनक दंड को समाप्त कर दिया और एक निर्धारित अवधि के लिए उन्हें संपन्न बना दिया। (10:98)जैसा कि हमने पिछले कार्यक्रमों में कहा था कि ईश्वर की परंपरा यह है कि वह लोगों को मोहलत और समय देता रहता है ताकि उनके पास तौबा व प्रायश्चित का मार्ग रहे और वे अतीत की अपनी भूलों को सुधारें और भले कर्म करके उनकी क्षतिपूर्ति कर सकें, किन्तु ईश्वर की मोहलत मृत्यु या ईश्वरीय दंड आने से पहले तक ही बाक़ी रहती है और फिर ईमान लाने या तौबा करने का कोई लाभ नहीं होता क्योंकि यह ईमान या तौबा अधिकार से नहीं बल्कि भय के कारण है।यह ईश्वरीय परंपरा जातियों और समुदायों के संबंध में भी रही है, सभी जातियों के बीच केवल हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम की जाति के लोग थे जो ईश्वरीय दंड के चिन्ह देखने के पश्चात ईमान लाए और ईश्वर ने भी उनके ईमान को स्वीकार करते हुए उन्हें और अधिक समय दिया।इतिहास में वर्णित है कि हज़रत यूनुस द्वारा वर्षों तक प्रचार करने के बावजूद केवल दो ही लोग ईमान लाए। अपने अंतिम समय में वे लोगों के ईमान लाने की ओर से निराश हो गए और उन्होंने अपनी जाति के लोगों को श्राप दिया और उनके बीच से चले गए।ईश्वर, पैग़म्बरों की प्रार्थना या श्राप को अवश्य स्वीकार करता है और उसकी ओर से दंड आना चाहिए किन्तु हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम पर ईमान लाने वाले दो व्यक्तियों में से एक ने उनके श्राप को सुनकर लोगों से कहा कि अब तुम्हें ईश्वरीय दंड की प्रतीक्षा में रहना चाहिए और यदि तुम ईश्वर की दया चाहते हो तो नगर से बाहर निकल जाओ, बच्चों को अपने से अलग कर दो ताकि बच्चों और उनकी माताओं के रोने और गिड़गिड़ाने की आवाज़ उठने लगे और तुम सब अपने पापों पर तौबा करो शायद ईश्वर तुम्हें क्षमा कर दे। लोगों ने ऐसा ही किया और दंड नहीं आया तथा हज़रत यूनुस अपनी जाति के लोगों के पास लौट आए।इस आयत से हमने सीखा कि पिछली जातियों के बीच केवल हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम की जाति थी जिसने सही समय पर और ईश्वरीय दंड आने से पहले तौबा की और ईश्वर पर ईमान लाई।लोगों का भविष्य स्वयं उन्हीं के हाथ में है और दुआ व प्रार्थना के माध्यम से संकटों को टाला और ईश्वरीय दया को प्राप्त किया जा सकता है।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 99 की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ شَاءَ رَبُّكَ لَآَمَنَ مَنْ فِي الْأَرْضِ كُلُّهُمْ جَمِيعًا أَفَأَنْتَ تُكْرِهُ النَّاسَ حَتَّى يَكُونُوا مُؤْمِنِينَ (99)और यदि आपका पालनहार चाहता तो धरती के सारे ही लोग (विवशतापूर्वक) ईमान ले आते? क्या आप लोगों को ईमान लाने पर विवश करना चाहते हैं? (10:99)ईश्वर ने लोगों के मार्गदर्शन को अपने लिए अनिवार्य कर रखा है किन्तु वह यह नहीं चाहता कि लोगों को ईमान लाने पर विवश करे बल्कि उसने उन्हें अधिकार दिया है कि चाहें तो स्वीकार करें और चाहें तो इन्कार कर दें। अलबत्ता स्वाभाविक है कि मनुष्य जिस बात का भी चयन करेगा, उसके परिणामों का उसे अवश्य सामना करना पड़ेगा।यद्यपि ईश्वर ने मनुष्य को सही मार्ग दिखा दिया है किन्तु उसने मार्ग के चयन में लोगों को स्वतंत्र रखा है। चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम लोगों के ईमान लाने पर आग्रह करते थे और उनके कुफ़्र के कारण दुखी रहते थे अतः इस आयत में ईश्वर ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा है कि इस बात की आशा नहीं रखनी चाहिए कि सभी लोग विवशतापूर्वक ईमान ले आएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि अपनी इच्छा और अधिकार के साथ लाया गया ईमान मूल्यवान होता है, विवश्तापूर्वक और ज़ोर ज़बरदस्ती के साथ लाया गया ईमान वास्तविक ईमान नहीं होता।पैग़म्बरे इस्लाम को लोगों के मार्गदर्शन की इतनी चिंता थी कि ईश्वर ने उन्हें सांत्वना दी।आइये अब सूरए यूनुस की आयत संख्या 100 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَنْ تُؤْمِنَ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ وَيَجْعَلُ الرِّجْسَ عَلَى الَّذِينَ لَا يَعْقِلُونَ (100)और ईश्वर की अनुमति के बिना कोई भी ईमान नहीं ला सकता और उसने अपवित्रता ऐसे लोगों के लिए रखी है जो सोच विचार नहीं करते। (10:100)स्पष्ट है कि लोग ईश्वर पर ईमान लाने के लिए विवश नहीं हैं और सैद्धांतिक रूप से विवशतावश लाए गए ईमान का कोई मूल्य नहीं है किन्तु ईमान लाने और मार्गदर्शन प्राप्त करने का मार्ग भी ईश्वर की ही ओर से प्रशस्त होता है, अर्थात वह मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध कराता है अतः हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि ईमान लाना और मार्गदर्शन प्राप्त करना भी हमारे हाथ में है कि हम उस पर घमंड करने लगें।हमारा ईश्वर पर कोई उपकार नहीं है बल्कि उसने हम पर उपकार करके मार्गदर्शन के साधन हमारे लिए उपलब्ध कराए हैं। यदि कोई पैग़म्बरों और आसमानी किताबों के स्पष्ट तर्क को स्वीकार न करे और ईश्वरीय किताब की आयतों में चिंतन करने के लिए तैयार न हो तो वह कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद की बुराई में ग्रस्त हो जाएगा और कल्याण प्राप्त नहीं कर सकेगा। अलबत्ता इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी इच्छा को ईश्वर की इच्छा पर विजय प्राप्त हो गई है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की कृपा और ईमान लाने का अवसर उन ही लोगों को प्राप्त होता है जो चिंतन और सोच विचार करते हैं और जो अपनी इच्छा व अधिकार के साथ बुद्धि व तर्क की बात को स्वीकार न करे और अपनी आंतरिक इच्छाओं में ग्रस्त हो जाए तो वह ईश्वर के कोप का पात्र बनता है।स्वस्थ बुद्धि, ईमान का मार्ग प्रशस्त करती है तथा ईमान का आभाव मूर्खता का चिन्ह है। ईमान वाला, बुद्धिमान होता है और बुद्धिमान, ईमान वाला होता है।