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    सूरए यूसुफ़, आयतें 1-3, (कार्यक्रम 374)

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    पिछले कार्यक्रम में सूरए हूद की संक्षिप्त व्याख्या समाप्त हुई। आज से हम सूरए यूसुफ़ की व्याख्या आरंभ करेंगे जिसमें ईश्वरीय दूत हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के जीवन की विभिन्न उतार चढ़ाव भरी घटनाओं का उल्लेख है। क़ुरआने मजीद के अन्य सूरों के विपरीत जिनमें आस्था, शिष्टाचार और धार्मिक आदेशों संबंधी बातों और पिछले पैग़म्बरों तथा जातियों के वृत्तांत का उल्लेख किया गया है, इस सूरए में केवल हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की घटना का निरंतरता के साथ वर्णन है और अन्य विषयों की ओर संकेत नहीं किया गया है।हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की जीवनी का उल्लेख तौरैत में भी है किन्तु उसमें और क़ुरआने मजीद में बहुत अंतर है। हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के बारे में क़ुरआने मजीद की आयतों पर ध्यान देने से इस ईश्वरीय किताब की सत्यता अधिक स्पष्ट और सिद्ध हो जाती है और कुछ अन्य पुस्तकों में इस घटना में फेर बदल किए जाने को भलिभांति समझा जा सकता है, तो आइये पहले सूरए यूसुफ़ की पहली और दूसरी आयत की तिलावत सुनते हैं। بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ الر تِلْكَ آَيَاتُ الْكِتَابِ الْمُبِينِ (1) إِنَّا أَنْزَلْنَاهُ قُرْآَنًا عَرَبِيًّا لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ (2)अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावन है। अलिफ़ लाम रा। यह स्पष्ट करने वाली किताब की आयतें हैं। (12: 1) निश्चित रूप से हमने क़ुरआन को अरबी भाषा में उतारा है, शायद तुम लोग चिंतन करो। (12: 2)यह सूरा भी क़ुरआने मजीद के 29 अन्य सूरों की भांति हुरूफ़े मुक़त्तेआत अर्थात भिन्न भिन्न अक्षरों से आरंभ हुआ है। ये अक्षर वस्तुतः ईश्वर और उसके पैग़म्बर के बीच रहस्य हैं किन्तु साथ ही ये एक प्रकार से क़ुरआन के ईश्वरीय चमत्कार होने को भी दर्शाते हैं क्योंकि इनमें से अधिकांश सूरों में हुरूफ़े मुक़त्तेआत के बाद क़ुरआने मजीद और उसकी महानता की बात कही गई है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर ने अपने चमत्कार अर्थात क़ुरआने मजीद को इन्हीं साधारण से अक्षरों के माध्यम से उतारा है। यदि तुम में भी क्षमता हो तो इन्हीं अक्षरों से क़ुरआन जैसी किताब ला कर दिखाओ।इन आयतों में दो महत्त्वपूर्ण बिंदुओं की ओर संकेत किया गया है, प्रथम यह कि क़ुरआने मजीद स्पष्ट करने वाली किताब है, ऐसी किताब जो सत्य के मार्ग को स्पष्ट करती है और जीवन के मार्ग का दीपक जिसके प्रकाश से गंतव्य तक पहुंचा जा सकता है।दूसरे यह कि सभी का दायित्व है कि क़ुरआने मजीद की आयतों में चिंतन और सोच विचार करें और अपनी बुद्धि तथा विचारों के विकास के लिए उनसे लाभ उठाएं। क़ुरआने मजीद इसलिए नहीं आया है कि लोग उसकी तिलावत करके प्रलय का पारितोषिक प्राप्त करें बल्कि क़ुरआन इसलिए आया है कि लोग अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के कार्यक्रमों को उसके आधार पर तैयार करें और क़ुरआन की शिक्षाओं को अपने जीवन का आधार बनाएं।इन आयतों से हमने सीखा कि अरबी, क़ुरआन की भाषा है। क़ुरआन की आयतों में चिंतन के लिए उचित है कि मनुष्य अरबी भाषा सीखे।क़ुरआन केवल तिलावत करने और घर में रखने के लिए नहीं है बल्कि मनुष्य के चिंतन मनन का साधन है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की तीसरी आयत की तिलावत सुनते हैं।نَحْنُ نَقُصُّ عَلَيْكَ أَحْسَنَ الْقَصَصِ بِمَا أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ هَذَا الْقُرْآَنَ وَإِنْ كُنْتَ مِنْ قَبْلِهِ لَمِنَ الْغَافِلِينَ (3)(हे पैग़म्बर!) हम इस क़ुरआन के माध्यम से जिसे हमने वहि द्वारा आपकी ओर भेजा है, सबसे उत्तर वृत्तांत आपको सुनाते हैं, जिनसे आप पहले अवगत नहीं थे। (12:3)इस आयत में ईश्वर अपने पैग़म्बर से कहता है कि हम अपने विशेष संदेश वहि द्वारा आपकी ओर क़ुरआन भेजते हैं और इसके माध्यम से पिछली जातियों के वृत्तांतों को भी उत्तम ढंग से आपको सुनाते हैं और यह भी क़ुरआन का एक भाग है।मूल रूप से मनुष्यों के प्रशिक्षण में पिछली जातियों की कहानियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है विशेष कर यदि वह पिछली जातियों की सच्ची घटनाएं हों और सुनने वाला उन्हें एक कहानीकार की कल्पनाओं का परिणाम न समझे। वस्तुतः क़ुरआन के वृत्तांतों की सबसे बड़ी विशेषता उनका वास्तविक होना है। यह ऐसी बात है जिसे आज कल इतिहास के रूप में पहचाना जाता है और शैक्षणिक केन्द्रों में विभिन्न आयामों से इस पर ध्यान दिया जाता है।हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने पुत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम के नाम एक पत्र में इस प्रकार लिखते हैं। प्रिय पुत्र! मैंने अपने से पहले वाले लोगों की जीवनी का ऐसा अध्ययन किया है मानो मैंने उन्हीं के बीच जीवन बिताया हो।क़ुरआने मजीद में इतिहास का महत्त्व इतना अधिक है कि क़ुरआन को अहसनुल क़सस अर्थात सर्वोत्तम वृत्तांत कहा गया है। इसके अतिरिक्त यह कि ईश्वर स्वयं को कहानी सुनाने वाला बताता है और उसने पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को हज़रत यूसुफ़ का वृत्तांत सुनाते हुए इसे क़ुरआन का एक भाग बताया है।यदि इस आयत में हज़रत यूसुफ़ के वृत्तांत को सबसे महत्त्वपूर्ण वृत्तांत बताया गया है तो इसका कारण यह है कि इस घटना का नायक ऐसा युवा है जिसका पूरा अस्तित्व, पवित्रता अमानतदारी, धैर्य और ईमान से परिपूर्ण है। इस घटना का मूल बिंदु यह है कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने भरपूर जवानी में अपनी आंतरिक इच्छाओं से संघर्ष किया और उसमें विजयी रहे। इस घटना में बहुत सी विरोधाभासी बातें एकत्रित हैं, जैसे विरह और मिलाप, दुख और सुख, अभाव और बहुतायत, वफ़ा और बेवफ़ाई, दास्ता और शासन तथा पवित्रता और आरोप।इस आयत में निश्चेतना के लिए प्रयोग होने वाला ग़फ़लत का शब्द न जानने के अर्थ में प्रयोग हुआ है कि जो स्वयं कोई बुरी बात नहीं है। ऐसी ग़फ़लत बुरी होती है जो जानने और पहचानने के बाद भी बाक़ी रहे। जैसे ईश्वर और उसकी महान निशानियों से ग़फ़लत। पैग़म्बरे इस्लाम, हज़रत यूसुफ़ के वृत्तांत को नहीं जानते थे और ईश्वर ने अपने विशेष संदेश वहि द्वारा उन्हें इससे अवगत करा दिया।इस आयत से हमने सीखा कि सकारात्मक आदर्श प्रस्तुत करने के लिए हमें ऐसे ऐतिहासिक पात्रों का परिचय कराना चाहिए जिनका अस्तित्व वास्तव में सफल और प्रभावी रहा हो।चूंकि क़ुरआन ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन करता है अतः वह पूर्ण रूप से वास्तविक व विश्वसनीय है क्योंकि क़ुरआन, ज्ञान व तत्वदर्शी ईश्वर की ओर से हम तक पहुंचा है।