islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए यूसुफ़, आयतें 100-101, (कार्यक्रम 401)

    सूरए यूसुफ़, आयतें 100-101, (कार्यक्रम 401)

    Rate this post

    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 100 की तिलावत सुनते हैं।وَرَفَعَ أَبَوَيْهِ عَلَى الْعَرْشِ وَخَرُّوا لَهُ سُجَّدًا وَقَالَ يَا أَبَتِ هَذَا تَأْوِيلُ رُؤْيَايَ مِنْ قَبْلُ قَدْ جَعَلَهَا رَبِّي حَقًّا وَقَدْ أَحْسَنَ بِي إِذْ أَخْرَجَنِي مِنَ السِّجْنِ وَجَاءَ بِكُمْ مِنَ الْبَدْوِ مِنْ بَعْدِ أَنْ نَزَغَ الشَّيْطَانُ بَيْنِي وَبَيْنَ إِخْوَتِي إِنَّ رَبِّي لَطِيفٌ لِمَا يَشَاءُ إِنَّهُ هُوَ الْعَلِيمُ الْحَكِيمُ (100)और हज़रत यूसुफ़ ने अपने माता पिता को सिंहासन पर बिठाया और सब लोग उनके समक्ष नतमस्तक हो गए और यूसुफ़ ने कहा, हे पिता यह मेरे पहले वाले स्वप्न का अर्थ है। मेरे पालनहार ने उसे सच्चा कर दिखाया है और उसने मुझ पर उपकार किया जब उसने मुझे कारावास से बाहर निकाला और आप लोगों को देहात से (मिस्र) लाया, यद्यपि शैतान ने मेरे और मेरे भाइयों के बीच फूट डाल दी थी। निश्चित रूप से मेरा पालनहार जो चाहता है उसके लिए उत्तम युक्ति करता है। निसंदेह वह अत्यधिक जानकार और तत्वदर्शी है। (12:100)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम अपने माता पिता और भाइयों के स्वागत के लिए नगर से बाहर गए और जैसे ही वे मिस्र में प्रविष्ट हुए उन्होंने उन्हें गले से लगाया और उनका स्वागत सत्कार किया। यह आयत राजमहल के भीतर माता पिता के साथ हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के व्यवहार का वर्णन करते हुए कहती है कि उन्होंने अपने माता पिता को अपने सिंहासन पर बिठाया और उनका सम्मान किया।आयत कहती है कि हज़रत यूसुफ़ के माता पिता और भाई उनके समक्ष नतमस्तक हो गए और उन्होंने ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की कि उसकी कृपा के चलते हज़रत यूसुफ़ जीवित भी थे और बहुत ही उच्च स्थान तक भी पहुंच गए थे। उन्होंने इस प्रकार यह सज्दा किया था कि हज़रत यूसुफ़ उनके सामने खड़े थे अतः उन्होंने अपने पिता से कहा कि जो कुछ हुआ वह किशोरावस्था के मेरे पहले स्वप्न को चरितार्थ करता है जिसमें मैंने देखा था कि सूर्य, चंद्रमा और ग्यारह सितारे मेरे समक्ष नतमस्तक हैं। मेरे माता पिता ने सूर्य व चंद्रमा और ग्यारह भाइयों ने ग्यारह सितारों की भांति मेरे समक्ष ईश्वर का सज्दा किया है।इसके बाद हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम मिस्र के कारावास से अपने रिहा होने की ओर संकेत करते हुए अपने साथ घटने वाली सभी घटनाओं से अपने माता पिता और भाइयों को अवगत कराते हैं और इसे ईश्वर का उपकार बताते हैं। किन्तु उनकी महानता को देखिए कि वे भाइयों द्वारा उन्हें कुएं में डालने और कारवां के हाथों उन्हें दास के रूप में बेचे जाने की घटना की ओर कोई संकेत नहीं करते और अपने भाइयों को लज्जित होने से बचाने के लिए उनके कर्मों के लिए शैतान को मूल रूप से दोषी बताते हैं कि जिसने अपने उकसावे द्वारा उनके मन में ईर्ष्या की भावना उत्पन्न कर दी।इस आयत से हमने सीखा कि चाहे हम जिस पद पर रहें, माता पिता का सम्मान हमारे लिए अनिवार्य है और हमें सर्वोत्तम ढंग से उनका आदर करना चाहिए।यद्यपि मनुष्य को अपने कर्मों का अधिकार प्राप्त है किन्तु सभी अच्छाइयों का स्रोत ईश्वर है जबकि सभी बुराइयों की जड़ शैतान है।जिन्होंने हमारे साथ बुराई की है उनके साथ दया व क्षमा का व्यवहार करना चाहिए, ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध से काम नहीं लेना चाहिए।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 101 की तिलावत सुनते हैं।رَبِّ قَدْ آَتَيْتَنِي مِنَ الْمُلْكِ وَعَلَّمْتَنِي مِنْ تَأْوِيلِ الْأَحَادِيثِ فَاطِرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ أَنْتَ وَلِيِّي فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ تَوَفَّنِي مُسْلِمًا وَأَلْحِقْنِي بِالصَّالِحِينَ (101)(हज़रत यूसुफ़ ने) कहा, प्रभुवर! तूने मुझे राज्य प्रदान किया और सपनों का अर्थ बताने का ज्ञान सिखाया, हे आकाशों और धरती की रचना करने वाले! तू ही संसार और प्रलय में मेरा स्वामी है। मुझे इस अवस्था में संसार से उठा कि मैं मुसलमान रहूं और मुझे पवित्र लोगों का साथ प्रदान कर। (12:101)क़ुरआने मजीद में मिस्र पर दो लोगों के शासन की ओर संकेत किया गया है, एक फ़िरऔन जो स्वयं को शासक और लोगों को अपनी प्रजा तथा आज्ञाकारी समझता था और दूसरे हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम कि जो शासन का वास्तविक अधिकारी ईश्वर को मानते थे और कहते थे कि हे ईश्वर! जो कुछ है वह तेरा है, मेरे पास जो भी ज्ञान व सत्ता है, वह तेरे कारण है। न केवल इस संसार में बल्कि प्रलय में भी मुझे तेरी आवश्यकता है और मैं तुझे अपना स्वामी एवं अभिभावक समझता हूं और मुझे आशा है कि मृत्यु के समय मैं तेरी प्रसन्नता के साथ इस संसार से जाऊंगा और तू मुझे पवित्र व भले लोगों के साथ रखेगा।प्रार्थना के रूप में वर्णित होने वाले ये वाक्य, ईश्वर पर हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के ईमान की गहराई और सभी परिस्थतियों में उस पर हज़रत यूसुफ़ के भरोसे को दर्शाते हैं। उन्होंने सत्ता की चरम सीमा पर और माता पिता और भाइयों के साथ होने के बावजूद और अपनी समस्याओं के सुलझने के अवसर पर भी ईश्वर को नहीं भुलाया और उसे याद करते रहे, इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने सत्ता की चरम सीमा पर पहुंचकर भी प्रलय को याद रखा और प्रार्थना की कि आयु के अंत तक उनका ईमान सुरक्षित रहे और मरते दम तक वे ईश्वर पर ईमान रखें।इस आयत से हमने सीखा कि सदैव संसार में अपने अंत की ओर से सावधान रहना चाहिए और अपने धर्म तथा ईमान की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहना चाहिए।सत्ता और शासन, उद्दंडता, बुराई और ईमान से दूरी का मार्ग प्रशस्त करता है सिवाय इसके कि ईश्वर मनुष्य को ख़तरों से सुरक्षित रखे।जो लोग, जनता पर शासन करते हैं उन्हें यह बात याद रखनी चाहिए कि ईश्वर उनके ऊपर है और लोक परलोक में वही उनका वास्तविक स्वामी है।