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    सूरए यूसुफ़, आयतें 107-109, (कार्यक्रम 403)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 107 की तिलावत सुनते हैं।أَفَأَمِنُوا أَنْ تَأْتِيَهُمْ غَاشِيَةٌ مِنْ عَذَابِ اللَّهِ أَوْ تَأْتِيَهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ (107)क्या(जो लोग ईमान नहीं लाते) वे इस बात से सुरक्षित हैं कि ईश्वरीय दंड उन्हें आ पकड़े? या प्रलय सहसा ही उनके सामने आ जाए और उन्हें पता ही न चले? (12:107)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वर अपने पैग़म्बर को सांत्वनना देता है कि यदि लोग तुम पर ईमान नहीं लाते हैं तो तुम्हें दुखी नहीं होना चाहिए क्योंकि वे मुझ पर ईमान नहीं लाते हैं जबकि मैं उनका ही नहीं बल्कि पूरे संसार का रचयिता हूं। इसके अतिरिक्त जो लोग ईमान भी लाए हैं उनमें से अनेक का ईमान अनेकेश्वरवाद से जुड़ा हुआ है और पूर्ण रूप से निष्ठावान ईमान वाले कम ही दिखाई देते हैं।इस आयत में ईश्वर कहता है कि हे पैग़म्बर! जो लोग ईश्वर और प्रलय पर ईमान नहीं रखते उन्हें चेतावनी दे दीजिए कि बहुत संभव है कि ईश्वरीय दंड इसी संसार में उन्हें अपनी लपेट में ले ले या सहसा ही उनकी मृत्यु आ जाए और वे परलोक में ख़ाली हाथ और बहुत अधिक पापों के साथ पहुंचे कि जिसके दंड स्वरूप उन्हें नरक में जाना पड़े।इस आयत से हमने सीखा कि जो कोई ईमान नहीं रखता वह ईश्वर की ओर से सुरक्षित नहीं है चाहे वह अपनी रक्षा के कितने ही उपाय क्यों न कर ले।प्रलय और ईश्वरीय दंड को याद रखना, मनुष्य के प्रशिक्षण और पापों से दूरी का सर्वोत्तम कारक है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 108 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ هَذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ عَلَى بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِي وَسُبْحَانَ اللَّهِ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ (108)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि यह मेरा मार्ग है और मैं तथा जो मेरा अनुसरण करता है लोगों की दूरदर्शिता के आधार पर ईश्वर की ओर बुलाते हैं और ईश्वर हर प्रकार की बुराई से पवित्र है और मैं अनेकेश्वरवादियों से नहीं हूं। (12:108)इस आयत में ईश्वर लोगों को सत्य और वास्तविकता की ओर बुलाने की शैली का उल्लेख करते हुए कहता है कि ईमान, दूरदर्शिता और ईश्वर की गहरी पहचान के साथ होना चाहिए, उसे पहचानने के बाद उस पर ईमान लाना चाहिए। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को पहचानने के बाद उन पर ईमान लाना चाहिए। इसी प्रकार हर किसी को ईश्वरीय कथन क़ुरआने मजीद को समझ और पहचान कर उस पर ईमान लाना चाहिए।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने भी इसी शैली में धर्म का प्रचार किया है, यही कारण है कि जो लोग उनके माध्यम से ईमान लाए वे धर्म पर सदैव अडिग रहे और उन्होंने धर्म के मार्ग में अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए।निश्चित रूप से जो बात ईमान में कमज़ोरी का कारण बनती है वह आस्था और कर्म में अनेकेश्वरवाद है। अलबत्ता सारे लोग नहीं बल्कि कुछ लोग इसमें ग्रस्त होते हैं किन्तु एकेश्वरवाद का निमंत्रण देने वालों को जिनमें सबसे प्रमुख पैग़म्बर हैं, हर प्रकार के अनेकेश्वरवाद से दूर होना चाहिए और पूरी निष्ठा के साथ धर्म के मार्ग में प्रयास करना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म के प्रचारकों को लोगों के ज्ञान व दूरदर्शिता के स्तर को ऊंचा उठाने का प्रयास करना चाहिए।जो लोग धर्म के प्रचार और लोगों को धर्म की ओर आमंत्रित करने के इच्छुक हैं, उन्हें स्वयं को अनेकेश्वरवाद से दूर रखना चाहिए और लोगों को अनेकेश्वरवाद के ख़तरों से अवगत कराना चाहिए।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 109 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًا نُوحِي إِلَيْهِمْ مِنْ أَهْلِ الْقُرَى أَفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ وَلَدَارُ الْآَخِرَةِ خَيْرٌ لِلَّذِينَ اتَّقَوْا أَفَلَا تَعْقِلُونَ (109)(हे पैग़म्बर!) हमने आपसे पूर्व (किसी को भी पैग़म्बर के रूप में) नहीं भेजा सिवाय बस्तियों में रहने वाले उन पुरुषों के जिनकी ओर हमने अपना विशेष संदेश वहि भेजा। क्या( आपकी पैग़म्बरी का इन्कार करने वालों ने) धरती में घूम फिर कर नहीं देखा है कि उन लोगों का कैसा अंत हुआ जो उनसे पूर्व थे? और निश्चित रूप से परलोक का घर उन लोगों के लिए उत्तम है जो ईश्वर से डरते हैं। क्या तुम चिंतन नहीं करते? (12:109)पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के विरोधियों की एक आपत्ति यह थी कि यदि ईश्वर किसी पैग़म्बर को भेजना चाहता है तो वह हम जैसे किसी मनुष्य के बजाए जिसे हम पर कोई श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है, किसी फ़रिश्ते को पैग़म्बर बनाता है।यह आयत उनके उत्तर में कहती है कि क्या उन्होंने पिछले पैग़म्बरों का इतिहास पढ़ा या सुना नहीं है कि सभी पैग़म्बर आकाश से फ़रिश्ते नहीं बल्कि मानव जाति के ही थे और धरती पर ही रहते थे। हे पैग़म्बर! इस प्रकार की आपत्तियां, हठधर्म और इन्कार की भावना के कारण हैं। वे सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं चाहे उनके समक्ष कोई फ़रिश्ता ही क्यों न आ जाए।आगे चलकर आयत बुरे व भले लोगों के अंत की ओर संकेत करती है। यद्यपि इस संसार में भले लोगों को दुखों व संकटों का सामना करना पड़ता है किन्तु ईश्वर प्रलय में उन्हें बहुत अच्छा प्रतिफल देता है और उन्हें बड़ा ही भला जीवन प्राप्त हो जाता है किन्तु बुरे लोगों को इसी संसार में कठिनाइयां और दंड सहन करना पड़ता है और वे दूसरों के लिए शिक्षा सामग्री बन जाते हैं। हमें इन दोनों गुटों और उनके अंत के बारे में विचार करना चाहिए ताकि हम सही और ग़लत मार्ग को पहचान सकें।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बर मानव जाति के ही थे और लोगों के बीच ही जीवन व्यतीत करते थे किन्तु वे हर प्रकार की बुराई से दूर थे ताकि सभी लोगों के लिए आदर्श बन सकें।धरती में घूमना फिरना और पिछली जातियों के इतिहास से अवगत होना और उससे पाठ सीखना, मनुष्य के मार्गदर्शन और प्रशिक्षण में सहायक है।सोच विचार से पैग़म्बरों के मार्ग, उनकी सत्यता और उनके धर्म की पहचान के बारे में सहायता मिलती है और लोगों की बुद्धि को सक्रिय बनाना पैग़म्बरों का एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य था।